भूमिका
हिंदी पत्रकारिता का विकास हिंदी भाषा और साहित्य के विकास के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। भारतेंदु युग में हिंदी पत्रकारिता ने जिस नवजागरण, सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय भावना का सूत्रपात किया, द्विवेदी युग में उसे अधिक व्यवस्थित, गंभीर और उद्देश्यपूर्ण स्वरूप प्राप्त हुआ। बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में हिंदी की पत्र-पत्रिकाएँ साहित्यिक अभिरुचि के निर्माण के साथ-साथ समाज-सुधार, राष्ट्रीय चेतना, भाषा-परिष्कार और जन-जागरण का माध्यम बनीं।
प्रस्तावना
सामान्यतः 1900 से 1920 ई. के काल को हिंदी साहित्य में द्विवेदी युग कहा जाता है। इस युग का नाम आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर पड़ा। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में यह काल अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस समय पत्रकारिता का उद्देश्य केवल घटनाओं और समाचारों को प्रकाशित करना नहीं था, बल्कि जनता को शिक्षित करना, सामाजिक कुरीतियों के प्रति जागरूक करना, राष्ट्रीय भावना को विकसित करना और हिंदी भाषा को परिष्कृत करना भी था।
इस युग में ‘सरस्वती’, ‘भारत मित्र’, ‘अभ्युदय’, ‘प्रताप’, ‘प्रभा’, ‘मर्यादा’ आदि पत्र-पत्रिकाओं ने हिंदी पत्रकारिता को व्यापक स्वरूप प्रदान किया। विशेष रूप से ‘सरस्वती’ ने खड़ी बोली हिंदी को परिमार्जित और व्यवस्थित करने तथा साहित्य की अनेक विधाओं को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
द्विवेदी युग के बाद हिंदी पत्रकारिता की यह परंपरा और अधिक विस्तृत हुई। इसी क्रम में ‘माधुरी’, ‘मतवाला’ और ‘विशाल भारत’ जैसी पत्रिकाओं ने साहित्यिक पत्रकारिता को नई दृष्टि, नवीन तेवर और व्यापक वैचारिक धरातल प्रदान किया। इसलिए इन पत्रिकाओं का उल्लेख हिंदी पत्रकारिता की विकास-परंपरा को पूर्णता में समझने के लिए आवश्यक है।
1. सरस्वती
‘सरस्वती’ हिंदी पत्रकारिता और साहित्यिक पत्रकारिता की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं में गिनी जाती है। इसका प्रथम अंक जनवरी 1900 में इंडियन प्रेस, इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ। इसके आरंभिक संपादकों में श्यामसुंदर दास आदि का योगदान रहा, किंतु 1903 में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में आने के बाद ‘सरस्वती’ हिंदी साहित्य की अत्यंत प्रभावशाली पत्रिका बन गई। द्विवेदी जी ने लगभग 1920 तक इसका संपादन किया।
प्रमुख विशेषताएँ
1. भाषा-परिष्कार:
‘सरस्वती’ का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान हिंदी भाषा को परिमार्जित, व्यवस्थित और व्याकरणसम्मत बनाना था। द्विवेदी जी ने लेखकों की भाषा और वर्तनी का संस्कार किया। उनके प्रयासों से खड़ी बोली हिंदी साहित्य की सशक्त भाषा के रूप में स्थापित हुई।
2. साहित्यिक विधाओं का विकास:
इसमें कविता, कहानी, निबंध, आलोचना, इतिहास, संस्कृति, विज्ञान आदि विविध विषयों की सामग्री प्रकाशित होती थी। इस प्रकार ‘सरस्वती’ ने साहित्य को व्यापक विषय-क्षेत्र प्रदान किया।
3. नए साहित्यकारों को मंच:
इस पत्रिका के माध्यम से अनेक नए कवि और लेखक साहित्यिक जगत में प्रतिष्ठित हुए। मैथिलीशरण गुप्त आदि रचनाकारों के साहित्यिक विकास में ‘सरस्वती’ की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।
4. सामाजिक सुधार:
बाल-विवाह, अशिक्षा, स्त्री-स्थिति, सामाजिक रूढ़ियों आदि समस्याओं पर विचार प्रस्तुत किए गए। साहित्य को समाजोपयोगी बनाने की दृष्टि इस पत्रिका में स्पष्ट दिखाई देती है।
5. राष्ट्रीय चेतना:
देश, समाज और भारतीय संस्कृति के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना ‘सरस्वती’ की प्रमुख विशेषताओं में था।
इस प्रकार ‘सरस्वती’ ने हिंदी भाषा, साहित्य और समाज—तीनों को प्रभावित किया और द्विवेदी युग की साहित्यिक चेतना को दिशा दी।
2. प्रताप
‘प्रताप’ का प्रकाशन 1913 ई. में कानपुर से हुआ और इसके संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी थे। यह मूलतः साप्ताहिक पत्र था और राष्ट्रीय चेतना तथा जन-सरोकारों से जुड़ी पत्रकारिता के लिए प्रसिद्ध हुआ।
प्रमुख विशेषताएँ
1. राष्ट्रीय चेतना:
‘प्रताप’ ने स्वतंत्रता आंदोलन के वातावरण में देशभक्ति और राष्ट्रीय जागरण को स्वर दिया।
2. निर्भीक पत्रकारिता:
गणेश शंकर विद्यार्थी ने अन्याय और शोषण के विरुद्ध निर्भीक होकर आवाज उठाई। उनकी पत्रकारिता सत्ता के दबाव से प्रभावित होने के बजाय जनहित के प्रश्नों को सामने लाने के लिए जानी गई।
3. किसान और श्रमिकों के प्रश्न:
‘प्रताप’ ने सामान्य जनता, किसानों और वंचित वर्गों की समस्याओं को प्रमुखता दी। विद्यार्थी जी की पत्रकारिता में जनपक्षधरता स्पष्ट दिखाई देती है।
4. सामाजिक समरसता:
सामाजिक एकता और सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश भी इसकी पत्रकारिता का महत्त्वपूर्ण पक्ष था।
अतः ‘प्रताप’ ने हिंदी पत्रकारिता को राष्ट्रीयता, निर्भीकता और जनसरोकार का स्वर प्रदान किया।
3. माधुरी
‘माधुरी’ का प्रकाशन 1922 ई. में हुआ। इसलिए इसे कालक्रम की दृष्टि से द्विवेदी युग की पत्रिका न मानकर द्विवेदी युग के बाद की साहित्यिक पत्रकारिता के रूप में रखना अधिक उचित है। हिंदी साहित्य के विकास में इसका महत्त्व अत्यंत उल्लेखनीय रहा। ‘माधुरी’ ने बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक की साहित्यिक चेतना को अभिव्यक्ति देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रमुख विशेषताएँ
1. साहित्यिकता:
‘माधुरी’ में कविता, कहानी, निबंध, आलोचना आदि साहित्यिक विधाओं को प्रमुख स्थान मिला।
2. नवीन साहित्यिक चेतना:
इस पत्रिका ने बदलती हुई सामाजिक परिस्थितियों और नवीन साहित्यिक संवेदनाओं को अभिव्यक्ति दी।
3. रचनाकारों को मंच:
समकालीन साहित्यकारों की रचनाओं को प्रकाशित करके इसने हिंदी साहित्य के विकास में योगदान दिया।
4. साहित्य और समाज का संबंध:
‘माधुरी’ की रचनात्मक सामग्री में सामाजिक जीवन, मानवीय संवेदना और बदलती मानसिकता के स्वर दिखाई देते हैं।
इस प्रकार ‘माधुरी’ ने द्विवेदी युग की साहित्यिक पत्रकारिता की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उसे अधिक आधुनिक और विविधतापूर्ण स्वरूप प्रदान किया।
4. मतवाला
‘मतवाला’ हिंदी की महत्त्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं में रही। इसका संबंध बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक की साहित्यिक चेतना से है। ‘मतवाला’ ने हिंदी पत्रकारिता में स्वतंत्र विचार, व्यंग्य, विद्रोही चेतना और रूढ़ि-विरोधी दृष्टिकोण को विशेष स्थान दिया। साहित्यिक इतिहास में ‘मतवाला’, ‘माधुरी’ और ‘सुधा’ जैसी पत्रिकाएँ उस दौर की साहित्यिक हलचलों को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण मानी जाती हैं।
प्रमुख विशेषताएँ
1. स्वतंत्र और निर्भीक विचार:
‘मतवाला’ ने रूढ़ और जड़ विचारों के विरुद्ध स्वतंत्र चिंतन को प्रोत्साहित किया।
2. व्यंग्यात्मक तेवर:
सामाजिक और साहित्यिक विसंगतियों पर व्यंग्य इसकी विशिष्ट प्रवृत्तियों में रहा।
3. नवीन साहित्य का समर्थन:
नई साहित्यिक प्रतिभाओं और नई रचनात्मक प्रवृत्तियों को स्थान मिला।
4. रूढ़ि-विरोध:
परंपरागत मान्यताओं को बिना विचार किए स्वीकार करने के स्थान पर प्रश्न करने की प्रवृत्ति को बल मिला।
इस दृष्टि से ‘मतवाला’ हिंदी पत्रकारिता में स्वतंत्र चेतना और नवीन साहित्यिक दृष्टि का प्रतिनिधि बनकर सामने आया।
5. विशाल भारत
‘विशाल भारत’ भी हिंदी की महत्त्वपूर्ण साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिकाओं में रही। बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक की साहित्यिक पत्रकारिता में इसका महत्त्व उल्लेखनीय था। ‘मतवाला’, ‘माधुरी’ और ‘विशाल भारत’ जैसी पत्रिकाओं ने हिंदी साहित्य को व्यापक वैचारिक और सामाजिक संदर्भों से जोड़ा।
प्रमुख विशेषताएँ
1. व्यापक दृष्टिकोण:
‘विशाल भारत’ का दृष्टिकोण केवल साहित्य तक सीमित न रहकर सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय प्रश्नों तक विस्तृत था।
2. राष्ट्रीय चेतना:
देश और समाज से जुड़े प्रश्नों को साहित्यिक और वैचारिक रूप में सामने लाने का प्रयास किया गया।
3. साहित्य और समाज का समन्वय:
पत्रिका ने साहित्य को सामाजिक जीवन से जोड़ने का कार्य किया।
4. सांस्कृतिक चेतना:
भारतीय संस्कृति, समाज और राष्ट्रीय जीवन से संबंधित विषयों को स्थान देकर सांस्कृतिक दृष्टि को व्यापक बनाया।
इस प्रकार ‘विशाल भारत’ ने साहित्यिक पत्रकारिता को व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ प्रदान किया।
द्विवेदी युगीन पत्रकारिता की प्रमुख विशेषताएँ
द्विवेदी युग और उससे विकसित हिंदी पत्रकारिता की प्रमुख विशेषताओं को निम्न रूप में देखा जा सकता है—
1. हिंदी भाषा का परिष्कार और मानकीकरण।
2. खड़ी बोली का साहित्यिक भाषा के रूप में विकास।
3. साहित्य को समाजोपयोगी बनाने की भावना।
4. राष्ट्रीय चेतना और देशप्रेम की अभिव्यक्ति।
5. सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जागरण।
6. स्त्री-शिक्षा और सामाजिक सुधार का समर्थन।
7. नई साहित्यिक प्रतिभाओं को मंच प्रदान करना।
8. निबंध, कहानी, आलोचना और कविता जैसी विधाओं का विकास।
9. पत्रकारिता में तर्क, तथ्य और विचार को महत्त्व।
10. बाद की पत्रिकाओं में स्वतंत्र चिंतन, व्यंग्य और नवीन साहित्यिक चेतना का विकास।
निष्कर्ष
अतः स्पष्ट है कि हिंदी पत्रकारिता के विकास में द्विवेदी युग का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। ‘सरस्वती’ ने भाषा और साहित्य को अनुशासन तथा परिष्कार प्रदान किया, जबकि ‘प्रताप’ ने पत्रकारिता को राष्ट्रीय और जनपक्षीय स्वर दिया। इसके बाद ‘माधुरी’, ‘मतवाला’ और ‘विशाल भारत’ जैसी पत्रिकाओं ने साहित्यिक पत्रकारिता की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उसमें नवीनता, स्वतंत्र चिंतन, सामाजिक चेतना और व्यापक सांस्कृतिक दृष्टि का समावेश किया।
इस प्रकार हिंदी पत्रकारिता केवल तत्कालीन घटनाओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने वाला माध्यम नहीं रही, बल्कि उसने भाषा के निर्माण, साहित्य के विकास, सामाजिक जागरण और राष्ट्रीय चेतना के प्रसार में सक्रिय भूमिका निभाई। यही कारण है कि हिंदी साहित्य के विकास का इतिहास हिंदी पत्रकारिता के इतिहास के बिना अधूरा माना जाता है।
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