प्रश्न : निराला की कविता ‘राम की शक्ति पूजा’ का मूल उद्देश्य, प्रतिपाद्य तथा उसकी कथा के प्रमुख बिंदुओं पर विस्तार से विवेचन कीजिए।
भूमिका
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ आधुनिक हिंदी कविता के प्रगतिशील, प्रयोगशील और वैचारिक कवि माने जाते हैं। उनकी कविता ‘राम की शक्ति पूजा’ उनकी सर्वश्रेष्ठ कृतियों में गिनी जाती है। यह महाकाव्यात्मक कविता न केवल राम की वीरता और संघर्ष का चित्रण करती है, बल्कि उसमें निराला का गहरा मानवीय दर्शन, जीवन-संघर्ष का सत्य और शक्ति की अनिवार्यता का बोध भी समाहित है। इसमें राम केवल पौराणिक नायक न होकर मानवीय मूल्य, त्याग और शक्ति-साधना के प्रतीक रूप में चित्रित होते हैं।
(क) कविता का मूल उद्देश्य
1. शक्ति की अनिवार्यता का प्रतिपादन –
इस कविता का मूल उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि बिना शक्ति-साधना के कोई भी बड़ा कार्य या संघर्ष सफल नहीं हो सकता। राम जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम को भी रावण जैसे सामर्थ्यवान शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए शक्ति की पूजा करनी पड़ी।
2. मानव-जीवन का संघर्ष और साधना –
निराला यह संदेश देते हैं कि जीवन में कठिनाइयाँ कितनी भी बड़ी क्यों न हों, आत्मबल, धैर्य और साधना से उन्हें जीता जा सकता है। राम का वनवास और फिर रावण से युद्ध इस संघर्षशीलता का प्रतीक है।
3. आध्यात्मिकता और कर्म का संतुलन –
कवि यह दिखाते हैं कि केवल भक्ति से विजय संभव नहीं, बल्कि भक्ति और शक्ति दोनों का संगम आवश्यक है। शक्ति की साधना और कर्म की निष्ठा से ही जीवन सार्थक होता है।
4. राष्ट्रवादी और युगीन संदेश –
कविता लिखे जाने के समय भारत स्वतंत्रता-संग्राम से गुजर रहा था। निराला ने राम के माध्यम से भारतीय जनता को यह प्रेरणा दी कि अन्याय और दमनकारी शक्तियों से लड़ने के लिए शक्ति-संग्रह और त्याग की आवश्यकता है।
(ख) कविता का प्रतिपाद्य
कविता का प्रतिपाद्य है – राम के जीवन की वह घटना जब रावण से युद्ध करने के पूर्व उन्होंने देवी दुर्गा की आराधना की और शक्ति की साधना के माध्यम से विजय प्राप्त की।
यह प्रतिपाद्य यह दर्शाता है कि चाहे राम जैसे दिव्य पुरुष क्यों न हों, उन्हें भी शक्ति-साधना का मार्ग अपनाना पड़ा।
राम की साधना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि मानवीय धैर्य, आत्मसंयम, त्याग और संघर्षशीलता का प्रतीक है।
इस साधना के माध्यम से कवि यह प्रतिपादित करते हैं कि हर बड़ा कार्य शक्ति और तपस्या की मांग करता है।
(ग) कविता की कथा-संरचना : प्रमुख बिंदु
कविता की कथा महाकाव्यात्मक विस्तार रखती है। इसमें राम, लक्ष्मण, हनुमान, विभीषण, वानर-सैन्य आदि पात्रों के साथ रावण की विशाल शक्ति का वर्णन है। कथा को निम्न बिंदुओं में संक्षेपित किया जा सकता है –
1. रावण से युद्ध की तैयारी
राम रावण से युद्ध करने को तत्पर होते हैं।
रावण की शक्ति और सामर्थ्य का वर्णन मिलता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह युद्ध सरल नहीं है।
युद्धभूमि में उतरने से पहले राम अपने आपको कमजोर अनुभव करते हैं।
2. विभीषण की सलाह
विभीषण राम को यह परामर्श देते हैं कि रावण को जीतने के लिए शक्ति की देवी की पूजा करनी होगी।
वे बताते हैं कि रावण स्वयं भी शक्ति का उपासक है, इसलिए उसे हराने के लिए राम को भी शक्ति-साधना करनी चाहिए।
3. राम की साधना का आरंभ
राम शक्ति की साधना प्रारंभ करते हैं।
वे चौदह दिन तक देवी दुर्गा की पूजा करते हैं और चौदह कमल अर्पित करने का संकल्प लेते हैं।
साधना कठिन है, लेकिन राम पूरी निष्ठा से इसे निभाते हैं।
4. अंतिम परीक्षा और आत्मबल का परिचय
जब चौदहवें दिन एक कमल कम पड़ जाता है, तब राम संकट में पड़ जाते हैं।
किंतु वे हार नहीं मानते। वे निश्चय करते हैं कि अपनी एक आंख (जिसे ‘कमलनयन’ कहा गया है) देवी को अर्पित कर देंगे।
यही क्षण कविता का चरम है, जब राम आत्मबल, त्याग और शक्ति का सर्वोच्च परिचय देते हैं।
5. देवी का प्रसन्न होना
राम की इस अटूट श्रद्धा और त्याग को देखकर देवी दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं।
वे प्रकट होकर राम को आशीर्वाद देती हैं और विजय का वरदान प्रदान करती हैं।
6. युद्ध और विजय का संकेत
शक्ति की साधना पूर्ण होने के बाद राम रावण से युद्ध करते हैं और विजय प्राप्त करते हैं।
यह विजय केवल एक युद्ध की नहीं बल्कि धैर्य, श्रद्धा और साधना की विजय के रूप में देखी जा सकती है।
(घ) कविता की प्रमुख विशेषताएँ
1. महाकाव्यात्मक शैली –
कविता का कथानक, पात्र और युद्ध की पृष्ठभूमि इसे महाकाव्यात्मक स्वर प्रदान करते हैं।
2. मानवीय रूप में राम –
निराला ने राम को देवत्व से अधिक मानवीय रूप में प्रस्तुत किया है। वे संघर्ष करते हैं, साधना करते हैं और त्याग करते हैं।
3. शक्ति और भक्ति का संगम –
कविता में शक्ति की साधना और भक्ति दोनों का अद्भुत समन्वय है।
4. राष्ट्रवादी चेतना –
इस कविता में भारत के स्वतंत्रता-संग्राम का संकेत छिपा हुआ है। राम का संघर्ष भारतीय जनता के संघर्ष का प्रतीक बनता है।
5. भावात्मक ऊँचाई –
अंतिम प्रसंग, जब राम अपनी आंख अर्पित करने का निश्चय करते हैं, कविता को चरम भावुकता और आदर्श की ऊँचाई तक पहुँचा देता है।
6. भाषा और शैली –
कविता की भाषा संस्कृतनिष्ठ, वीर-रसप्रधान और ओजस्वी है। निराला ने अलंकार और छंद का सुंदर प्रयोग किया है।
(ङ) समग्र मूल्यांकन
‘राम की शक्ति पूजा’ केवल धार्मिक आख्यान नहीं है, बल्कि यह कविता मनुष्य के जीवन में त्याग, साधना, शक्ति-संग्रह और धैर्य की महत्ता का संदेश देती है।
यह कविता दिखाती है कि कोई भी लक्ष्य बिना आत्मबल और शक्ति-साधना के प्राप्त नहीं हो सकता।
राम का संघर्ष हर मनुष्य का संघर्ष है और उनकी विजय हर उस साधना की विजय है जो सच्चे मन से की जाती है।
निराला ने इस कविता में धर्म, दर्शन, राष्ट्रवाद और मानवीय मूल्य सभी का अद्भुत समन्वय किया है।
निष्कर्ष
‘राम की शक्ति पूजा’ का मूल उद्देश्य यही है कि शक्ति के बिना कोई भी बड़ा कार्य या संघर्ष संभव नहीं है। यह कविता न केवल राम की कथा कहती है, बल्कि प्रत्येक युग के मनुष्य को यह प्रेरणा देती है कि जीवन की कठिनाइयों से लड़ने के लिए आत्मबल, तपस्या और शक्ति-साधना अनिवार्य है। निराला ने इसमें जिस मानवीय, राष्ट्रवादी और दार्शनिक चेतना का समावेश किया है, वह इस कविता को हिंदी साहित्य की अमर कृति बनाता है।