प्रेमचंद का जीवन-परिचय, उनकी युगीन परिस्थितियाँ, साहित्यिक योगदान तथा उनके समय के उपन्यासकारों और प्रमुख उपन्यासों का विवेचन कीजिए।
भूमिका :
प्रेमचंद हिंदी साहित्य के वह युग-पुरुष हैं जिन्होंने उपन्यास और कहानी को केवल मनोरंजन का साधन न बनाकर सामाजिक यथार्थ और सुधार का उपकरण बनाया। वे अपने समय की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के सच्चे द्रष्टा और यथार्थवादी कलाकार थे। उनके साहित्य में किसान, मज़दूर, स्त्री, दलित और शोषित वर्ग की पीड़ा गहराई से झलकती है। अतः प्रेमचंद और उनके समकालीन उपन्यासकारों का विवेचन हिंदी साहित्य के विकास के लिए आवश्यक है।
1. प्रेमचंद का जीवन-परिचय :
प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 ई. को वाराणसी जिले के लमही गाँव में हुआ। उनका वास्तविक नाम धनपत राय था, परंतु साहित्य में वे ‘प्रेमचंद’ के नाम से विख्यात हुए।
बचपन में ही माता-पिता का निधन हो गया।
आर्थिक अभावों में पढ़ाई की और शिक्षक की नौकरी की।
उन्होंने उर्दू से साहित्यिक जीवन शुरू किया और बाद में हिंदी को अपनी रचना भाषा बनाया।
‘सोज़-ए-वतन’ (1907) उनकी पहली कहानी-संग्रह थी, जो अंग्रेज़ सरकार द्वारा जब्त कर ली गई।
जीवन के अंतिम दिनों में वे "हंस" पत्रिका का संपादन कर रहे थे।
8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हुआ।
2. प्रेमचंद की युगीन परिस्थितियाँ :
प्रेमचंद का साहित्य उनकी युगीन परिस्थिति का दर्पण है। उनका समय उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों का था। यह समय भारत के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संघर्ष का काल था।
1. राजनीतिक परिस्थिति :
अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद अपने चरम पर था।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन धीरे-धीरे परिपक्व हो रहा था।
गांधीजी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन, सत्याग्रह और स्वदेशी की भावना प्रबल हो रही थी।
इस राजनीतिक पृष्ठभूमि का प्रभाव प्रेमचंद के उपन्यास ‘कर्मभूमि’, ‘रंगभूमि’ और अनेक कहानियों पर देखा जा सकता है।
2. सामाजिक परिस्थिति :
समाज में अस्पृश्यता, जातिगत ऊँच-नीच, स्त्रियों की दयनीय दशा और अशिक्षा जैसी समस्याएँ व्याप्त थीं।
स्त्रियों की शिक्षा, विधवा-विवाह, वेश्यावृत्ति और दहेज जैसी समस्याओं को प्रेमचंद ने प्रत्यक्ष रूप से उठाया।
‘सेवासदन’ वेश्यावृत्ति पर और ‘नमक का दरोगा’ भ्रष्टाचार-विरोध पर केंद्रित है।
3. आर्थिक परिस्थिति :
किसानों पर जमींदारी और महाजनी शोषण का गहरा संकट था।
अकाल, भूख और निर्धनता आम जनजीवन की त्रासदी थी।
‘गोदान’ जैसे उपन्यास में प्रेमचंद ने इन आर्थिक विसंगतियों को वास्तविक रूप में चित्रित किया।
4. सांस्कृतिक परिस्थिति :
पश्चिमी शिक्षा और आधुनिकता का प्रभाव बढ़ रहा था।
साहित्य और पत्रकारिता समाज सुधार के साधन बन रहे थे।
इस प्रकार प्रेमचंद का साहित्य उनके समय की समूची परिस्थिति का यथार्थ चित्रण करता है।
3. प्रेमचंद का साहित्यिक योगदान :
1. उपन्यासों में योगदान :
सेवासदन (1919) – स्त्री-जीवन और वेश्यावृत्ति की समस्या।
प्रेमाश्रम (1922) – किसान और जमींदारी समस्या।
रंगभूमि (1925) – शोषण के विरुद्ध सूरदास का संघर्ष।
कर्मभूमि (1932) – राष्ट्रीय आंदोलन और सत्याग्रह।
गोदान (1936) – किसान जीवन का यथार्थ चित्रण।
2. कहानियों में योगदान :
प्रेमचंद ने 300 से ज्यादा कहानी लिखी जो मानसरोवर के आठ भागों में प्रकाशित हैं। उनकी प्रसिद्ध कहानी-
पंच परमेश्वर, ईदगाह, बड़े घर की बेटी, कफन आदि कहानियों में गाँव का जीवन, मानवीय संबंध और करुणा का मार्मिक चित्रण मिलता है।
3. विशेषताएँ :
साहित्य को समाज का दर्पण बनाया।
किसानों, मजदूरों और दलितों को पहली बार साहित्य का नायक बनाया।
भाषा सरल, बोलचाल की और प्रभावशाली।
कथानक में यथार्थवाद, आदर्शवाद और मानवीय संवेदना का अद्भुत संतुलन।
4. प्रेमचंद के समय के उपन्यासकार और प्रमुख उपन्यास :
प्रेमचंद के युग में अन्य उपन्यासकारों ने भी अपनी लेखनी से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया।
1. चतुरसेन शास्त्री – वैशाली की नगरवधू, सोमनाथ।
2. जयशंकर प्रसाद – कंकाल, तितली।
3. भगवतीचरण वर्मा – चित्रलेखा।
4. यशपाल – दादा कामरेड, देशद्रोही।
5. इलाचंद्र जोशी – जहाज का पछी,देवयानी।
6. वृंदावनलाल वर्मा – गढ़कुंडार, मृणालिनी।
इन सभी उपन्यासकारों ने ऐतिहासिक, दार्शनिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक धरातलों पर उपन्यास विधा को विस्तार दिया।
5.प्रेमचंद का हिंदी उपन्यास पर प्रभाव :
प्रेमचंद ने उपन्यास को नई दिशा दी। उनसे पहले हिंदी उपन्यासों में मनोरंजन या रोमांटिकता का पुट अधिक था, किंतु प्रेमचंद ने सामाजिक समस्याओं को केंद्र में रखकर उपन्यास को गंभीरता और उद्देश्य प्रदान किया। उनके प्रभाव से बाद के उपन्यासकारों ने भी यथार्थवाद, सामाजिक संघर्ष और जनजीवन के प्रश्नों को उठाया।
निष्कर्ष :
प्रेमचंद का जीवन और साहित्य उनकी युगीन परिस्थितियों का सच्चा प्रतिबिंब है। उन्होंने किसान, मजदूर, स्त्री और दलितों की पीड़ा को स्वर दिया और साहित्य को समाज परिवर्तन का औज़ार बनाया। उनके समय के अन्य उपन्यासकारों ने भी विभिन्न आयामों को लेकर हिंदी उपन्यास को समृद्ध किया। किंतु हिंदी उपन्यास की वास्तविक रीढ़ प्रेमचंद ही बने। इसलिए उन्हें उचित ही ‘उपन्यास सम्राट’ कहा जाता है। उनका साहित्य आज भी समाज को मार्गदर्शन देने वाला दीपस्तंभ है।
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