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गुरुवार, 8 जनवरी 2026

आलोचना किसे कहते हैं?परिभाषा, विशेषताएं, गुण , प्रकार

आलोचना : परिभाषा, विशेषताएँ और गुण 
भूमिका
साहित्य, कला, दर्शन या किसी भी ज्ञान क्षेत्र में आलोचना एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। यह केवल किसी रचना की तुलना, विश्लेषण या निंदा करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह रचना की गहन समझ और उसके सार तत्वों की पहचान करने की विधि है। आलोचना न केवल लेखक या कलाकार के दृष्टिकोण को स्पष्ट करती है, बल्कि पाठक और दर्शक को भी रचना के महत्व और संदेश को समझने में मदद करती है।
साहित्यिक आलोचना की उत्पत्ति साहित्यिक परंपरा के विकास के साथ हुई। किसी भी साहित्यिक युग में आलोचना ने रचना की गुणवत्ता, उसके साहित्यिक, सामाजिक और मानवीय मूल्य को परखा और स्थापित किया। आलोचना का उद्देश्य न केवल रचना के दोषों को उजागर करना है, बल्कि उसके उत्कृष्ट पक्षों को मान्यता देना और पाठक या समाज के लिए शिक्षाप्रद संदेश देना भी है।
1. आलोचना की परिभाषा
“आलोचना” का अर्थ केवल नकारात्मक टिप्पणी नहीं है। यह रचना के गुण और दोष दोनों का मूल्यांकन है। विभिन्न विद्वानों ने आलोचना को विभिन्न दृष्टिकोण से परिभाषित किया है।
आनन्द कुमार के अनुसार –
"आलोचना वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी साहित्यिक रचना या कलाकृति की गुणवत्ता, महत्व, भाषा, शैली और उद्देश्य की जाँच की जाती है।"
रायमंड विलियम्स के अनुसार –
"आलोचना का अर्थ है किसी रचना का विश्लेषण करना, उसके तत्वों और विधाओं को समझना और उसके प्रभाव का मूल्यांकन करना।"
सामान्य अर्थ में, आलोचना वह संज्ञानात्मक और विश्लेषणात्मक कार्य है जो लेखक, रचना और पाठक के मध्य संबंध को स्पष्ट करता है।
मुख्य बिंदु
आलोचना केवल नकारात्मक नहीं होती।
इसका उद्देश्य रचना के गुण और दोष दोनों की पहचान करना है।
यह रचना की समझ और समाज में उसके महत्व को स्थापित करती है।
2. आलोचना के विशेषताएँ
आलोचना के कुछ विशेष गुण हैं जो इसे अन्य प्रकार की टिप्पणी या समीक्षा से अलग बनाते हैं। ये विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं:
2.1 विश्लेषणात्मक स्वभाव
आलोचना किसी रचना को गहराई से समझने और उसकी संरचना का विश्लेषण करने पर आधारित होती है। यह केवल सतही टिप्पणी नहीं होती, बल्कि रचना के भाव, शैली, भाषा और उद्देश्य की छानबीन करती है।
उदाहरण: कवि की कविता के भाव, शैली और छंद का विश्लेषण करना।
2.2 न्यायपूर्ण और तटस्थ दृष्टिकोण
आलोचना में तटस्थता और निष्पक्षता आवश्यक है। आलोचक को अपनी व्यक्तिगत भावनाओं, पूर्वाग्रह या निजी पसंद से परे रहकर रचना का मूल्यांकन करना चाहिए।
उदाहरण: यदि किसी उपन्यास में सामाजिक मुद्दे उठाए गए हैं, तो आलोचना केवल लेखक के दृष्टिकोण या लेखक की सामाजिक स्थिति पर आधारित नहीं होनी चाहिए।
2.3 रचनात्मक उद्देश्य
आलोचना का उद्देश्य केवल दोष निकालना नहीं, बल्कि रचना के सुधार, मार्गदर्शन और पाठक को सही समझ देना है।
उदाहरण: किसी नाटक के संवाद में कमी होने पर आलोचक उसे सुधार के सुझाव दे सकता है।
2.4 सुसंगठित और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
आलोचना में सुसंगठित तर्क, उदाहरण और प्रमाण का होना आवश्यक है। यह भावना आधारित टिप्पणी नहीं बल्कि तर्क और प्रमाण आधारित मूल्यांकन है।
2.5 साहित्यिक और सांस्कृतिक समझ
आलोचना केवल भाषा या शैली तक सीमित नहीं होती, बल्कि साहित्यिक और सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ को भी समझती है।
उदाहरण: प्रेमचंद के उपन्यासों का समाज, संस्कृति और आर्थिक स्थिति के दृष्टिकोण से विश्लेषण।
2.6 उद्देश्यपूर्ण
आलोचना का अंतिम उद्देश्य होता है—
रचना की वास्तविक गुणवत्ता को स्थापित करना
पाठक को शिक्षित करना
लेखक को मार्गदर्शन देना

3. आलोचना के गुण
आलोचना के कुछ गुण हैं जो इसे सार्थक और प्रभावशाली बनाते हैं।
3.1 पारदर्शिता
एक आलोचक को स्पष्ट और पारदर्शी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। आलोचना की भाषा और तर्क ऐसे होने चाहिए कि पाठक बिना किसी भ्रम के रचना को समझ सके।
3.2 निष्पक्षता
आलोचना में पूर्वाग्रह या व्यक्तिगत भावना का कोई स्थान नहीं होता। यह केवल रचना के गुण और दोष को मानक के अनुसार परखती है।
3.3 तार्किकता
आलोचना में साक्ष्य और तर्क का होना अनिवार्य है। उदाहरण, उद्धरण और विश्लेषण से आलोचना प्रभावी बनती है।
3.4 रचनात्मकता
एक आलोचक केवल दोष निकालने वाला नहीं होता। वह रचना को समझने, सुधारने और उसके मूल्य को बढ़ाने वाला भी होता है।
3.5 साहित्यिक दृष्टि
आलोचना में साहित्यिक, भाषाई और शैलीगत समझ का होना आवश्यक है। आलोचक को कविता, कहानी, नाटक या उपन्यास की साहित्यिक विधा की समझ होनी चाहिए।
3.6 सामाजिक चेतना
आलोचना को सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में परखना चाहिए। किसी रचना के समाज पर प्रभाव और उसकी संदेश क्षमता का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

4. आलोचना के प्रकार
आलोचना के विभिन्न प्रकार हैं, जो दृष्टिकोण और शैली के आधार पर अलग किए जाते हैं।
4.1 सौंदर्यात्मक आलोचना
रचना की सौंदर्यात्मक विशेषताओं पर ध्यान केंद्रित करती है।
उदाहरण: कविता की अलंकार, छंद, भाषा और भाव।
4.2 यथार्थवादी आलोचना
रचना के सामाजिक और वास्तविक संदर्भ को महत्व देती है।
उदाहरण: प्रेमचंद के उपन्यासों में ग्रामीण जीवन का विश्लेषण।
4.3 ऐतिहासिक आलोचना
रचना का ऐतिहासिक संदर्भ के अनुसार मूल्यांकन।
उदाहरण: जयशंकर प्रसाद के ऐतिहासिक नाटकों की आलोचना।
4.4 मनोवैज्ञानिक आलोचना
पात्रों की मनोवृत्ति और भावनात्मक स्थिति को परखती है।
उदाहरण: आधुनिक उपन्यासों में व्यक्तित्व और संघर्ष का विश्लेषण।
4.5 संरचनात्मक आलोचना
रचना की संरचना, कथा-विन्यास, शैली और तकनीकी पक्ष पर ध्यान देती है।

5. आलोचना का महत्व
साहित्य और कला का मूल्यांकन – यह रचना के महत्व और गुण को स्थापित करती है।
रचनात्मक सुधार – लेखक को अपनी रचना के दोष और सुधार के सुझाव मिलते हैं।
पाठक की समझ – पाठक को रचना का उद्देश्य, संदेश और साहित्यिक मूल्य समझ में आता है।
सामाजिक चेतना – आलोचना समाज में निहित मूल्यों, समस्याओं और विचारों की पहचान कराती है।
साहित्यिक परंपरा का विकास – आलोचना द्वारा साहित्यिक विधाएँ और शैली विकसित होती हैं।

6. निष्कर्ष
आलोचना केवल निंदा या प्रशंसा नहीं है। यह रचना की गहन समझ, विश्लेषण और मूल्यांकन की प्रक्रिया है। आलोचना के बिना साहित्य और कला का मूल्य नहीं समझा जा सकता। यह लेखक, पाठक और समाज तीनों के लिए आवश्यक है।
आलोचना निष्पक्ष, तटस्थ और तार्किक होनी चाहिए।
इसके गुणों में पारदर्शिता, रचनात्मकता और सामाजिक चेतना शामिल है।
यह साहित्य और कला के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इस प्रकार, आलोचना साहित्यिक जीवन का मूलभूत अंग है और किसी भी रचना या कलाकृति के मूल्य को समझने और स्थापित करने का माध्यम है।

हिंदी नाटक का उद्भव और विकास

हिंदी नाटक का उद्भव और विकास
भूमिका 
नाटक साहित्य की वह विधा है जिसमें जीवन की अनुभूतियाँ केवल पढ़ी नहीं जातीं, बल्कि मंच पर सजीव होकर दर्शकों के सामने आती हैं। नाटक में संवाद, अभिनय, कथानक, मंच और दर्शक—सभी का समन्वय होता है। हिंदी नाटक का विकास भारतीय समाज, संस्कृति, राजनीति और वैचारिक आंदोलनों से गहराई से जुड़ा हुआ है। हिंदी नाटक का इतिहास केवल साहित्यिक विकास का इतिहास नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और परिवर्तन का इतिहास भी है।
1. हिंदी नाटक का उद्भव 
1.1 संस्कृत नाट्य परंपरा से उद्भव 
हिंदी नाटक का प्रत्यक्ष उद्भव भले ही आधुनिक काल में हुआ हो, किंतु उसकी जड़ें प्राचीन संस्कृत नाट्य परंपरा में गहराई से समाई हुई हैं।
भरतमुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र में नाटक को पंचम वेद कहा गया है। इसमें—
रस सिद्धांत
भाव, विभाव, अनुभाव
नाट्यरचना
अभिनय (आंगिक, वाचिक, सात्त्विक, आहार्य)
का विस्तृत विवेचन मिलता है।
कालिदास के नाटकों में काव्यात्मक सौंदर्य, भास में नाटकीयता, भवभूति में करुणा और शूद्रक में लोकजीवन का यथार्थ दिखाई देता है। हिंदी नाटक ने कथानक, पात्र-चित्रण और रस-योजना की दृष्टि से इसी परंपरा को आगे बढ़ाया।

1.2 लोकनाट्य परंपरा 

लोकनाट्य हिंदी नाटक की जीवंत परंपरा है। जब शास्त्रीय नाटक सीमित वर्ग तक सिमट गया, तब लोकनाट्य ने जनसाधारण को नाट्य से जोड़े रखा।
रामलीला और रासलीला में धार्मिक आस्था के साथ नैतिक आदर्शों की स्थापना होती है। नौटंकी और स्वांग में सामाजिक व्यंग्य, प्रेम, वीरता और लोकसंस्कृति का चित्रण मिलता है।
लोकनाट्य की प्रमुख विशेषताएँ—
संवाद की सरलता
मंच की सादगी
दर्शकों की प्रत्यक्ष भागीदारी
आधुनिक हिंदी रंगमंच की अभिनय शैली और कथ्य पर लोकनाट्य का गहरा प्रभाव पड़ा।
2. भारतेन्दु युग (1850–1885) 
2.1 युग की विशेषताएँ 
यह युग हिंदी नाटक का वास्तविक प्रारंभिक काल है। इस समय भारत अंग्रेजी शासन के अधीन था और समाज अनेक कुरीतियों से ग्रस्त था।
इस युग में—
राष्ट्रीय चेतना का उदय
सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार
पाखंड और अंधविश्वास की आलोचना
नाटक को जनजागरण का साधन बनाना
मुख्य लक्ष्य रहा।

2.2 भारतेन्दु हरिश्चंद्र का योगदान 

भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने नाटक को केवल मनोरंजन का साधन न मानकर सामाजिक क्रांति का माध्यम बनाया।
अंधेर नगरी में उन्होंने भ्रष्ट शासन व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य किया।
भारत दुर्दशा में देश की गुलामी और जनता की दयनीय स्थिति का चित्रण है।
वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति धार्मिक ढोंग पर करारा प्रहार करता है।
उनकी भाषा सरल, व्यंग्यपूर्ण और प्रभावशाली है। इसी कारण उन्हें हिंदी नाटक का पितामह कहा जाता है।

3. द्विवेदी युग (1900–1920) 
3.1 युग की विशेषताएँ 
द्विवेदी युग में साहित्य सुधार और शुद्धता की ओर उन्मुख हुआ।
इस काल में—
भाषा की संस्कृतनिष्ठता
नैतिक आदर्शों पर बल
सामाजिक सुधार की भावना
प्रधान रही।
हालाँकि नाटक मंचीय दृष्टि से पिछड़ा रहा, फिर भी इस युग ने हिंदी को साहित्यिक अनुशासन प्रदान किया।
3.2 प्रमुख नाटककार (विस्तार)
महावीर प्रसाद द्विवेदी स्वयं बड़े नाटककार नहीं थे, लेकिन उन्होंने नाटक के लिए वैचारिक आधार तैयार किया। हरिऔध आदि लेखकों ने आदर्शवादी नाटक लिखे, जिनमें नैतिकता का प्रभाव अधिक था।
4. छायावाद युग (1920–1936) 
4.1 युग की विशेषताएँ 
छायावाद का प्रभाव मुख्यतः काव्य में दिखता है, लेकिन नाटक में भी इसका गहरा असर पड़ा।
गौरवशाली अतीत की खोज
राष्ट्रीय आत्मसम्मान
काव्यात्मक संवाद
भावात्मक गहराई
इस युग की विशेषताएँ हैं।
4.2 जयशंकर प्रसाद का नाट्य योगदान 
जयशंकर प्रसाद ने हिंदी नाटक को ऐतिहासिक गरिमा प्रदान की।
स्कंदगुप्त में राष्ट्ररक्षा और त्याग का आदर्श है।
ध्रुवस्वामिनी नारी स्वाभिमान और अधिकारों की आवाज है।
चंद्रगुप्त राजनीतिक कूटनीति और संघर्ष को दर्शाता है।
प्रसाद के नाटक मंचीय से अधिक साहित्यिक माने जाते हैं, फिर भी उन्होंने हिंदी नाटक को उच्च स्तर दिया।

5. प्रगतिवादी युग (1936–1950) 
5.1 युग की विशेषताएँ 
इस युग में नाटक समाज की सच्चाई का दर्पण बना।
वर्ग संघर्ष
आर्थिक विषमता
शोषण और अन्याय
किसान-मजदूर की पीड़ा
नाटकों का केंद्रीय विषय बना।

5.2 प्रमुख नाटककार
उपेंद्रनाथ अश्क ने मध्यवर्गीय जीवन की समस्याओं को यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत किया। उनके नाटकों में आदर्श नहीं, बल्कि जीवन की कड़वी सच्चाइयाँ मिलती हैं।
6. स्वतंत्रता के बाद का हिंदी नाटक (1950 के बाद)
6.1 युग की विशेषताएँ 
स्वतंत्रता के बाद सामाजिक ढाँचा बदला और नाटक का विषय भी बदला।
व्यक्ति का अकेलापन
पारिवारिक विघटन
संबंधों की जटिलता
अस्तित्व का संकट
मुख्य विषय बने।
6.2 प्रमुख नाटककार 
मोहन राकेश के नाटकों में व्यक्ति की आंतरिक पीड़ा और संबंधों की टूटन दिखाई देती है।
आधे अधूरे आधुनिक परिवार का यथार्थ चित्र है।
आषाढ़ का एक दिन कलाकार और समाज के द्वंद्व को प्रस्तुत करता है।
धर्मवीर भारती का अंधा युग नैतिक मूल्य संकट का प्रतीकात्मक नाटक है।
बादल सरकार ने नाटक को मंच की सीमाओं से बाहर निकालकर जनता के बीच पहुँचाया।

7. समकालीन हिंदी नाटक 
समकालीन हिंदी नाटक सामाजिक प्रश्नों से सीधे टकराता है।
स्त्री विमर्श
दलित चेतना
राजनीतिक भ्रष्टाचार
पहचान और अस्मिता
इन विषयों ने नाटक को वैचारिक रूप से समृद्ध बनाया।

निष्कर्ष 
हिंदी नाटक का विकास एक सतत प्रक्रिया रही है। संस्कृत और लोकनाट्य से प्रारंभ होकर भारतेन्दु के सामाजिक नाटक, प्रसाद के ऐतिहासिक नाटक, प्रगतिवाद के यथार्थवादी नाटक और स्वतंत्रता के बाद के प्रयोगात्मक नाटकों तक हिंदी नाटक निरंतर विकसित हुआ है। आज हिंदी नाटक केवल मंचीय कला नहीं, बल्कि समाज की चेतना और प्रतिरोध की सशक्त अभिव्यक्ति बन चुका है।

सोमवार, 15 दिसंबर 2025

हिंदी की बोलियां


हिंदी की बोलियाँ

भूमिका (Introduction)

हिंदी भाषा भारत की प्रमुख और सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। इसकी समृद्धि और व्यापकता का मुख्य कारण इसकी अनेक उपभाषाएँ और बोलियाँ हैं। बोलियाँ किसी भाषा की आत्मा होती हैं, क्योंकि वे सीधे जनजीवन, संस्कृति और परंपराओं से जुड़ी होती हैं। हिंदी साहित्य का विकास भी बोलियों के माध्यम से हुआ है। भक्ति काल में अवधी और ब्रजभाषा ने साहित्य को नया आयाम दिया और आधुनिक काल में खड़ी बोली ने हिंदी को मानक रूप प्रदान किया। इसलिए हिंदी भाषा के अध्ययन के लिए उसकी उपभाषाओं और बोलियों का ज्ञान आवश्यक है।


बोली और उपभाषा का अर्थ

बोली

बोली वह भाषा-रूप है जो किसी सीमित भौगोलिक क्षेत्र में बोली जाती है और मुख्यतः बोलचाल में प्रयुक्त होती है।

उपभाषा

उपभाषा वह भाषा-रूप है जो किसी मुख्य भाषा और उसके क्षेत्रीय बोलियों के बीच का स्तर होती है। इसके अंतर्गत कई बोलियाँ आती हैं और इसका क्षेत्र अपेक्षाकृत व्यापक होता है।


हिंदी की प्रमुख उपभाषाएँ 

 हिंदी की उपभाषाएँ

हिंदी
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        |              |             |               |
   पश्चिमी हिंदी     पूर्वी हिंदी    राजस्थानी     बिहारी
                                         |
                                   पहाड़ी (हिमाचली)



1. पश्चिमी हिंदी

क्षेत्र – पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा
प्रमुख बोलियाँ – खड़ी बोली, ब्रज, बुंदेली, कन्नौजी, हरियाणवी
उदाहरण – मैं आज विद्यालय जा रहा हूँ।

2. पूर्वी हिंदी

क्षेत्र – पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश
प्रमुख बोलियाँ – अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी
उदाहरण – राम भले राजा हैं।

3. राजस्थानी

क्षेत्र – राजस्थान
प्रमुख बोलियाँ – मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, मेवाती
उदाहरण – थांने राम-राम सा।

4. बिहारी

क्षेत्र – बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश
प्रमुख बोलियाँ – भोजपुरी, मगही, मैथिली, अंगिका
उदाहरण – हम तोहार इंतजार करत बानी।

5. पहाड़ी (हिमाचली)

क्षेत्र – हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड
प्रमुख बोलियाँ – गढ़वाली, कुमाऊँनी, कांगड़ी
उदाहरण – मैं घास काटण जाँ।


हिंदी की 18 प्रमुख बोलियाँ

 पश्चिमी हिंदी की बोलियाँ

पश्चिमी हिंदी
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खड़ी    ब्रज     बुंदेली  कन्नौजी  हरियाणवी

1. खड़ी बोली – मैं आज स्कूल जा रहा हूँ।

2. ब्रजभाषा – मोरे मन बस्यो श्याम।

3. बुंदेली – हम कल मेले जाबे।

4. कन्नौजी – तुम कहाँ जात हौ?

5. हरियाणवी – मैं तो ठीक स्यूँ।


पूर्वी हिंदी
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|        |               |
अवधी   बघेली        छत्तीसगढ़ी

6. अवधी – राम भले राजा हैं।

7. बघेली – हम बजार जात हई।

8. छत्तीसगढ़ी – का हाल हे?

राजस्थानी की चार बोलियाँ

राजस्थानी
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|        |        |             |
मारवाड़ी मेवाड़ी ढूंढाड़ी     मेवाती

9. मारवाड़ी – थांने राम-राम सा।

10. मेवाड़ी – म्हे घर जावां।

11. ढूंढाड़ी – मौसम घणो सुथरो है।

12. मेवाती – हम घर जाँवां।

बिहारी बोलियाँ

बिहारी
   |
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भोजपुरी मगही   मैथिली        अंगिका

13. भोजपुरी – हम तोहार इंतजार करत बानी।

14. मगही – हम घर जा रहल छी।

15. मैथिली – अहाँ केना छी?

16. अंगिका – हमरा नीक लागे।

अन्य प्रमुख बोलियाँ

अन्य बोलियाँ
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|                       |
मालवी               निमाड़ी

17. मालवी – म्हे पानी पीना है।


18. निमाड़ी – मैं खेत जाऊँ।

हिंदी की बोलियों का महत्व

हिंदी साहित्य का प्रारंभ बोलियों से हुआ

लोकसंस्कृति और परंपराओं का संरक्षण

भाषा को जनसुलभ और जीवंत बनाना

क्षेत्रीय पहचान को सुदृढ़ करना


उपसंहार (Conclusion)

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि हिंदी की उपभाषाएँ और बोलियाँ हिंदी भाषा की आत्मा हैं। इन्हीं के माध्यम से हिंदी ने जन-जन तक पहुँच बनाई और साहित्यिक रूप से समृद्ध हुई। यदि हम इन बोलियों और उपभाषाओं का संरक्षण और संवर्धन करेंगे, तो हिंदी भाषा और अधिक जीवंत, सशक्त और सार्वभौमिक बन सकती है। अतः हिंदी की बोलियों और उपभाषाओं का सम्मान करना और उनका अध्ययन करना अत्यंत आवश्यक है।

हिंदी भाषा का उद्भव और विकास



हिंदी भाषा का विकास

भूमिका

हिंदी भाषा भारत की आत्मा की अभिव्यक्ति है। यह केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, इतिहास, समाज और चेतना की वाहक भाषा है। हिंदी का विकास हजारों वर्षों की भाषिक यात्रा का परिणाम है, जिसमें संस्कृत से लेकर आधुनिक हिंदी तक अनेक भाषिक रूपों का योगदान रहा है। आज हिंदी न केवल भारत की राजभाषा है, बल्कि विश्व की प्रमुख भाषाओं में भी स्थान रखती है।


1. भाषा का अर्थ एवं आवश्यकता

भाषा वह साधन है जिसके माध्यम से मनुष्य अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों को व्यक्त करता है। सामाजिक जीवन के विकास के साथ भाषा भी निरंतर विकसित होती रही है।

भाषा की आवश्यकता

विचारों का आदान-प्रदान

संस्कृति का संरक्षण

ज्ञान का प्रसार

सामाजिक एकता


2. हिंदी भाषा की उत्पत्ति

हिंदी भाषा का मूल स्रोत संस्कृत है। संस्कृत से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश और अपभ्रंश से हिंदी का विकास हुआ।

 हिंदी भाषा की उत्पत्ति

संस्कृत
   |
प्राकृत
   |
अपभ्रंश
   |
प्राचीन हिंदी
   |
आधुनिक हिंदी


3. संस्कृत से प्राकृत तक

वैदिक काल में संस्कृत जनसामान्य की भाषा थी, परंतु समय के साथ यह कठिन होती गई। जनता ने सरल रूप अपनाया जिसे प्राकृत कहा गया।

प्रमुख प्राकृत भाषाएँ

शौरसेनी

मागधी

महाराष्ट्री

पैशाची


4. प्राकृत से अपभ्रंश का विकास

प्राकृत भाषाओं में समय के साथ विकृति आई और उनसे अपभ्रंश का जन्म हुआ। अपभ्रंश को हिंदी की पूर्वपीठिका माना जाता है।

अपभ्रंश की विशेषताएँ

सरल व्याकरण

लोकभाषा का प्रभाव

पद्यात्मक रचना

5. अपभ्रंश से प्राचीन हिंदी

लगभग 1000 ई. के बाद अपभ्रंश से विभिन्न क्षेत्रीय बोलियाँ विकसित हुईं, जिन्हें प्राचीन हिंदी कहा गया।

अपभ्रंश से बोलियों का विकास

अपभ्रंश
   |
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ब्रज     अवधी    खड़ी बोली     मैथिली


6. हिंदी की प्रमुख बोलियाँ

हिंदी अनेक बोलियों का समूह है। इन बोलियों ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया।

प्रमुख बोलियाँ

ब्रजभाषा

अवधी

खड़ी बोली

बुंदेली

हरियाणवी

भोजपुरी

मैथिली

7. मध्यकालीन हिंदी का विकास

मध्यकाल में हिंदी को साहित्यिक प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। भक्ति आंदोलन ने हिंदी के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रमुख साहित्यकार

कबीर

तुलसीदास

सूरदास

मीराबाई

विशेषताएँ

लोकभाषा का प्रयोग

भक्ति और प्रेम की अभिव्यक्ति

सरल शैली

8. आधुनिक हिंदी का विकास

19वीं शताब्दी में खड़ी बोली के रूप में आधुनिक हिंदी का विकास हुआ। इसमें गद्य साहित्य का विकास हुआ।

आधुनिक हिंदी का विकास

खड़ी बोली
   |
आधुनिक हिंदी
   |
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|        |        |             |
कहानी   उपन्यास  नाटक        निबंध


9. हिंदी और अंग्रेज़ी का प्रभाव

आधुनिक युग में हिंदी पर अंग्रेज़ी का प्रभाव पड़ा। तकनीकी, प्रशासनिक और वैज्ञानिक शब्दावली में अंग्रेज़ी के शब्द शामिल हुए।

उदाहरण

कंप्यूटर

मोबाइल

इंटरनेट

10. हिंदी का राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्वरूप

हिंदी भारत की राजभाषा है और विश्व के अनेक देशों में बोली जाती है।

हिंदी का वैश्विक विस्तार

भारत
  |
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नेपाल   फिजी   मॉरीशस        सूरीनाम


11. हिंदी भाषा की वर्तमान स्थिति

आज हिंदी शिक्षा, मीडिया, साहित्य, सिनेमा और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निरंतर विकसित हो रही है।

वर्तमान स्वरूप

सोशल मीडिया की भाषा

तकनीकी शब्दावली

मिश्रित भाषा (हिंग्लिश)

12. हिंदी भाषा के समक्ष चुनौतियाँ

अंग्रेज़ी का बढ़ता प्रभाव

शुद्ध हिंदी का अभाव

नई पीढ़ी की उदासीनता

13. हिंदी भाषा का भविष्य

डिजिटल युग में हिंदी की संभावनाएँ अत्यंत उज्ज्वल हैं। ई-लर्निंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सोशल मीडिया ने हिंदी को नई पहचान दी है।

उपसंहार

हिंदी भाषा का विकास एक सतत और जीवंत प्रक्रिया है। यह भाषा समय के साथ स्वयं को ढालती रही है। संस्कृत से लेकर आधुनिक डिजिटल हिंदी तक की यात्रा हिंदी की शक्ति और लचीलापन दर्शाती है। हिंदी न केवल हमारी पहचान है, बल्कि भविष्य की वैश्विक भाषा बनने की क्षमता भी रखती है।

सोमवार, 8 दिसंबर 2025

भाषण किसे कहते ?हैं परिभाषा, प्रकार और उद्देश्य


1. भाषण किसे कहते हैं? (Definition of Speech)
भाषण वह मौखिक अभिव्यक्ति है जिसमें वक्ता किसी विषय पर अपने विचार, तर्क, भावनाएँ या संदेश श्रोताओं के समक्ष स्पष्ट, प्रभावी और व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत करता है।
यह संचार का सबसे प्रभावशाली माध्यम है, क्योंकि इसमें आवाज़, भाषा, हाव-भाव और शैली—सब मिलकर संदेश को जीवंत बनाते हैं।


2. भाषण के प्रकार (Types of Speech)

(1) औपचारिक भाषण (Formal Speech)

सरकारी समारोह, विद्यालय/महाविद्यालय, सम्मेलन, सभा आदि में दिया जाने वाला भाषण।

(2) अनौपचारिक भाषण (Informal Speech)

दोस्तों, परिवार या छोटे समूह में अपनी बात सहज ढंग से रखना।

(3) राजनीतिक भाषण (Political Speech)

नेताओं द्वारा जनता के बीच अपनी नीतियों, विचारों और योजनाओं को समझाने हेतु दिया जाने वाला भाषण।

(4) प्रेरक भाषण (Motivational Speech)

श्रोताओं को प्रेरित करने, जागरूक बनाने और आत्मविश्वास बढ़ाने वाला भाषण।

(5) शिक्षण/शैक्षिक भाषण (Educational Speech)

शिक्षकों, विशेषज्ञों या प्रशिक्षकों द्वारा किसी विषय को समझाने के लिए दिया गया भाषण।

(6) स्वागत/विदाई भाषण (Welcome & Farewell Speech)

किसी कार्यक्रम की शुरुआत या समापन पर दिया जाने वाला भाषण।

(7) सूचना/जानकारी आधारित भाषण (Informative Speech)

किसी विषय, घटना या तथ्य को समझाने हेतु दिया जाने वाला भाषण।

3. भाषण का उद्देश्य (Objectives of Speech)

(1) विचारों का प्रभावी संप्रेषण

अपनी बात को स्पष्ट और प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत करना।

(2) श्रोताओं को प्रेरित करना

उन्हें प्रोत्साहित, जागरूक या उत्साहित करना।

(3) शिक्षित और सूचित करना

किसी महत्वपूर्ण विषय पर ज्ञान प्रदान करना।

(4) मनाना या प्रभावित करना

तर्क प्रस्तुत कर श्रोताओं की राय बदलना या समर्थन प्राप्त करना।

(5) नेतृत्व और मार्गदर्शन

समूह को दिशा देने, संगठित करने और नेतृत्व प्रदर्शित करने का माध्यम।

4. भाषण का महत्व (Importance of Speech)

(1) संचार कौशल का विकास

भाषण व्यक्ति को स्पष्ट बोलने और प्रभावी ढंग से संवाद करने की क्षमता देता है।

(2) व्यक्तित्व में निखार

आत्मविश्वास बढ़ता है, मंच-भय दूर होता है।

(3) सामाजिक नेतृत्व क्षमता

समाज, संस्था या समूह का नेतृत्व करने में मदद।

(4) शिक्षा और प्रशिक्षण में उपयोगी

किसी भी विषय को समझाने और जानकारी साझा करने का सर्वोत्तम तरीका।

(5) जन-जागरण और सामाजिक परिवर्तन

भाषण विचारों को फैलाने और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने में प्रभावी साधन है।

5. भाषण के उदाहरण (Examples)

उदाहरण 1: स्वतंत्रता दिवस भाषण

प्रधानाचार्य/अध्यापक का राष्ट्र और स्वतंत्रता सेनानियों पर दिया गया भाषण।

उदाहरण 2: प्रेरक भाषण

किसी मोटिवेशनल स्पीकर द्वारा विद्यार्थियों को लक्ष्य तय करने और मेहनत करने के लिए प्रेरित करना।

उदाहरण 3: राजनीतिक भाषण

चुनाव के समय नेता द्वारा जनता को संबोधित करना।

उदाहरण 4: शैक्षिक भाषण

शिक्षक द्वारा पर्यावरण संरक्षण पर छात्रों के लिए व्याख्यान।


6. भाषण देते समय ध्यान रखने योग्य बातें (Important Points While Giving a Speech)

(1) विषय का पूर्ण ज्ञान रखें

जिस विषय पर बोलना है, उसे अच्छी तरह समझ लें।

(2) सरल और स्पष्ट भाषा का प्रयोग करें

ताकि हर श्रोता आपकी बात समझ सके।

(3) आवाज़ और गति पर नियंत्रण रखें

बहुत तेज़ या बहुत धीमी गति से न बोलें।

(4) आँखों का संपर्क बनाए रखें

यह आत्मविश्वास दर्शाता है और श्रोताओं को जोड़े रखता है।

(5) छोटे–छोटे वाक्यों का प्रयोग

लंबे वाक्य श्रोताओं का ध्यान भटका देते हैं।

(6) समय का ध्यान रखें

निर्धारित समय में ही भाषण पूरा करें।

(7) उदाहरणों और तर्कों का उपयोग

भाषण अधिक प्रभावी और रोचक बनता है।

(8) शरीर भाषा (Body Language)

हाव-भाव, हाथों की चाल और चेहरे की अभिव्यक्ति संतुलित एवं आकर्षक हों।

(9) शुरुआत और अंत प्रभावशाली रखें

आरंभ में ध्यान आकर्षित करें और अंत में सार प्रस्तुत करें।

(10) अभ्यास करें

अच्छा भाषण तैयार करने का सबसे बड़ा साधन—निरंतर अभ्यास।

साक्षात्कार किसे कहते हैं?

1. साक्षात्कार की अवधारणा (Concept of Interview)
साक्षात्कार एक ऐसी संवाद प्रक्रिया है जिसमें दो या अधिक व्यक्तियों के बीच आमने-सामने या ऑनलाइन बातचीत होती है। इसमें प्रश्न पूछकर व्यक्ति की योग्यता, व्यक्तित्व, विचार, अनुभव और क्षमता का मूल्यांकन किया जाता है। यह चयन, अनुसंधान, पत्रकारिता और शिक्षण-प्रशिक्षण आदि कई क्षेत्रों में उपयोग होने वाला एक वैज्ञानिक औज़ार है।


2. साक्षात्कार की परिभाषा (Definition)

साक्षात्कार वह प्रक्रिया है जिसमें किसी व्यक्ति से व्यवस्थित ढंग से प्रश्न पूछकर उसके विचार, अनुभव और क्षमताओं को जाना-परखा जाता है।


3. साक्षात्कार के प्रकार (Types of Interview)

(1) औपचारिक साक्षात्कार (Formal Interview)

निर्धारित प्रक्रिया, पैनल और नियमों के अनुसार लिया गया साक्षात्कार।
जैसे – UPSC, कॉलेज/बैंक जॉब इंटरव्यू।

(2) अनौपचारिक साक्षात्कार (Informal Interview)

बिना किसी कठोर नियम, आरामदायक बातचीत के रूप में।
जैसे – पत्रकार का किसी लेखक से बातचीत करना।

(3) संरचित साक्षात्कार (Structured Interview)

पूर्व निर्धारित प्रश्नों की सूची पर आधारित।

(4) असंरचित साक्षात्कार (Unstructured Interview)

प्रश्न पहले से तय नहीं, परिस्थितियों के अनुसार पूछे जाते हैं।

(5) पैनल साक्षात्कार (Panel Interview)

कई विशेषज्ञ मिलकर उम्मीदवार का मूल्यांकन करते हैं।

(6) समूह साक्षात्कार (Group Interview)

एक-साथ कई उम्मीदवारों का साक्षात्कार।

(7) टेलीफोन/ऑनलाइन साक्षात्कार (Telephonic/Online Interview)

मोबाइल, वीडियो कॉल, Zoom/Google Meet द्वारा लिया जाने वाला इंटरव्यू।

(8) शोध/अनुसंधान साक्षात्कार (Research Interview)

डेटा संग्रह और रिसर्च उद्देश्यों के लिए लिया जाने वाला साक्षात्कार।

4. साक्षात्कार का महत्व (Importance of Interview)

(1) सही उम्मीदवार का चयन

साक्षात्कार से व्यक्ति की वास्तविक क्षमता, व्यवहार और योग्यता का पता चलता है।

(2) व्यक्तित्व का मूल्यांकन

उम्मीदवार के आत्मविश्वास, भाषा, निर्णय क्षमता, नेतृत्व गुण आदि स्पष्ट होते हैं।

(3) संगठन या संस्था को सही मानव संसाधन मिलना

सही व्यक्ति सही स्थान पर नियुक्त होता है।

(4) अनुसंधान में सत्यापन

रिसर्च में प्राप्त सूचनाएँ साक्षात्कार से अधिक विश्वसनीय बनती हैं।

(5) संचार और बातचीत कौशल की परीक्षा

इंटरव्यू व्यक्ति की संचार शैली, स्पष्टता और तर्क क्षमता को उजागर करता है।


5. साक्षात्कार के उद्देश्य (Objectives of Interview)

(1) उम्मीदवार की योग्यता को परखना

शैक्षणिक, तकनीकी और व्यावहारिक क्षमताओं का परीक्षण।

(2) व्यक्ति के व्यक्तित्व और व्यवहार को जानना

व्यवहार, स्वभाव, टीम-वर्क, नेतृत्व क्षमता।

(3) संगठन की आवश्यकताओं के अनुरूप उपयुक्त चयन

कौन-सा उम्मीदवार कार्य के लिए सबसे अधिक उपयुक्त है।

(4) जानकारी प्राप्त करना

पत्रकारिता या रिसर्च में तथ्यात्मक जानकारी संग्रहित करना।

(5) समस्या-समाधान क्षमता को जानना

स्थिति के अनुसार निर्णय लेने की योग्यता का आकलन।


6. साक्षात्कार के उदाहरण (Examples)

उदाहरण 1 – नौकरी साक्षात्कार

एक बैंक में क्लर्क पद के लिए तीन सदस्यों की पैनल उम्मीदवार से प्रश्न पूछकर उसकी योग्यता का मूल्यांकन करती है।

उदाहरण 2 – पत्रकारिता साक्षात्कार

पत्रकार किसी साहित्यकार या खिलाड़ी से उनके अनुभवों और उपलब्धियों के विषय में प्रश्न पूछता है।

उदाहरण 3 – अनुसंधान साक्षात्कार

शोधकर्ता किसी गाँव के लोगों से व्यक्तिगत बातचीत करके शिक्षा-स्तर पर डेटा एकत्र करता है।

उदाहरण 4 – शैक्षणिक साक्षात्कार

कॉलेज में प्रवेश के लिए विभागाध्यक्ष छात्र की रुचि और ज्ञान को जाँचते हैं।


संचार कौशल किसे कहते हैं? परिभाषाए, उद्देश्य ,महत्व, प्रकार,महत्वपूर्ण बिंदु

प्रश्न : संचार की परिभाषा, अवधारणा, प्रकार, महत्व तथा माध्यमों की व्याख्या कीजिए। 




1. संचार की परिभाषा (Definitions of Communication)

संचार वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से एक व्यक्ति अपने विचार, भावनाएँ, अनुभव, ज्ञान या संदेश दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाता है और दूसरा व्यक्ति उसे समझकर प्रतिक्रिया देता है।

मुख्य बिंदु :

1. संचार का अर्थ है साझा करना (To share)।

2. ‘Communication’ शब्द Communis (Common) से बना है, जिसका अर्थ है—समानता स्थापित करना।

3. संचार दो-तरफ़ा प्रक्रिया है जिसमें विचार → संदेश → प्रतिक्रिया शामिल है।

4. संदेश तभी संचार कहलाता है जब वह समझा भी जाए।

5. संचार केवल शब्दों से नहीं, बल्कि हावभाव, संकेत, लिखावट, छवियों आदि से भी होता है।

2. संचार की अवधारणा (Concept of Communication)

संचार एक ऐसी सामाजिक-मानसिक प्रक्रिया है जो दो या अधिक व्यक्तियों को एक सूत्र में बाँधती है। इसके माध्यम से समाज में सूचना, विचार, भावनाएँ तथा संस्कृति सामूहिक रूप से निर्मित और विस्तृत होती है।

मुख्य बिंदु :

1. संचार मानवीय संबंधों की मूलभूत जरूरत है।

2. यह साझा समझ (Mutual Understanding) का निर्माण करता है।

3. संचार में प्रेषक, संदेश, माध्यम, ग्राहक और प्रतिक्रिया प्रमुख तत्व हैं।

4. संचार का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि प्रभावित करना, समझाना, प्रेरित करना भी है।

5. संचार संस्कृति, समाज और संगठन की जीवन-रेखा है।


3. संचार के प्रकार (Types of Communication)

संचार अनेक रूपों में होता है। इसे विभिन्न आधारों पर वर्गीकृत किया जाता है:


(क) अभिव्यक्ति के आधार पर (On the basis of Expression)

1. मौखिक संचार (Verbal Communication)

इसमें शब्दों द्वारा जानकारी दी जाती है।

भाषण, वार्तालाप, भाषण, टेलीफोन वार्ता, कक्षा शिक्षण आदि।

विशेषताएँ:

1. समय की बचत।

2. त्वरित प्रतिक्रिया।

3. व्यक्तिगत संपर्क मजबूत।

2. लिखित संचार (Written Communication)

पत्र, ईमेल, नोटिस, रिपोर्ट, संदेशपत्र आदि लिखित माध्यम हैं।


विशेषताएँ:

1. स्थाई रिकॉर्ड मिलता है।

2. सटीकता व स्पष्टता।

3. संगठनात्मक कार्यों में उपयोगी।


3. अवौकिक/गैर-मौखिक संचार (Non-verbal Communication)

चेहरे के भाव, आवाज़ का उतार-चढ़ाव, आंखों की भाषा, शरीर की भंगिमाएँ।


विशेषताएँ:

1. संप्रेषण में 60–70% भूमिका।


2. भावनात्मक संदेशों में अत्यंत प्रभावी।


(ख) दिशा के आधार पर (On the basis of Direction)

1. ऊर्ध्व संचार (Upward Communication)

अधीनस्थ से अधिकारी की ओर।

रिपोर्ट, सुझाव, शिकायतें आदि।

2. अधोमुखी संचार (Downward Communication)

अधिकारी से अधीनस्थ की ओर।

आदेश, निर्देश, परिपत्र आदि।

3. क्षैतिज संचार (Horizontal Communication)

समान स्तर के व्यक्तियों/विभागों के बीच।

तालमेल एवं सहयोग बढ़ता है।


(ग) औपचारिकता के आधार पर (On the basis of Formality)

1. औपचारिक संचार (Formal Communication)

संगठन/संस्था की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार।

अधिक विश्वसनीय एवं नियंत्रित संचार।

2. अनौपचारिक संचार (Informal Communication)

व्यक्तिगत एवं सामाजिक संबंधों पर आधारित।

ग्रेपवाइन, मित्र समूह, सहकर्मी वार्ता आदि।


(घ) माध्यम के आधार पर (On the basis of Medium)

1. व्यक्तिगत संचार (Interpersonal Communication)

दो व्यक्तियों के बीच सीधा संवाद।

2. समूह संचार (Group Communication)

बैठक, संगोष्ठी, विचार-विमर्श आदि।

3. जनसंचार (Mass Communication)

बड़ी संख्या में लोगों तक संदेश पहुँचाना।

टीवी, रेडियो, समाचार-पत्र, सोशल मीडिया आदि।


4. संचार का महत्व (Importance of Communication)

संचार का महत्व व्यक्तिगत, सामाजिक, शैक्षिक, प्रशासनिक एवं संगठनात्मक—सभी स्तरों पर अत्यंत गहरा है।

(क) व्यक्तिगत स्तर पर (Personal Level)

1. आत्म-अभिव्यक्ति की क्षमता बढ़ती है।
2. आत्मविश्वास का विकास होता है।
3. बेहतर संबंध स्थापित होते हैं।
4. व्यक्तित्व विकास होता है।
5. समस्या समाधान की क्षमता विकसित होती है।

(ख) सामाजिक स्तर पर (Social Level)

1. समाज में समन्वय और एकता बनी रहती है।

2. सामाजिक मूल्यों का प्रसार होता है।

3. सांस्कृतिक परंपराएँ एक पीढ़ी से दूसरी तक पहुँचती हैं।

4. सामाजिक परिवर्तन को दिशा मिलती है।

5. लोकतंत्र की मजबूती में संचार की प्रमुख भूमिका है।

(ग) शैक्षिक स्तर पर (Educational Level)

1. ज्ञान के आदान-प्रदान का मुख्य साधन।

2. शिक्षक-छात्र संबंध मजबूत होते हैं।

3. शिक्षण में प्रभावशीलता बढ़ती है।

4. ई-लर्निंग, स्मार्ट क्लास, वीडियो लेक्चर संचार पर आधारित हैं।

5. शोध और विश्लेषण क्षमता विकसित होती है।


(घ) संगठन/प्रशासन में (Organizational Level)

1. कार्य की निरंतरता एवं अनुशासन बनाए रखता है।

2. निर्णय-निर्धारण में सहायता करता है।

3. कर्मचारियों में प्रेरणा और सहयोग बढ़ता है।

4. विवाद एवं गलतफहमी कम होती है।

5. उत्पादकता एवं कार्य-संतुष्टि बढ़ती है।


(ङ) राष्ट्र एवं मीडिया स्तर पर (National & Media Level)

1. जनमत निर्माण में सहायक।

2. राष्ट्रीय एकता को मजबूत करता है।

3. आपदा प्रबंधन और सार्वजनिक चेतना में उपयोगी।

4. सरकारी नीतियों का प्रसार मीडिया के माध्यम से।

5. डिजिटल संचार ने वैश्विक संपर्क को आसान बनाया।


5. संचार के माध्यम (Media/Channels of Communication)

संचार के माध्यम वह रास्ते या साधन हैं जिनसे संदेश प्रेषक से प्राप्तकर्ता तक पहुँचता है।


(क) पारंपरिक माध्यम (Traditional Media)

1. लोकगीत, लोकनृत्य

2. कठपुतली, नौटंकी

3. पाठशाला/सभा

4. भू-नाट्य एवं लोक मंच


(ख) मुद्रित माध्यम (Print Media)

1. समाचार-पत्र

2. पत्रिकाएँ

3. पुस्तकें

4. पोस्टर, बैनर

5. सरकारी नोटिस/परिपत्रों 

(ग) इलेक्ट्रॉनिक माध्यम (Electronic Media)

1. रेडियो

2. दूरदर्शन

3. फिल्में

4. इंटरनेट आधारित न्यूज पोर्टल


(घ) डिजिटल/सोशल मीडिया (Digital & Social Media)

1. मोबाइल फोन

2. सोशल नेटवर्क (Facebook, Instagram, YouTube)

3. ईमेल, व्हाट्सऐप

4. ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म
5. वेबसाइट, ब्लॉग

(ड़) व्यक्तिगत माध्यम (Personal Channels)

1. आमने-सामने बातचीत

2. परिवारिक संचार

3. मित्र समूह

4. शिक्षक-विद्यार्थी संवाद

निष्कर्ष (Conclusion)

संचार मानव जीवन की सबसे आवश्यक प्रक्रिया है। इसके बिना समाज, संस्कृति, संगठन, प्रशासन, शिक्षा और राष्ट्र—कुछ भी सुचारू रूप से नहीं चल सकता। संचार ही मनुष्य को विचारवान, सामाजिक, संगठित और संवेदनशील बनाता है। आज के वैश्विक डिजिटल युग में संचार के साधन अत्यधिक विस्तृत हो गए हैं, जिससे सूचना का प्रवाह तेज, प्रभावी और सुलभ हुआ है। इसलिए संचार को आधुनिक जीवन की जीवन-रेखा (Lifeline) कहा जाता है।