1850 से 1936 तक की हिंदी कविता में नवजागरण की चेतना का स्वरूप स्पष्ट करते हुए उसके प्रमुख स्वरूपों एवं प्रतिनिधि कवियों का विवेचन कीजिए।
प्रस्तावना
हिंदी साहित्य के इतिहास में नवजागरण उस चेतना का नाम है, जिसके अंतर्गत भारतीय समाज ने मध्यकालीन रूढ़ियों, अंधविश्वासों और जड़ताओं से बाहर निकलकर आधुनिक जीवन-मूल्यों, राष्ट्रीय भावना, सामाजिक सुधार और नवीन विचारों की ओर उन्मुख होना आरंभ किया। हिंदी कविता में यह परिवर्तन विशेष रूप से 1850 से 1936 के बीच दिखाई देता है। इस काल में कविता का केंद्र केवल श्रृंगार और व्यक्तिगत भावानुभूति तक सीमित न रहकर समाज, राष्ट्र, जनजीवन, स्वाधीनता, स्त्री-जागरण और सामाजिक सुधार तक विस्तृत हुआ।
हिंदी कविता का यह नवजागरण क्रमशः भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग और छायावाद के आरंभिक चरण से गुजरता हुआ विकसित हुआ।
नवजागरण का अर्थ एवं परिभाषा
‘नवजागरण’ दो शब्दों—‘नव’ और ‘जागरण’—से मिलकर बना है। ‘नव’ का अर्थ है नवीन और ‘जागरण’ का अर्थ है चेतना का उदय। अतः नवजागरण का सामान्य अर्थ है—समाज में नवीन विचारों, चेतना, विवेक, आत्मबोध और परिवर्तन की भावना का उदय।
साहित्य के संदर्भ में नवजागरण उस मानसिक और सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति और समाज रूढ़ियों, अंधविश्वासों, जड़ परंपराओं और सामाजिक विसंगतियों से ऊपर उठकर आधुनिक जीवन-मूल्यों, राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक सुधार, स्वतंत्र विचार और मानवीय दृष्टि की ओर अग्रसर होता है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य के आधुनिक विकास को तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों से जोड़कर देखा है। इस दृष्टि से हिंदी नवजागरण केवल साहित्यिक परिवर्तन नहीं, बल्कि भारतीय समाज में उत्पन्न नवीन सामाजिक, राष्ट्रीय और बौद्धिक चेतना की व्यापक अभिव्यक्ति है।
हिंदी कविता में यह नवचेतना विशेष रूप से 1850 से 1936 के बीच क्रमशः विकसित हुई। भारतेन्दु युग में इसका स्वर राष्ट्रीय और सामाजिक रहा, द्विवेदी युग में इसमें सुधारवादी एवं उद्देश्यपरक चेतना जुड़ी और छायावाद के आरंभिक दौर में यह व्यक्ति-चेतना, स्वतंत्रता और मानवीय संवेदना तक विस्तृत है।
1. हिंदी कविता में नवजागरण की पृष्ठभूमि
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारतीय समाज अनेक सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों से गुजर रहा था। अंग्रेजी शासन, आधुनिक शिक्षा, मुद्रण-व्यवस्था, समाचार-पत्रों और नई ज्ञान-दृष्टि के प्रसार ने भारतीय समाज में आत्मचिंतन की प्रक्रिया को गति दी।
हिंदी कविता ने इन परिवर्तनों को ग्रहण किया और साहित्य में ‘मैं’ से ‘हम’ तथा व्यक्तिगत अनुभूति से सामाजिक चेतना की ओर एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देने लगा।
2. हिंदी कविता में नवजागरण के प्रमुख स्वरूप
(क) राष्ट्रीय चेतना का विकास
नवजागरणकालीन हिंदी कविता की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता राष्ट्रीय भावना है। कवियों ने भारत के गौरवशाली अतीत का स्मरण कर जनता में आत्मगौरव और स्वदेश-प्रेम की भावना उत्पन्न की।
भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने देश की राजनीतिक और आर्थिक स्थिति को अपनी कविता में स्वर दिया। उनकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ—
«“रोवहु सब मिलि के आवहु भारत भाई।
हा हा! भारत दुर्दशा न देखी जाई॥”»
इन पंक्तियों में देश की दुर्दशा के प्रति कवि की व्यथा और राष्ट्रीय चेतना स्पष्ट दिखाई देती है।
इसी प्रकार मैथिलीशरण गुप्त की कविता में राष्ट्रप्रेम व्यापक मानवीय चेतना से जुड़ता है—
«“हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी।”»
यह पंक्ति आत्ममंथन के माध्यम से राष्ट्रीय जागरण की भावना को अभिव्यक्त करती है।
(ख) अतीत के गौरव का पुनर्स्मरण
नवजागरणकालीन कवियों ने भारतीय इतिहास और संस्कृति की ओर पुनः दृष्टि डाली। उद्देश्य था—अतीत के गौरव को याद करके वर्तमान समाज में आत्मविश्वास पैदा करना।
भारतेन्दु युग में भारत के प्राचीन गौरव का स्मरण हुआ और द्विवेदी युग में यह चेतना अधिक व्यवस्थित रूप में दिखाई दी।
मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारत-भारती’ इसका महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। इसमें भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य—तीनों का मूल्यांकन मिलता है।
(ग) सामाजिक सुधार की चेतना
नवजागरण की कविता ने समाज में व्याप्त रूढ़ियों और कुरीतियों की ओर ध्यान आकर्षित किया। बाल-विवाह, अशिक्षा, सामाजिक असमानता, रूढ़िवादिता और स्त्री की दयनीय स्थिति जैसे विषय कविता में आए।
कविता का उद्देश्य केवल मनोरंजन न रहकर समाज को जागरूक करना भी बन गया।
द्विवेदी युग के कवियों ने साहित्य को सामाजिक उपयोगिता से जोड़ते हुए ऐसी रचनाएँ कीं, जिनमें समाज-सुधार की स्पष्ट भावना दिखाई देती है।
(घ) स्त्री-जागरण
नवजागरणकालीन हिंदी कविता में स्त्री के प्रश्न को भी महत्त्व प्राप्त हुआ। स्त्री-शिक्षा, स्त्री की गरिमा और उसके अधिकारों के प्रति संवेदना विकसित हुई।
मैथिलीशरण गुप्त की ‘यशोधरा’ और ‘साकेत’ में स्त्री के व्यक्तित्व और उसके त्याग, संवेदना तथा आत्मसम्मान को महत्त्वपूर्ण स्थान मिलता है।
‘साकेत’ की उर्मिला का चरित्र विशेष रूप से उल्लेखनीय है। राम के वनगमन की कथा में उपेक्षित रह जाने वाली उर्मिला को गुप्त ने स्वतंत्र भाव-जगत और व्यक्तित्व प्रदान किया।
(ङ) जन-जागरण
नवजागरण की कविता का संबंध सामान्य जनता से बढ़ा। कवियों ने जनता को अपने अधिकारों, कर्तव्यों और सामाजिक स्थिति के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया।
द्विवेदी युग में कविता का स्वर अधिक शिक्षाप्रद, उद्देश्यपरक और समाजोन्मुख हुआ। कविता में किसान, श्रमिक, सामान्य मनुष्य और समाज की समस्याएँ प्रवेश करने लगीं।
(च) भाषा का जागरण और खड़ी बोली का विकास
हिंदी नवजागरण का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष भाषा का परिवर्तन भी है। ब्रजभाषा की दीर्घ काव्य-परंपरा के साथ-साथ खड़ी बोली हिंदी आधुनिक विचारों और अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनने लगी।
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने खड़ी बोली हिंदी को साहित्यिक अभिव्यक्ति की सुदृढ़ भाषा बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके संपादन में ‘सरस्वती’ पत्रिका ने अनेक कवियों और लेखकों को मंच दिया।
खड़ी बोली के विकास ने हिंदी कविता को आधुनिक विषयों और विचारों के लिए अधिक व्यापक अभिव्यक्ति प्रदान की।
(छ) राष्ट्रीय स्वाभिमान और स्वाधीनता की भावना
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में हिंदी कविता में राष्ट्रीय स्वाभिमान और स्वाधीनता की चेतना अधिक तीव्र हुई।
माखनलाल चतुर्वेदी की कविता में राष्ट्र के प्रति समर्पण और बलिदान की भावना अत्यंत प्रभावशाली है—
«“मुझे तोड़ लेना वनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जाएँ वीर अनेक।”»
‘पुष्प की अभिलाषा’ की ये पंक्तियाँ राष्ट्र के लिए त्याग और बलिदान की भावना को व्यक्त करती हैं।
(ज) आत्मगौरव और कर्म की प्रेरणा
नवजागरणकालीन कविता ने निराशा के स्थान पर कर्म, संघर्ष और आत्मविश्वास की प्रेरणा दी। कवियों ने भारतीय समाज को अपने अतीत और वर्तमान को पहचानकर भविष्य के निर्माण के लिए प्रेरित किया।
मैथिलीशरण गुप्त की कविता में भी बार-बार आत्मचिंतन और कर्मशीलता का आग्रह मिलता है।
(झ) धार्मिकता से मानवीयता की ओर
नवजागरणकालीन कविता में धार्मिक और पौराणिक कथाओं का प्रयोग अवश्य हुआ, लेकिन उनका उद्देश्य केवल धार्मिक भाव उत्पन्न करना नहीं था। कवियों ने पौराणिक पात्रों के माध्यम से मानवीय मूल्यों, कर्तव्य, त्याग, न्याय और सामाजिक आदर्शों को व्यक्त किया।
‘साकेत’ में रामकथा के माध्यम से पारिवारिक, सामाजिक और मानवीय मूल्यों को नया अर्थ दिया गया।
(ञ) व्यक्ति-चेतना का विकास
नवजागरण के आगे बढ़ने के साथ कविता में व्यक्ति की आंतरिक अनुभूति भी महत्त्वपूर्ण होने लगी। यही प्रवृत्ति आगे चलकर छायावाद में अधिक विकसित हुई।
जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और महादेवी वर्मा की आरंभिक काव्य-चेतना में व्यक्ति, प्रकृति, स्वतंत्रता और आत्मानुभूति के नए स्वर दिखाई देते हैं।
इस प्रकार 1936 तक आते-आते नवजागरण की सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना के साथ कविता में व्यक्ति की स्वतंत्र सत्ता और भाव-जगत भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया।
3. प्रमुख कवि और नवजागरण
1. भारतेन्दु हरिश्चंद्र
भारतेन्दु ने हिंदी कविता को देश की तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों से जोड़ा। उनकी रचनाओं में देशभक्ति, राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक व्यंग्य प्रमुख हैं।
2. प्रतापनारायण मिश्र
उन्होंने सामाजिक कुरीतियों और रूढ़ियों पर व्यंग्य करते हुए जन-जागरण का कार्य किया।
3. बालकृष्ण भट्ट
उनकी रचनाओं में सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना के साथ आधुनिक विचार-बोध दिखाई देता है।
4. महावीर प्रसाद द्विवेदी
उन्होंने हिंदी कविता को अनुशासन, उद्देश्यपरकता, सामाजिक उपयोगिता और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ा तथा खड़ी बोली को सुदृढ़ आधार दिया।
5. मैथिलीशरण गुप्त
गुप्त जी ने राष्ट्रीयता, सामाजिक सुधार, नारी-चेतना, सांस्कृतिक गौरव और मानवीय मूल्यों को अपनी कविता का आधार बनाया। ‘भारत-भारती’, ‘साकेत’ और ‘यशोधरा’ इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
6. माखनलाल चतुर्वेदी
उनकी कविता में राष्ट्रप्रेम, त्याग और स्वतंत्रता की आकांक्षा अत्यंत प्रभावशाली रूप में व्यक्त हुई।
7. छायावादी कवि
1936 तक हिंदी कविता में प्रसाद, पंत, निराला और महादेवी जैसे कवियों ने नवजागरण को आत्मचेतना, व्यक्तिवाद, प्रकृति-बोध और मानवीय संवेदना से समृद्ध किया।
4. 1850 से 1936 तक नवजागरण का विकास-क्रम
हिंदी कविता के नवजागरण को तीन प्रमुख चरणों में समझा जा सकता है—
1850–1900 : भारतेन्दु युग
→ राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक सुधार, देश-दशा की चिंता और आधुनिक दृष्टि।
1900–1920 : द्विवेदी युग
→ भाषा-परिष्कार, सामाजिक सुधार, राष्ट्रीयता, नैतिकता और उद्देश्यपरक काव्य।
1920–1936 : छायावाद का विकास
→ व्यक्ति-चेतना, आत्मानुभूति, प्रकृति, स्वतंत्रता, मानवीय संवेदना और नवीन सौंदर्य-बोध।
इस प्रकार हिंदी कविता का नवजागरण सामाजिक चेतना से राष्ट्रीय चेतना और वहाँ से व्यक्ति-चेतना की ओर निरंतर विकसित होता दिखाई देता है।
निष्कर्ष
1850 से 1936 तक की हिंदी कविता हिंदी नवजागरण की विकासशील चेतना का सशक्त दस्तावेज है। भारतेन्दु युग ने देश और समाज को जागृत करने का स्वर दिया, द्विवेदी युग ने उसे भाषिक अनुशासन, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय उद्देश्य प्रदान किया तथा छायावाद ने उसी जागरण को व्यक्ति की आत्मचेतना, स्वतंत्रता और मानवीय संवेदना से समृद्ध किया।
इस काल की हिंदी कविता ने साहित्य को जीवन के अधिक निकट लाकर राष्ट्रीय स्वाभिमान, सामाजिक सुधार, स्त्री-जागरण, जनचेतना, भाषा-विकास और व्यक्ति की स्वतंत्र सत्ता को प्रतिष्ठित किया। इसलिए 1850 से 1936 तक की हिंदी कविता को आधुनिक हिंदी साहित्य के नवजागरण की एक महत्त्वपूर्ण और निर्णायक यात्रा के रूप में देखा जा सकता है।
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