1. भूमिका
हिंदी साहित्य में कविता का विशेष स्थान है। समय के साथ कविता का रूप, विषय और संवेदनाएँ बदलती रही हैं। यदि हम समकालीन हिंदी कविता की बात करें तो यह केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं है बल्कि सामाजिक यथार्थ और मनुष्य के बहुआयामी संघर्षों का दस्तावेज़ है। यह कविता आधुनिकतावादी जटिलता और आत्मकेंद्रितता से आगे बढ़कर आम जनजीवन के प्रश्नों से जुड़ती है। समाज में व्याप्त शोषण, अन्याय, स्त्री-असमानता, दलित-पीड़ा, सांप्रदायिकता, राजनीति की विसंगतियाँ, वैश्वीकरण और तकनीकी विकास के दुष्परिणाम—सब समकालीन हिंदी कविता के केंद्र में आते हैं। इस दृष्टि से यह कविता आज के समाज का आईना कही जा सकती है।
2. समकालीन हिंदी कविता की परिभाषा
समकालीन हिंदी कविता वह है जिसमें वर्तमान समय की सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और मानवीय परिस्थितियों का सजीव चित्रण मिलता है। यह कविता यथार्थ से मुठभेड़ करती है और मनुष्य की अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्षरत दिखाई देती है।
सरल शब्दों में – “समकालीन हिंदी कविता वह है जो वर्तमान भारतीय समाज की समस्याओं, संघर्षों और आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करते हुए जनसामान्य के जीवन से गहरे रूप में जुड़ती है।”
3. समकालीन हिंदी कविता का स्वरूप
समकालीन हिंदी कविता का स्वरूप अत्यंत बहुआयामी और जटिल है, जिसमें कई विशेषताएँ उभरकर सामने आती हैं :
1. यथार्थपरकता – इसमें कल्पना या स्वप्नलोक की अपेक्षा वास्तविक जीवन और उसकी समस्याओं का चित्रण मिलता है।
2. भाषा की सादगी – इस कविता की भाषा जटिल और अलंकारिक न होकर बोलचाल की सहज भाषा है।
3. लोक और जन संस्कृति का समावेश – इसमें लोकगीत, लोकभाषा और क्षेत्रीय शब्दों का प्रयोग मिलता है।
4. आम आदमी का चित्रण – किसान, मजदूर, स्त्री, दलित, बेरोजगार, विद्यार्थी जैसे सामान्य पात्र केंद्र में रहते हैं।
5. संवेदनशीलता और विद्रोह – यह कविता केवल भावुकता तक सीमित नहीं है बल्कि अन्याय और शोषण के विरुद्ध विद्रोह की चेतना जगाती है।
6. विषय-वस्तु की व्यापकता – राजनीति, धर्म, स्त्री-स्वतंत्रता, जातिवाद, पर्यावरण, तकनीक, वैश्वीकरण, बेरोजगारी आदि विविध विषय शामिल हैं।
7. सामूहिक सरोकार – आत्मकेंद्रितता से हटकर समाज और मनुष्य की सामूहिक समस्याएँ केंद्र में आती हैं।
4. समकालीन हिंदी कविता की प्रमुख प्रवृत्तियाँ
(क) सामाजिक यथार्थ की प्रवृत्ति
यह प्रवृत्ति समकालीन कविता का मूल आधार है।
कवि अपने समाज की गरीबी, असमानता, अन्याय और राजनीतिक भ्रष्टाचार पर सीधा प्रहार करता है।
दुष्यंत कुमार की कविताएँ “सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं…” सामाजिक यथार्थ की गहन अभिव्यक्ति हैं।
(ख) स्त्रीवादी चेतना
समकालीन हिंदी कविता में स्त्री अपने अधिकारों और अस्मिता को लेकर मुखर हुई है।
स्त्री को केवल दया और करुणा की प्रतीक न मानकर एक स्वतंत्र और संघर्षशील व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
कात्यायनी, अनामिका, नीलिमा चौहान आदि कवयित्रियों ने स्त्री जीवन की विडंबनाओं को मार्मिकता से अभिव्यक्त किया है।
(ग) दलित चेतना
समकालीन कविता में दलित अनुभव और अस्मिता को नया स्वर मिला।
जातिगत शोषण, अपमान और दलित समाज के संघर्षों को सशक्त रूप से व्यक्त किया गया।
ओमप्रकाश वाल्मीकि, हीरालाल राजस्थानी, कंवल भारती जैसे कवियों की रचनाएँ इसका प्रमाण हैं।
(घ) जनवादी चेतना
यह प्रवृत्ति मजदूर-किसान, निम्न वर्ग और वंचित तबकों के जीवन को कविता का केंद्र बनाती है।
अदम गोंडवी ने कहा – “तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है, मगर ये आँकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है।”
इस प्रकार जनवादी कविता जनसामान्य के संघर्ष की कविता है।
(ङ) सांप्रदायिकता और राजनीतिक विसंगतियों के विरुद्ध
समकालीन कवियों ने सांप्रदायिक दंगे, धार्मिक कट्टरता और राजनीति की अवसरवादी प्रवृत्तियों पर प्रहार किया।
लोकतंत्र के संकट और जनहित की उपेक्षा पर तीखी टिप्पणियाँ मिलती हैं।
(च) पर्यावरण और प्रकृति-चेतना
प्रदूषण, पर्यावरणीय असंतुलन और प्रकृति विनाश पर भी कवियों ने चिंता व्यक्त की है।
हरित चेतना और पृथ्वी के संरक्षण का स्वर इन कविताओं में मिलता है।
(छ) वैश्वीकरण और उपभोक्तावाद के खिलाफ
समकालीन कविता ने पूँजीवाद, बाजारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति के दुष्परिणामों को उजागर किया।
इसमें आर्थिक असमानता और गरीबों की स्थिति को तीखे अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया है।
(ज) मानवीय मूल्यों की खोज
समकालीन कविता का एक बड़ा लक्ष्य मानवीय मूल्यों को पुनः स्थापित करना है।
सहयोग, सहानुभूति, करुणा, प्रेम, भाईचारे की भावना को महत्व दिया गया है।
5. प्रमुख कवि और उनकी भूमिका
1. दुष्यंत कुमार – समकालीन ग़ज़ल और जनपक्षधरता के प्रतिनिधि।
2. अदम गोंडवी – गाँव, किसान और शोषित वर्ग की आवाज़।
3. कुमार विश्वास – युवाओं की संवेदनाओं और प्रेम की अभिव्यक्ति।
4. कात्यायनी, अनामिका – स्त्रीवादी चेतना।
5. ओमप्रकाश वाल्मीकि – दलित चेतना।
6. राजेश जोशी, अशोक वाजपेयी – समकालीन यथार्थ और सौंदर्य चेतना।
6. समकालीन हिंदी कविता की विशेषताएँ (बिंदुवार)
यथार्थपरक और जीवन-संघर्ष की झलक।
साधारण भाषा और बोलचाल की अभिव्यक्ति।
सामाजिक-राजनीतिक सरोकार।
वंचित और शोषित वर्ग का प्रतिनिधित्व।
स्त्री और दलित अस्मिता पर बल।
सामूहिक मानवीय मूल्यों की रक्षा।
लोकतंत्र, समानता और न्याय की खोज।
7. निष्कर्ष
समकालीन हिंदी कविता केवल साहित्यिक प्रयोग भर नहीं है, यह समाज के सबसे गहरे संकटों और संघर्षों की गवाही देती है। इसमें आम आदमी की पीड़ा, स्त्री की आवाज, दलितों की व्यथा, पर्यावरण की चिंता और राजनीतिक विसंगतियों के प्रति प्रतिरोध का स्वर मिलता है। यह कविता व्यक्ति को जागरूक बनाती है और सामाजिक चेतना जगाती है। इसलिए कहा जा सकता है कि –
“समकालीन हिंदी कविता वर्तमान युग के संघर्षों का दस्तावेज़ है, जिसमें मनुष्य की अस्मिता, स्वतंत्रता और न्याय के लिए एक सतत जिजीविषा दिखाई देती है।”