भूमिका :
साहित्य समाज का दर्पण है। समाज जैसे-जैसे बदलता है, साहित्य भी बदलता रहता है। हिंदी साहित्य में समय-समय पर अनेक आंदोलन हुए जिन्होंने साहित्य को नई दिशा दी। छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद आदि धाराओं के बाद हिंदी साहित्य में आधुनिकतावाद का उदय हुआ। आधुनिकतावाद एक ऐसी साहित्यिक प्रवृत्ति है जो पारंपरिक मूल्यों से आगे बढ़कर व्यक्ति की स्वतंत्रता, अस्तित्व, आत्मसंघर्ष, अस्मिता और बदलती सामाजिक परिस्थितियों को केंद्र में रखती है। यह पश्चिम से प्रभावित अवश्य है, किन्तु हिंदी साहित्य में इसका स्वरूप भारतीय सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संदर्भों में विकसित हुआ।
आधुनिकतावाद की परिभाषा :
‘आधुनिकतावाद’ शब्द की व्याख्या करते हुए आलोचक नामवर सिंह लिखते हैं—
“आधुनिकता का अर्थ केवल नयापन नहीं है, बल्कि यह एक संवेदनात्मक दृष्टि है जिसमें व्यक्ति की अस्मिता, अकेलापन और जीवन का यथार्थ विशेष रूप से उभरता है।”
आधुनिकतावाद की विशेषताएँ :
1. व्यक्ति केंद्रिता –
आधुनिकतावादी साहित्य में व्यक्ति का अकेलापन, उसकी समस्याएँ और जीवन-संघर्ष प्रमुख होते हैं। समाज से अधिक महत्व व्यक्ति की चेतना को दिया जाता है।
2. अस्तित्ववाद की छाया –
जीवन के अर्थहीनता, निरर्थकता और अनिश्चितता की अनुभूति को अस्तित्ववाद कहा जाता है। आधुनिकतावादी रचनाओं में यह भावना स्पष्ट रूप से मिलती है।
3. निराशा और अकेलापन –
आधुनिक जीवन की भागदौड़, मशीन संस्कृति और उपभोक्तावाद के कारण व्यक्ति भीतर से अकेला और निराश होता जा रहा है। यह स्थिति साहित्य में भी अभिव्यक्त हुई।
4. भोगवाद और यथार्थवाद –
पारंपरिक आदर्शवाद की जगह आधुनिक साहित्य में यथार्थ और भोगवादी दृष्टि हावी होती है।
5. नई संवेदना और भाषा –
आधुनिक कवियों और लेखकों ने पारंपरिक काव्यभाषा को तोड़कर अधिक बोलचाल की, व्यंजनात्मक और सांकेतिक भाषा का प्रयोग किया।
6. परंपरा से विद्रोह –
आधुनिकतावाद पारंपरिक मान्यताओं, रूढ़ियों और बंधनों को तोड़कर नवीनता की ओर बढ़ता है।
7. शहरी जीवन का चित्रण –
आधुनिकतावाद में ग्रामीण परिवेश के स्थान पर शहर, महानगर और उनकी समस्याएँ प्रमुख रूप से चित्रित की गईं।
8. नारी चेतना और अस्मिता –
आधुनिकतावादी साहित्य में नारी की स्वतंत्रता, उसकी अस्मिता और अस्तित्व की खोज पर विशेष बल दिया गया।
9. मनोविश्लेषण की प्रवृत्ति –
फ्रायड के मनोविश्लेषण सिद्धांत से प्रभावित होकर आधुनिकतावादी रचनाओं में अवचेतन और अचेतन मन की गहराइयों का चित्रण हुआ।
10. सांकेतिकता और बिंब प्रयोग –
कवियों ने भावनाओं को सीधे न कहकर प्रतीक और बिंबों के माध्यम से अभिव्यक्त किया।
हिंदी साहित्य में आधुनिकतावाद :
हिंदी साहित्य में आधुनिकतावाद लगभग सन् 1960 के बाद प्रमुख रूप से उभरकर आया। प्रयोगवाद और नई कविता के बाद यह आंदोलन हिंदी कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक और आलोचना में व्यापक रूप से दिखाई देता है।
(क) कविता में आधुनिकतावाद
नई कविता (अज्ञेय, शमशेर बहादुर सिंह, मुक्तिबोध, केदारनाथ सिंह आदि) ने आधुनिकतावादी चेतना को गहराई से व्यक्त किया।
अज्ञेय की कविताओं में आत्मसंघर्ष और अस्तित्व की तलाश है।
मुक्तिबोध की कविताओं में समाज की विसंगतियों और व्यक्ति की बेचैनी का गहन चित्रण है।
शमशेर बहादुर सिंह की कविता संवेदनात्मक आधुनिकता का उत्कृष्ट उदाहरण है।
(ख) कहानी में आधुनिकतावाद
1960 के बाद की कहानियों को ‘नई कहानी’ कहा गया।
इसमें व्यक्ति के अकेलेपन, पारिवारिक विघटन, दाम्पत्य संबंधों की दरारें और शहरी जीवन की जटिलताएँ चित्रित हुईं।
मोहन राकेश, राजेंद्र यादव, कमलेश्वर आदि ने आधुनिकतावादी चेतना से युक्त कहानियाँ लिखीं।
(ग) उपन्यास में आधुनिकतावाद
‘नई उपन्यास धारा’ में व्यक्ति की अंतर्दृष्टि, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और अस्मिता पर बल दिया गया।
मोहन राकेश का ‘आषाढ़ का एक दिन’ आधुनिक चेतना से जुड़ा नाटक है।
उपन्यासों में निर्मल वर्मा, श्रीलाल शुक्ल (राग दरबारी में विडंबना), राही मासूम रज़ा, कमलेश्वर आदि के लेखन में आधुनिक जीवन का यथार्थ अभिव्यक्त हुआ।
(घ) नाटक और रंगमंच में आधुनिकतावाद
मोहन राकेश, धर्मवीर भारती, लक्ष्मीनारायण लाल आदि के नाटकों में व्यक्ति की चेतना और समय की जटिलताएँ स्पष्ट रूप से मिलती हैं।
मोहन राकेश के नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ और ‘आधे-अधूरे’ आधुनिक नाट्य साहित्य के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
(ङ) आलोचना में आधुनिकतावाद
नामवर सिंह, विजयदेव नारायण साही, रामविलास शर्मा आदि आलोचकों ने आधुनिक साहित्य की नई दृष्टि को स्पष्ट किया
आधुनिकतावाद की सीमाएँ :
1. अधिक व्यक्तिवाद और निराशा के कारण यह सामाजिक सरोकारों से कटने लगा।
2. जटिल और प्रतीकात्मक भाषा ने इसे आम पाठक से दूर कर दिया।
3. पश्चिमी प्रभाव के कारण कभी-कभी भारतीय संस्कृति से असंगति दिखाई देती है।
निष्कर्ष :
आधुनिकतावाद हिंदी साहित्य की वह धारा है जिसने व्यक्ति की अस्मिता, जीवन के यथार्थ और अस्तित्व के संघर्ष को साहित्य का विषय बनाया। यह साहित्य की नई संवेदना है जो बदलते समय और समाज के साथ-साथ साहित्य को भी नई दिशा प्रदान करती है। हिंदी साहित्य में आधुनिकतावाद ने कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक और आलोचना सभी विधाओं को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि आधुनिकतावाद हिंदी साहित्य की एक सशक्त प्रवृत्ति है, जिसने साहित्य को वर्तमान यथार्थ और मानवीय अस्तित्व की गहराइयों से जोड़ा।