धर्मवीर भारती के ‘अंधा युग’ नाटक का विवेचन
1. प्रस्तावना
आधुनिक हिंदी नाटक साहित्य में कुछ कृतियाँ ऐसी हैं जो केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि मानव जीवन के गहन सत्य को उजागर करती हैं। ‘अंधा युग’ ऐसा ही एक महत्वपूर्ण नाटक है। यह नाटक महाभारत युद्ध के अंतिम चरण की घटनाओं पर आधारित है और युद्ध के बाद उत्पन्न निराशा, विनाश और नैतिक पतन को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है।
इस नाटक के माध्यम से लेखक ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि जब समाज में नैतिकता, धर्म और मानवीय मूल्यों का पतन हो जाता है तो पूरा युग अंधकारमय बन जाता है। इसलिए इस नाटक का नाम ‘अंधा युग’ रखा गया है।
2. धर्मवीर भारती का परिचय
धर्मवीर भारती आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध नाटककार, उपन्यासकार और पत्रकार थे। उनका जन्म 1926 में इलाहाबाद में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की और बाद में वहीं अध्यापन कार्य किया।
वे प्रसिद्ध पत्रिका ‘धर्मयुग’ के संपादक भी रहे। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘गुनाहों का देवता’, ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’, ‘कनुप्रिया’ तथा ‘अंधा युग’ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
धर्मवीर भारती की रचनाओं में मानवीय संवेदना, नैतिक मूल्यों की चिंता तथा आधुनिक सामाजिक समस्याओं का गहरा चित्रण मिलता है।
3. ‘अंधा युग’ का परिचय
अंधा युग एक प्रसिद्ध हिंदी नाटक है, जिसकी कथा महाभारत युद्ध के अंतिम दिन की घटनाओं पर आधारित है। इसमें युद्ध के बाद की स्थिति, मानवता के पतन तथा प्रतिशोध की भावना का चित्रण किया गया है।
यह नाटक प्रतीकात्मक और दार्शनिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेखक ने पौराणिक कथा के माध्यम से आधुनिक युग की समस्याओं और युद्ध की भयावहता को व्यक्त किया है।
4. कथावस्तु
इस नाटक की कथा महाभारत युद्ध के अंतिम दिन से आरंभ होती है। कौरव सेना नष्ट हो चुकी है और दुर्योधन की भी मृत्यु हो चुकी है। हस्तिनापुर में चारों ओर शोक और निराशा का वातावरण है।
धृतराष्ट्र और गांधारी अपने पुत्रों की मृत्यु से अत्यंत दुखी हैं। संजय उन्हें युद्ध का समाचार सुनाता है।
द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा अपने पिता की मृत्यु से अत्यंत क्रोधित हो जाता है और प्रतिशोध लेने का निश्चय करता है। वह रात के समय पांडवों के शिविर पर हमला करता है और सोते हुए पांडवों के पाँच पुत्रों की हत्या कर देता है।
गांधारी अपने पुत्रों की मृत्यु के कारण कृष्ण को दोष देती है और उन्हें श्राप देती है कि जिस प्रकार उसका वंश नष्ट हुआ है उसी प्रकार कृष्ण का यदुवंश भी नष्ट हो जाएगा।
नाटक के अंत में यह संदेश दिया गया है कि युद्ध और प्रतिशोध का परिणाम केवल विनाश होता है।
5. पात्र-योजना
इस नाटक में पौराणिक पात्रों के माध्यम से मानवीय भावनाओं और नैतिक संघर्षों का चित्रण किया गया है। प्रमुख पात्र हैं—
धृतराष्ट्र
गांधारी
संजय
अश्वत्थामा
कृष्ण
युधिष्ठिर
विदुर
प्रहरी आदि
इन पात्रों के माध्यम से लेखक ने मानव की कमजोरियों, क्रोध, प्रतिशोध और नैतिक द्वंद्व को प्रस्तुत किया है।
6. वातावरण
नाटक का वातावरण अत्यंत गंभीर, शोकपूर्ण और निराशापूर्ण है। युद्ध के बाद का विनाश, मृत सैनिकों के ढेर और उजड़ा हुआ राज्य पूरे नाटक में एक भयावह वातावरण उत्पन्न करते हैं।
यह वातावरण नाटक के संदेश को और अधिक प्रभावशाली बनाता है।
7. संवाद शैली
इस नाटक की संवाद शैली अत्यंत प्रभावशाली और भावनात्मक है। संवाद छोटे-छोटे होने के बावजूद गहरी अर्थवत्ता लिए हुए हैं।
संवादों के माध्यम से पात्रों की मानसिक स्थिति और उनके आंतरिक संघर्ष स्पष्ट रूप से प्रकट होते हैं।
8. भाषा-शैली
‘अंधा युग’ की भाषा काव्यात्मक, गंभीर और प्रभावशाली है। इसमें संस्कृतनिष्ठ शब्दों के साथ-साथ सरल और प्रवाहपूर्ण हिंदी का प्रयोग किया गया है।
काव्यात्मकता के कारण नाटक की भाषा अत्यंत मार्मिक और प्रभावपूर्ण बन जाती है।
9. नाटक की विशेषताएँ
पौराणिक कथा के माध्यम से आधुनिक समस्याओं का चित्रण।
युद्ध की भयावहता का यथार्थ चित्रण।
प्रतीकात्मक और दार्शनिक दृष्टिकोण।
प्रभावशाली संवाद और काव्यात्मक भाषा।
मानवीय मूल्यों की गहन अभिव्यक्ति।
10. नाटक में उठाई गई समस्याएँ
इस नाटक में कई महत्वपूर्ण समस्याओं को उठाया गया है—
युद्ध और हिंसा की समस्या
नैतिक मूल्यों का पतन
प्रतिशोध और क्रोध की प्रवृत्ति
सत्ता और अहंकार का दुरुपयोग
मानवता का संकट
11. नाटक की आधुनिकता
यद्यपि यह नाटक पौराणिक कथा पर आधारित है, फिर भी इसमें आधुनिक युग की समस्याएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं।
लेखक ने महाभारत की कथा के माध्यम से आधुनिक समाज में बढ़ती हिंसा, युद्ध और नैतिक पतन की ओर संकेत किया है। इस प्रकार यह नाटक आज भी अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है।
12. निष्कर्ष
अंततः कहा जा सकता है कि ‘अंधा युग’ आधुनिक हिंदी नाट्य साहित्य की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कृति है। इसमें महाभारत की कथा के माध्यम से युद्ध की विनाशकारी प्रवृत्ति और मानवीय मूल्यों के पतन का सशक्त चित्रण किया गया है।
यह नाटक हमें यह संदेश देता है कि यदि समाज में नैतिकता, करुणा और मानवता का अभाव हो जाए तो पूरा युग अंधकारमय बन जाता है। इसलिए मानव जीवन में नैतिक मूल्यों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।
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