हिंदी आलोचना का उद्भव एवं विकास
भूमिका
हिंदी साहित्य में आलोचना का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। आलोचना साहित्य को समझने, परखने और उसके मूल्यांकन का सशक्त माध्यम है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार—
“आलोचना साहित्य की न्यायालय है।”
हिंदी आलोचना का विकास साहित्य के विकास के साथ-साथ हुआ है। प्रारंभ में यह व्यवस्थित रूप में नहीं थी, परंतु धीरे-धीरे इसका स्वरूप स्पष्ट होता गया।
1. आदिकालीन आलोचना का स्वरूप
आदिकाल (वीरगाथा काल) में आलोचना का कोई स्वतंत्र रूप नहीं मिलता। इस काल में आलोचना—
अप्रत्यक्ष रूप में थी
कवियों की प्रशंसा, निंदा या तुलना के रूप में मिलती है
चारणों और भाटों द्वारा काव्य-गुणगान में मूल्यांकन के तत्व मिलते हैं
इस काल में आलोचना साहित्य का अंग थी, अलग विधा नहीं।
2. भक्तिकालीन आलोचना का स्वरूप
भक्तिकाल में आलोचना का आधार भक्ति, दर्शन और भावानुभूति था।
प्रमुख विशेषताएँ—
काव्य की कसौटी : भक्ति, भाव, साधना
रस, अलंकार या शिल्प की अपेक्षा भाव-शुद्धता पर बल
संत कवियों द्वारा पाखंड, आडंबर की आलोचना
भक्तिकालीन आलोचना भावप्रधान और नैतिक थी।
3. रीतिकालीन आलोचना का विकास
रीतिकाल में हिंदी आलोचना का स्वरूप अधिक स्पष्ट होता है।
प्रमुख विशेषताएँ—
शास्त्रीय आलोचना का विकास
रस, अलंकार, नायक-नायिका भेद पर आधारित मूल्यांकन
केशवदास, चिंतामणि, भूषण जैसे आचार्य कवि
इस काल की आलोचना नियमबद्ध, शास्त्र-आधारित थी, परंतु जीवन से कुछ हद तक दूर।
4. आधुनिक काल में हिंदी आलोचना का विकास
आधुनिक काल में हिंदी आलोचना को स्वतंत्र, वैज्ञानिक और व्यापक स्वरूप प्राप्त हुआ।
(क) भारतेंदु युगीन आलोचना
भारतेंदु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिंदी आलोचना का प्रवर्तक माना जाता है।
विशेषताएँ—
साहित्य को समाज से जोड़ने का प्रयास
सुधारवादी और राष्ट्रवादी दृष्टि
निबंधों, पत्रिकाओं के माध्यम से आलोचना
आलोचना में व्यावहारिकता और चेतना आई।
(ख) द्विवेदी युगीन आलोचना
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
विशेषताएँ—
भाषा की शुद्धता
नैतिकता और आदर्शवाद
साहित्य में अनुशासन
आलोचना संस्कारवादी और सुधारात्मक बनी।
(ग) शुक्ल युगीन आलोचना
आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी के सर्वश्रेष्ठ आलोचक माने जाते हैं।
विशेषताएँ—
ऐतिहासिक और वैज्ञानिक दृष्टि
लोकमंगल की अवधारणा
रस सिद्धांत का सामाजिक आधार
हिंदी आलोचना को सिद्धांत, परंपरा और दृष्टि मिली।
(घ) शुक्लोत्तर युगीन आलोचना
इस काल में आलोचना बहुआयामी हो गई।
प्रमुख आलोचक—
हजारीप्रसाद द्विवेदी
नामवर सिंह
रामविलास शर्मा
विशेषताएँ—
समाजशास्त्रीय, मनोवैज्ञानिक, मार्क्सवादी दृष्टि
संरचनात्मक और तुलनात्मक अध्ययन
आलोचना विचारप्रधान और विश्लेषणात्मक हुई।
हिंदी आलोचना के प्रमुख प्रकार
1. शास्त्रीय आलोचना
काव्यशास्त्र के नियमों पर आधारित
रस, अलंकार, ध्वनि का मूल्यांकन
रीतिकाल में प्रमुख
2. तुलनात्मक आलोचना
दो या अधिक रचनाओं/रचनाकारों की तुलना
समानता और भिन्नता का विश्लेषण
3. ऐतिहासिक (परिस्थितिजन्य) आलोचना
रचना को उसके काल, समाज और परिस्थितियों के संदर्भ में देखना
आचार्य शुक्ल की पद्धति
4. व्याख्यात्मक आलोचना
पाठ की सूक्ष्म व्याख्या
अर्थ, भाव और संकेतों का विश्लेषण
5. लेखक-केंद्रित आलोचना
लेखक के जीवन, व्यक्तित्व और विचारधारा के आधार पर मूल्यांकन
मनोवैज्ञानिक आलोचना से संबंध
हिंदी के कुछ प्रमुख आलोचक
1. डॉ. रामचंद्र शुक्ल : आलोचनात्मक कृतियाँ
डॉ. रामचंद्र शुक्ल को हिंदी आलोचना का आचार्य माना जाता है। उनकी आलोचना का मूल आधार इतिहास, समाज और लोकमंगल है। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ हिंदी आलोचना की आधारशिला मानी जाती है, जिसमें उन्होंने साहित्य को सामाजिक चेतना की अभिव्यक्ति के रूप में देखा। इसके अतिरिक्त ‘चिंतामणि’ (भाग 1 एवं 2) में निबंधात्मक आलोचना के माध्यम से काव्य, रस, भक्ति और साहित्यिक मूल्यों का गहन विवेचन किया गया है। शुक्ल जी की आलोचना की विशेषता यह है कि वे साहित्य को जीवन-संदर्भों से जोड़कर वैज्ञानिक ढंग से विश्लेषित करते हैं, जिससे हिंदी आलोचना को ठोस वैचारिक आधार प्राप्त हुआ।
2. डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी : आलोचनात्मक कृतियाँ
डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी हिंदी आलोचना के संस्कृति-केन्द्रित और मानवतावादी आलोचक हैं। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ में भारतीय संस्कृति, परंपरा और साहित्यिक चेतना का व्यापक विश्लेषण मिलता है। ‘नाथ संप्रदाय’ और ‘कबीर’ जैसी कृतियों में उन्होंने ऐतिहासिक और दार्शनिक दृष्टि से साहित्य का मूल्यांकन किया है। द्विवेदी जी की आलोचना की विशेषता यह है कि वे साहित्य को केवल समाज का दर्पण नहीं, बल्कि संस्कृति की जीवंत प्रक्रिया मानते हैं। उनकी आलोचना में बौद्धिक गहराई के साथ मानवीय संवेदना का सुंदर संतुलन दिखाई देता है।
3. डॉ. नगेन्द्र : आलोचनात्मक कृतियाँ
डॉ. नगेन्द्र आधुनिक हिंदी आलोचना के सिद्धांतवादी और व्यवस्थित आलोचक हैं। उनकी प्रमुख पुस्तक ‘हिंदी आलोचना का विकास’ हिंदी आलोचना के इतिहास को क्रमबद्ध और वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत करती है। इसके अतिरिक्त ‘आधुनिक हिंदी साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ में उन्होंने आधुनिक साहित्य की विभिन्न धाराओं का विश्लेषण किया है। डॉ. नागेन्द्र की आलोचना शैली पाठ-केन्द्रित, विश्लेषणात्मक और तर्कपूर्ण है, जिससे उनकी कृतियाँ विश्वविद्यालयी अध्ययन के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई हैं।
4. डॉ. रामविलास शर्मा : आलोचनात्मक कृतियाँ
डॉ. रामविलास शर्मा हिंदी के प्रमुख मार्क्सवादी आलोचक हैं। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ में साहित्य को वर्ग-संघर्ष और सामाजिक यथार्थ के संदर्भ में देखा गया है। ‘भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश’ तथा ‘प्रगतिशील साहित्य की समस्याएँ’ में उन्होंने साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना है। रामविलास शर्मा की आलोचना की विशेषता यह है कि वे साहित्य को ऐतिहासिक भौतिकवाद और जनचेतना से जोड़कर देखते हैं, जिससे हिंदी आलोचना को सामाजिक दृष्टि की नई दिशा मिली।
परीक्षा की दृष्टि से एक लाइन में निष्कर्ष
शुक्ल – ऐतिहासिक व लोकमंगलवादी आलोचना
हजारीप्रसाद द्विवेदी – संस्कृति और मानवतावादी आलोचना
नगेन्द्र – सिद्धांतवादी व अकादमिक आलोचना
रामविलास शर्मा – समाजवादी/मार्क्सवादी आलोचना
उपसंहार
हिंदी आलोचना का विकास आदिकालीन अप्रत्यक्ष रूप से लेकर आधुनिक काल की वैज्ञानिक और बहुआयामी आलोचना तक एक लंबी यात्रा है। आज हिंदी आलोचना केवल मूल्यांकन नहीं, बल्कि साहित्य, समाज और संस्कृति के गहरे संवाद का माध्यम बन चुकी है।
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