‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’ : निबंध के तत्वों के आधार पर समीक्षा
भूमिका
हिंदी के ललित निबंध साहित्य में पं. विद्यानिवास मिश्र का विशिष्ट स्थान है। उन्होंने भारतीय संस्कृति, लोकजीवन, मानवीय संवेदना और सामाजिक सरोकारों को अपने निबंधों में अत्यंत आत्मीयता के साथ अभिव्यक्त किया है। ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’ उनका अत्यंत संवेदनशील और भावपूर्ण निबंध है। इसमें राम और सीता के माध्यम से लेखक ने केवल पौराणिक प्रसंगों को प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि वर्तमान समाज के उपेक्षित, अभावग्रस्त और पीड़ित मनुष्य की व्यथा को भी स्वर दिया है। राम का भीगता हुआ मुकुट और सीता की पीड़ा आधुनिक मनुष्य की चिंता, संघर्ष और असुरक्षा के प्रतीक बन जाते हैं।
विद्यानिवास मिश्र : व्यक्तित्व एवं कृतित्व
पं. विद्यानिवास मिश्र संस्कृत के प्रखर विद्वान, प्रसिद्ध भाषाविद्, हिंदी साहित्यकार तथा सफल संपादक थे। उन्होंने हिंदी के ललित निबंध को समृद्ध करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। ललित निबंध की परंपरा में उनका नाम आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और कुबेरनाथ राय जैसे प्रमुख निबंधकारों के साथ लिया जाता है।
उनका जन्म 18 जनवरी 1926 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के पकड़ीहवा गाँव में हुआ। वाराणसी और गोरखपुर में शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात उन्होंने गोरखपुर विश्वविद्यालय से पाणिनीय व्याकरण पर शोध किया। वे विश्वविद्यालय में अध्यापक और प्रोफेसर रहे तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1999 में पद्म भूषण से सम्मानित किया।
निबंध का कथ्य
‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’ में लेखक राम के मुकुट के भीगने की कल्पना से अपनी सामाजिक और मानवीय चिंता को जोड़ता है। राम उसके लिए केवल धार्मिक आस्था के पात्र नहीं हैं, बल्कि वे मानवीय मूल्यों, करुणा, मर्यादा और लोकमंगल के प्रतीक हैं।
लेखक स्वयं से प्रश्न करता है—‘वह हृदय कहाँ से लाऊँ जिसमें राम को अपना कह सकूँ?’ राम को अपना कहने के लिए जिस हृदय की आवश्यकता है, उसमें सीता के दुःख को अनुभव करने की क्षमता भी होनी चाहिए। इसी भाव से लेखक एक देर से घर लौटने वाली लड़की की चिंता से सीता की पीड़ा तक पहुँचता है। एक सामान्य पारिवारिक चिंता उसके भीतर व्यापक मानवीय संवेदना को जागृत कर देती है।
सीता के जीवन का वनवास, विशेषकर दूसरा निर्वासन, अत्यंत करुण और दयनीय है। वह जंगल और वन्य पशुओं के बीच जीवन बिताने के लिए विवश है। लेखक सीता के कष्ट को केवल अतीत की घटना के रूप में नहीं देखता, बल्कि वर्तमान की उन स्त्रियों और मनुष्यों की पीड़ा से जोड़ देता है जो सामाजिक उपेक्षा और अभाव का सामना कर रहे हैं।
निबंध में लेखक की दृष्टि राम से आगे बढ़कर समाज के उन अभावग्रस्त और उपेक्षित लोगों तक पहुँचती है जिन्हें समाज भूल चुका है। इसी क्रम में आज के बेरोजगार युवकों की पीड़ा का संकेत भी मिलता है। वे आधुनिक जीवन में आशा और संघर्ष के बीच भटक रहे हैं। उनके जीवन में भी आशाओं का मुकुट निरंतर वर्षा में भीग रहा है, किंतु उनके लिए कोई गीत गाने वाला नहीं है।
निबंध के तत्वों के आधार पर समीक्षा
1. अनुभूति तत्व
ललित निबंध की सबसे बड़ी शक्ति लेखक की व्यक्तिगत अनुभूति होती है और इस दृष्टि से यह निबंध अत्यंत प्रभावशाली है। लेखक राम के मुकुट के भीगने की कल्पना से स्वयं के भीतर उठने वाली बेचैनी को सामाजिक संवेदना में बदल देता है।
राम की चिंता करते-करते लेखक सीता के दुःख, परिवार की चिंता, अभावग्रस्त मनुष्यों और बेरोजगार युवकों तक पहुँच जाता है। एक छोटी-सी व्यक्तिगत अनुभूति व्यापक मानवीय अनुभूति का रूप ले लेती है।
‘मोरे राम का विजय मुकुटवा’ जैसी लोकधुन लेखक के भीतर महीनों से जमी उदासी को तरल कर देती है। इससे स्पष्ट होता है कि लोक-संस्कृति और लोकगीत लेखक की संवेदना को गहराई प्रदान करते हैं।
2. विचार तत्व
निबंध का विचार पक्ष अत्यंत व्यापक और मानवीय है। लेखक का चिंतन राम-कथा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उससे वर्तमान समाज की समस्याओं को जोड़ता है।
राम के माध्यम से मर्यादा और लोकमंगल, सीता के माध्यम से स्त्री की पीड़ा तथा बेरोजगार युवकों के माध्यम से आधुनिक सामाजिक संकट को अभिव्यक्ति मिलती है। लेखक यह संकेत करता है कि किसी आदर्श को अपना कहने का अर्थ केवल उसकी पूजा करना नहीं, बल्कि उसके भीतर निहित मानवीय संवेदना को अपने जीवन में उतारना भी है।
निबंध में दो पीढ़ियों के विचारों और दृष्टिकोण के अंतर की ओर भी संकेत मिलता है। इस प्रकार लेखक परंपरा और आधुनिकता के बीच बदलते संबंधों को मानवीय दृष्टि से देखता है।
3. कल्पना तत्व
निबंध में कल्पना अत्यंत सृजनात्मक और प्रतीकात्मक है। ‘राम का मुकुट भीग रहा है’ स्वयं एक प्रभावशाली प्रतीक है। मुकुट का भीगना केवल वर्षा में भीगने की घटना नहीं है, बल्कि आदर्शों, आशाओं और मानवीय मूल्यों पर पड़ने वाले संकट का संकेत बन जाता है।
लेखक राम के मुकुट को सीता के सिंदूर के गिरने की आशंका से जोड़ता है। इस कल्पना के माध्यम से राम और सीता के जीवन की पीड़ा एक-दूसरे से जुड़ जाती है। इसी प्रकार जंगल में उपेक्षित सीता और वर्तमान समाज में उपेक्षित मनुष्य के बीच स्थापित संबंध निबंध की कल्पनाशीलता को व्यापक बनाता है।
4. भाषा एवं शैली
विद्यानिवास मिश्र की भाषा संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी अत्यंत सहज, आत्मीय और भावपूर्ण है। उनकी भाषा में लोकभाषा, लोकगीत, तत्सम शब्दावली और बोलचाल की अभिव्यक्ति का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
निबंध की शैली मुख्यतः भावात्मक, आत्मकथात्मक, विचारात्मक और वर्णनात्मक है। लेखक कहीं स्वयं से संवाद करता है, कहीं पाठक से प्रश्न करता है और कहीं अपने आसपास के जीवन का चित्र प्रस्तुत करता है।
‘मोरे राम का विजय मुकुटवा’ जैसी लोकपंक्ति निबंध में संगीतात्मकता और लोकजीवन की आत्मीयता उत्पन्न करती है। पूर्व दिशा से उजाले का आना और चक्की की गति के साथ उत्पन्न होने वाली हल्की सिरहन जैसे चित्र भाषा को दृश्यात्मक और संवेदनात्मक बना देते हैं।
5. व्यक्तित्व तत्व
इस निबंध में विद्यानिवास मिश्र का संवेदनशील, भारतीय संस्कृति से गहरे जुड़ा हुआ और लोकजीवन के प्रति सजग व्यक्तित्व उभरकर सामने आता है। वे केवल राम के भक्त के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य की पीड़ा को अनुभव करने वाले साहित्यकार के रूप में दिखाई देते हैं।
उनकी दृष्टि राम से सीता तक, सीता से परिवार तक और परिवार से समाज के उपेक्षित तथा अभावग्रस्त मनुष्यों तक पहुँचती है। यही व्यापकता उनके व्यक्तित्व की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है।
6. सामाजिक सरोकार
निबंध का सामाजिक पक्ष अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। लेखक ने उन लोगों की पीड़ा को स्वर दिया है जिन्हें समाज अक्सर भूल जाता है। सीता की पीड़ा के माध्यम से स्त्री की असुरक्षा और उपेक्षा सामने आती है, जबकि बेरोजगार युवकों की ओर संकेत करके आधुनिक समाज की आर्थिक और सामाजिक चिंता को अभिव्यक्ति मिलती है।
इस प्रकार राम और सीता का प्रसंग वर्तमान जीवन से जुड़कर सामाजिक सरोकार का रूप ले लेता है।
7. सांस्कृतिक चेतना
निबंध में भारतीय संस्कृति, रामकथा, तुलसी और लोकगीतों के प्रति गहरी सांस्कृतिक चेतना दिखाई देती है। लेखक भारतीय परंपरा को केवल स्मरण नहीं करता, बल्कि उसके भीतर छिपे मानवीय मूल्यों को वर्तमान संदर्भ में परखता है।
वह ऐसे सांस्कृतिक दिखावे पर भी संकेत करता है जिसमें राम और तुलसी के नाम का बाहरी प्रदर्शन तो हो, किंतु राम के वास्तविक मानवीय आदर्शों और संवेदनाओं की चिंता न हो।
प्रमुख विशेषताएँ
1. निबंध में समाज के उपेक्षित, अभावग्रस्त और पीड़ित व्यक्तियों की व्यथा को स्वर मिला है।
2. राम के विषय में सोचते हुए लेखक की चेतना व्यापक होकर पूरे समाज की चिंता करने लगती है।
3. सीता के वनवास और उनके कष्टों का अत्यंत करुण एवं संवेदनापूर्ण चित्रण हुआ है।
4. लेखक की व्यक्तिगत उदासी धीरे-धीरे सामाजिक पीड़ा की अनुभूति में बदल जाती है।
5. लेखक की संवेदना के माध्यम से लोक के अंतर्व्यक्तित्व में छिपी अंतर्वेदना को अभिव्यक्ति मिलती है।
6. राम के भीगते मुकुट की चिंता से लेखक अपने परिजनों और सामान्य मनुष्य की चिंता तक पहुँचता है।
7. सीता के दूसरे निर्वासन को विशेष रूप से अत्यंत मार्मिक और दयनीय रूप में प्रस्तुत किया गया है।
8. वन में सीता का वन्य पशुओं के बीच जीवन बिताना स्त्री की विवशता और उपेक्षा का मार्मिक प्रतीक बन जाता है।
9. निबंध में दो पीढ़ियों के विचारों और दृष्टिकोण के अंतर की समस्या को भी संकेत रूप में प्रस्तुत किया गया है।
10. आधुनिक बेरोजगार युवकों की पीड़ा और उनके संघर्ष की ओर अप्रत्यक्ष संकेत मिलता है।
11. वर्तमान समाज में अनेक लोगों की आशाएँ निरंतर भीग रही हैं, किंतु उनकी चिंता करने वाला और उनके लिए गीत गाने वाला कोई नहीं है।
12. इस प्रकार लाखों-करोड़ों आधुनिक ‘रामों’ की दर-दर भटकती हुई स्थिति के प्रति लेखक अपनी गहरी मानवीय चिंता व्यक्त करता है।
निष्कर्ष
‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’ केवल राम और सीता के प्रसंग पर आधारित ललित निबंध नहीं है, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना के माध्यम से समकालीन मनुष्य की पीड़ा को पहचानने वाला संवेदनशील निबंध है। इसमें अनुभूति की गहराई, विचार की व्यापकता, कल्पना की प्रतीकात्मकता, भाषा की लालित्यपूर्णता और लेखक के मानवीय व्यक्तित्व का सुंदर समन्वय है। राम का भीगता हुआ मुकुट अंततः उन सभी मनुष्यों की भीगी हुई आशाओं का प्रतीक बन जाता है, जिनके दुःख और संघर्ष को समाज अक्सर अनदेखा कर देता है। यही व्यापक मानवीय संवेदना इस निबंध को विद्यानिवास मिश्र के श्रेष्ठ ललित निबंधों में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।