प्रश्न :
हिंदी आलोचना का उद्भव और विकास करते हुए यह स्पष्ट कीजिए कि आलोचना का साहित्य में क्या महत्व है। हिंदी आलोचना के प्रारंभिक स्वरूप, शुक्ल युग से पूर्व की आलोचना, आचार्य रामचंद्र शुक्ल के योगदान तथा शुक्लोत्तर काल की आलोचना प्रवृत्तियों का क्रमबद्ध विवेचन करते हुए उपयुक्त निष्कर्ष प्रस्तुत कीजिए।
भूमिका
साहित्य मानव जीवन की अनुभूतियों, संवेदनाओं, संघर्षों और विचारों की सृजनात्मक अभिव्यक्ति है। साहित्य समाज का दर्पण होता है, जिसमें युग की चेतना प्रतिबिंबित होती है। किंतु साहित्य का वास्तविक मूल्य तभी स्पष्ट होता है, जब उसका विवेकपूर्ण विश्लेषण किया जाए। इस विश्लेषण की प्रक्रिया को ही ‘आलोचना’ कहा जाता है।
आलोचना साहित्य और पाठक के बीच सेतु का कार्य करती है। यह रचना की व्याख्या, मूल्यांकन और विवेचन करके उसकी वास्तविक महत्ता को सामने लाती है। हिंदी साहित्य के विकास के साथ-साथ हिंदी आलोचना भी निरंतर विकसित होती रही है। हिंदी आलोचना ने साहित्य को दिशा दी, मानदंड स्थापित किए और उसकी गुणवत्ता को ऊँचा उठाया।
आलोचना का अर्थ एवं स्वरूप
‘आलोचना’ शब्द संस्कृत की ‘आलोच’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है— विचार करना, परखना, मूल्यांकन करना। साहित्यिक संदर्भ में आलोचना का अर्थ है—
किसी साहित्यिक कृति के भाव, विचार, भाषा, शैली, शिल्प, उद्देश्य और प्रभाव का तर्कसंगत तथा संतुलित विश्लेषण।
आलोचना का उद्देश्य केवल दोष ढूँढना नहीं, बल्कि गुण-दोष दोनों का निष्पक्ष मूल्यांकन करना है। एक श्रेष्ठ आलोचक रचना की आत्मा तक पहुँचने का प्रयास करता है।
डॉ. नगेन्द्र के अनुसार—
“आलोचना साहित्य की आत्मा का अन्वेषण है।”
इस प्रकार आलोचना साहित्य को समझने और समझाने की विद्या है।
हिंदी आलोचना का प्रारंभिक स्वरूप
हिंदी साहित्य के प्रारंभिक काल में आलोचना का कोई व्यवस्थित रूप नहीं था। भक्तिकाल और रीतिकाल में आलोचना अप्रत्यक्ष रूप से मिलती है।
भक्तिकाल में आलोचना
भक्तिकाल में संत कवियों ने सामाजिक कुरीतियों की आलोचना की। कबीर, तुलसी, सूरदास आदि ने अपने काव्य में जीवन मूल्यों का प्रतिपादन किया। यह नैतिक और आध्यात्मिक आलोचना थी।
रीतिकाल में आलोचना
रीतिकाल में काव्यशास्त्रीय दृष्टि से काव्य का मूल्यांकन किया गया। केशव, बिहारी आदि कवियों ने अलंकार, रस और नायिका भेद पर बल दिया। परंतु यह आलोचना शास्त्रीय और रूढ़िबद्ध थी।
इस काल में स्वतंत्र आलोचनात्मक चेतना का अभाव था।
शुक्ल युग से पूर्व की हिंदी आलोचना (भारतेंदु युग)
आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ भारतेंदु युग (1868–1900) से माना जाता है। इस युग में गद्य का विकास हुआ और साहित्यिक पत्रिकाएँ प्रकाशित होने लगीं।
प्रमुख आलोचक—
भारतेंदु हरिश्चंद्र
बालकृष्ण भट्ट
प्रतापनारायण मिश्र
इनकी आलोचना सामाजिक, नैतिक और राष्ट्रीय चेतना से प्रेरित थी। इन्होंने साहित्य को समाज सुधार का माध्यम माना।
बालकृष्ण भट्ट ने ‘हिंदी प्रदीप’ पत्रिका के माध्यम से आलोचना को दिशा दी।
इस काल की आलोचना भावात्मक और आदर्शवादी थी, किंतु आधुनिक आलोचना की नींव यहीं पड़ी।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना
हिंदी आलोचना को वैज्ञानिक, व्यवस्थित और सुदृढ़ स्वरूप देने का श्रेय आचार्य रामचंद्र शुक्ल को जाता है। इन्हें हिंदी आलोचना का पितामह कहा जाता है।
प्रमुख कृतियाँ—
हिंदी साहित्य का इतिहास
चिंतामणि
रस मीमांसा
गोस्वामी तुलसीदास
आलोचना दृष्टि
शुक्ल जी ने साहित्य को जीवन और समाज से जोड़कर देखा। उन्होंने ‘लोकमंगल’ को साहित्य का प्रमुख उद्देश्य माना।
उनके अनुसार—
“साहित्य का लक्ष्य लोकमंगल है।”
शुक्ल जी की आलोचना में—
वस्तुनिष्ठता
तार्किकता
ऐतिहासिक दृष्टि
सामाजिक चेतना
का सुंदर समन्वय मिलता है।
उन्होंने आलोचना को भावनात्मकता से निकालकर बौद्धिक स्तर पर स्थापित किया।
शुक्लोत्तर काल की हिंदी आलोचना
शुक्ल जी के बाद हिंदी आलोचना में विविध धाराएँ विकसित हुईं।
1. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
प्रमुख कृतियाँ—
नाथ सिद्धों की बानियाँ
कबीर
हिंदी साहित्य की भूमिका
इन्होंने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से आलोचना को समृद्ध किया।
2. डॉ. नगेन्द्र
डॉ. नगेन्द्र आधुनिक हिंदी आलोचना के प्रमुख स्तंभ हैं।
प्रमुख कृतियाँ—
आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास
रस सिद्धांत
काव्यशास्त्र
इन्होंने मनोवैज्ञानिक और सौंदर्यशास्त्रीय आलोचना को विकसित किया।
3. मार्क्सवादी आलोचना
मार्क्सवादी आलोचना का आधार कार्ल मार्क्स का सिद्धांत है।
प्रमुख आलोचक—
रामविलास शर्मा
नामवर सिंह
शिवकुमार मिश्र
रामविलास शर्मा की कृतियाँ—
प्रगतिशील साहित्य की समस्याएँ
हिंदी जाति का इतिहास
मार्क्सवादी आलोचना साहित्य को वर्गसंघर्ष और सामाजिक यथार्थ से जोड़कर देखती है।
4. नामवर सिंह
प्रमुख कृतियाँ—
छायावाद
दूसरी परंपरा की खोज
कहानी नई कहानी
इन्होंने आधुनिक, प्रयोगवादी और नई कविता की आलोचना की।
5. अन्य धाराएँ
मनोवैज्ञानिक आलोचना
समाजशास्त्रीय आलोचना
संरचनावादी आलोचना
उत्तर-आधुनिक आलोचना
इनसे हिंदी आलोचना बहुआयामी बनी।
प्रमुख आलोचनात्मक ग्रंथ
हिंदी आलोचना के विकास में अनेक ग्रंथों का योगदान रहा है—
हिंदी साहित्य का इतिहास — आचार्य शुक्ल
चिंतामणि — शुक्ल
कबीर — हजारीप्रसाद द्विवेदी
आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास — डॉ. नगेन्द्र
दूसरी परंपरा की खोज — नामवर सिंह
प्रगतिशील साहित्य की समस्याएँ — रामविलास शर्मा
रस सिद्धांत — डॉ. नगेन्द्र
इन ग्रंथों ने आलोचना को सैद्धांतिक आधार प्रदान किया।
हिंदी आलोचना का महत्व
हिंदी आलोचना का साहित्य में अत्यंत महत्व है—
यह साहित्य के स्तर को ऊँचा उठाती है।
रचनाकार को आत्मनिरीक्षण का अवसर देती है।
पाठकों की साहित्यिक चेतना विकसित करती है।
साहित्यिक परंपरा को संरक्षित करती है।
नई प्रवृत्तियों को पहचान देती है।
आलोचना के बिना साहित्य दिशाहीन हो जाता है।
वर्तमान काल में हिंदी आलोचना
आज हिंदी आलोचना वैश्वीकरण, तकनीक और नए विमर्शों से जुड़ रही है। स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श आदि ने आलोचना को नई दिशा दी है।
डिजिटल माध्यमों ने आलोचना को व्यापक बनाया है।
निष्कर्ष
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि हिंदी आलोचना का विकास एक सतत और गतिशील प्रक्रिया रही है। प्रारंभिक काल में यह अप्रत्यक्ष थी, भारतेंदु युग में विकसित हुई, आचार्य शुक्ल ने इसे वैज्ञानिक स्वरूप दिया और शुक्लोत्तर काल में यह बहुआयामी बनी।
डॉ. नगेन्द्र, रामविलास शर्मा, नामवर सिंह जैसे आलोचकों ने इसे नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
आज हिंदी आलोचना समाज, संस्कृति और वैश्विक संदर्भों से जुड़कर निरंतर आगे बढ़ रही है। हिंदी साहित्य की उन्नति में आलोचना की भूमिका अमूल्य रही है और भविष्य में भी बनी रहेगी।
इस प्रकार हिंदी आलोचना साहित्य को केवल परखने का साधन नहीं, बल्कि उसे समृद्ध बनाने की सशक्त प्रक्रिया है।