5955758281021487 Hindi sahitya : हिंदी नाटक का उद्भव और विकास

गुरुवार, 8 जनवरी 2026

हिंदी नाटक का उद्भव और विकास

हिंदी नाटक का उद्भव और विकास
भूमिका 
नाटक साहित्य की वह विधा है जिसमें जीवन की अनुभूतियाँ केवल पढ़ी नहीं जातीं, बल्कि मंच पर सजीव होकर दर्शकों के सामने आती हैं। नाटक में संवाद, अभिनय, कथानक, मंच और दर्शक—सभी का समन्वय होता है। हिंदी नाटक का विकास भारतीय समाज, संस्कृति, राजनीति और वैचारिक आंदोलनों से गहराई से जुड़ा हुआ है। हिंदी नाटक का इतिहास केवल साहित्यिक विकास का इतिहास नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और परिवर्तन का इतिहास भी है।
1. हिंदी नाटक का उद्भव 
1.1 संस्कृत नाट्य परंपरा से उद्भव 
हिंदी नाटक का प्रत्यक्ष उद्भव भले ही आधुनिक काल में हुआ हो, किंतु उसकी जड़ें प्राचीन संस्कृत नाट्य परंपरा में गहराई से समाई हुई हैं।
भरतमुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र में नाटक को पंचम वेद कहा गया है। इसमें—
रस सिद्धांत
भाव, विभाव, अनुभाव
नाट्यरचना
अभिनय (आंगिक, वाचिक, सात्त्विक, आहार्य)
का विस्तृत विवेचन मिलता है।
कालिदास के नाटकों में काव्यात्मक सौंदर्य, भास में नाटकीयता, भवभूति में करुणा और शूद्रक में लोकजीवन का यथार्थ दिखाई देता है। हिंदी नाटक ने कथानक, पात्र-चित्रण और रस-योजना की दृष्टि से इसी परंपरा को आगे बढ़ाया।

1.2 लोकनाट्य परंपरा 

लोकनाट्य हिंदी नाटक की जीवंत परंपरा है। जब शास्त्रीय नाटक सीमित वर्ग तक सिमट गया, तब लोकनाट्य ने जनसाधारण को नाट्य से जोड़े रखा।
रामलीला और रासलीला में धार्मिक आस्था के साथ नैतिक आदर्शों की स्थापना होती है। नौटंकी और स्वांग में सामाजिक व्यंग्य, प्रेम, वीरता और लोकसंस्कृति का चित्रण मिलता है।
लोकनाट्य की प्रमुख विशेषताएँ—
संवाद की सरलता
मंच की सादगी
दर्शकों की प्रत्यक्ष भागीदारी
आधुनिक हिंदी रंगमंच की अभिनय शैली और कथ्य पर लोकनाट्य का गहरा प्रभाव पड़ा।
2. भारतेन्दु युग (1850–1885) 
2.1 युग की विशेषताएँ 
यह युग हिंदी नाटक का वास्तविक प्रारंभिक काल है। इस समय भारत अंग्रेजी शासन के अधीन था और समाज अनेक कुरीतियों से ग्रस्त था।
इस युग में—
राष्ट्रीय चेतना का उदय
सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार
पाखंड और अंधविश्वास की आलोचना
नाटक को जनजागरण का साधन बनाना
मुख्य लक्ष्य रहा।

2.2 भारतेन्दु हरिश्चंद्र का योगदान 

भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने नाटक को केवल मनोरंजन का साधन न मानकर सामाजिक क्रांति का माध्यम बनाया।
अंधेर नगरी में उन्होंने भ्रष्ट शासन व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य किया।
भारत दुर्दशा में देश की गुलामी और जनता की दयनीय स्थिति का चित्रण है।
वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति धार्मिक ढोंग पर करारा प्रहार करता है।
उनकी भाषा सरल, व्यंग्यपूर्ण और प्रभावशाली है। इसी कारण उन्हें हिंदी नाटक का पितामह कहा जाता है।

3. द्विवेदी युग (1900–1920) 
3.1 युग की विशेषताएँ 
द्विवेदी युग में साहित्य सुधार और शुद्धता की ओर उन्मुख हुआ।
इस काल में—
भाषा की संस्कृतनिष्ठता
नैतिक आदर्शों पर बल
सामाजिक सुधार की भावना
प्रधान रही।
हालाँकि नाटक मंचीय दृष्टि से पिछड़ा रहा, फिर भी इस युग ने हिंदी को साहित्यिक अनुशासन प्रदान किया।
3.2 प्रमुख नाटककार (विस्तार)
महावीर प्रसाद द्विवेदी स्वयं बड़े नाटककार नहीं थे, लेकिन उन्होंने नाटक के लिए वैचारिक आधार तैयार किया। हरिऔध आदि लेखकों ने आदर्शवादी नाटक लिखे, जिनमें नैतिकता का प्रभाव अधिक था।
4. छायावाद युग (1920–1936) 
4.1 युग की विशेषताएँ 
छायावाद का प्रभाव मुख्यतः काव्य में दिखता है, लेकिन नाटक में भी इसका गहरा असर पड़ा।
गौरवशाली अतीत की खोज
राष्ट्रीय आत्मसम्मान
काव्यात्मक संवाद
भावात्मक गहराई
इस युग की विशेषताएँ हैं।
4.2 जयशंकर प्रसाद का नाट्य योगदान 
जयशंकर प्रसाद ने हिंदी नाटक को ऐतिहासिक गरिमा प्रदान की।
स्कंदगुप्त में राष्ट्ररक्षा और त्याग का आदर्श है।
ध्रुवस्वामिनी नारी स्वाभिमान और अधिकारों की आवाज है।
चंद्रगुप्त राजनीतिक कूटनीति और संघर्ष को दर्शाता है।
प्रसाद के नाटक मंचीय से अधिक साहित्यिक माने जाते हैं, फिर भी उन्होंने हिंदी नाटक को उच्च स्तर दिया।

5. प्रगतिवादी युग (1936–1950) 
5.1 युग की विशेषताएँ 
इस युग में नाटक समाज की सच्चाई का दर्पण बना।
वर्ग संघर्ष
आर्थिक विषमता
शोषण और अन्याय
किसान-मजदूर की पीड़ा
नाटकों का केंद्रीय विषय बना।

5.2 प्रमुख नाटककार
उपेंद्रनाथ अश्क ने मध्यवर्गीय जीवन की समस्याओं को यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत किया। उनके नाटकों में आदर्श नहीं, बल्कि जीवन की कड़वी सच्चाइयाँ मिलती हैं।
6. स्वतंत्रता के बाद का हिंदी नाटक (1950 के बाद)
6.1 युग की विशेषताएँ 
स्वतंत्रता के बाद सामाजिक ढाँचा बदला और नाटक का विषय भी बदला।
व्यक्ति का अकेलापन
पारिवारिक विघटन
संबंधों की जटिलता
अस्तित्व का संकट
मुख्य विषय बने।
6.2 प्रमुख नाटककार 
मोहन राकेश के नाटकों में व्यक्ति की आंतरिक पीड़ा और संबंधों की टूटन दिखाई देती है।
आधे अधूरे आधुनिक परिवार का यथार्थ चित्र है।
आषाढ़ का एक दिन कलाकार और समाज के द्वंद्व को प्रस्तुत करता है।
धर्मवीर भारती का अंधा युग नैतिक मूल्य संकट का प्रतीकात्मक नाटक है।
बादल सरकार ने नाटक को मंच की सीमाओं से बाहर निकालकर जनता के बीच पहुँचाया।

7. समकालीन हिंदी नाटक 
समकालीन हिंदी नाटक सामाजिक प्रश्नों से सीधे टकराता है।
स्त्री विमर्श
दलित चेतना
राजनीतिक भ्रष्टाचार
पहचान और अस्मिता
इन विषयों ने नाटक को वैचारिक रूप से समृद्ध बनाया।

निष्कर्ष 
हिंदी नाटक का विकास एक सतत प्रक्रिया रही है। संस्कृत और लोकनाट्य से प्रारंभ होकर भारतेन्दु के सामाजिक नाटक, प्रसाद के ऐतिहासिक नाटक, प्रगतिवाद के यथार्थवादी नाटक और स्वतंत्रता के बाद के प्रयोगात्मक नाटकों तक हिंदी नाटक निरंतर विकसित हुआ है। आज हिंदी नाटक केवल मंचीय कला नहीं, बल्कि समाज की चेतना और प्रतिरोध की सशक्त अभिव्यक्ति बन चुका है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें