व्यक्तित्व : परिभाषा, व्यक्तित्व विकास के तत्त्व एवं प्रकार
प्रस्तावना / भूमिका
मानव जीवन केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें सोचने-समझने की क्षमता, भावनाएँ, व्यवहार, आचार-विचार और सामाजिक संबंध भी सम्मिलित होते हैं। यही सभी तत्व मिलकर व्यक्ति की पहचान बनाते हैं, जिसे हम व्यक्तित्व कहते हैं। किसी व्यक्ति को हम अच्छा, प्रभावशाली, आत्मविश्वासी या कमजोर कहते हैं—यह सब उसके व्यक्तित्व के आधार पर ही कहा जाता है।
आज के समय में व्यक्तित्व का महत्व और भी बढ़ गया है। शिक्षा, नौकरी, समाज, राजनीति, साहित्य—हर क्षेत्र में वही व्यक्ति सफल माना जाता है, जिसका व्यक्तित्व संतुलित, प्रभावी और सकारात्मक हो। इसलिए व्यक्तित्व का अध्ययन और उसका विकास एक महत्वपूर्ण विषय है, विशेषकर BA स्तर के विद्यार्थियों के लिए।
व्यक्तित्व की परिभाषा
व्यक्तित्व शब्द अंग्रेज़ी के Personality का हिंदी रूप है, जो लैटिन शब्द Persona से बना है। Persona का अर्थ है—मुखौटा, अर्थात वह रूप जिससे व्यक्ति समाज में पहचाना जाता है।
व्यक्तित्व की प्रमुख परिभाषाएँ
वुडवर्थ (Woodworth) के अनुसार—
“व्यक्तित्व व्यक्ति के संपूर्ण व्यवहार का योग है।”
ऑलपोर्ट (Allport) के अनुसार—
“व्यक्तित्व व्यक्ति के भीतर स्थित उन मानसिक और शारीरिक गुणों का संगठित रूप है, जो उसके व्यवहार को दिशा प्रदान करते हैं।”
क्रेच एवं क्रचफील्ड के अनुसार—
“व्यक्तित्व व्यक्ति के स्थायी व्यवहार प्रतिरूपों का संगठन है।”
सरल शब्दों में परिभाषा
व्यक्तित्व वह संपूर्ण गुणसमूह है, जिसके द्वारा किसी व्यक्ति की सोच, व्यवहार, भावना, आदतें और सामाजिक व्यवहार प्रकट होते हैं।
व्यक्तित्व की विशेषताएँ
व्यक्तित्व की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
व्यक्तित्व जन्मजात और अर्जित दोनों होता है।
यह व्यक्ति को दूसरों से अलग पहचान देता है।
व्यक्तित्व स्थिर भी होता है और परिवर्तनशील भी।
इसमें शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक सभी पक्ष शामिल होते हैं।
व्यक्तित्व का विकास पूरे जीवन चलता रहता है।
व्यक्तित्व विकास का अर्थ
व्यक्तित्व विकास का अर्थ है—व्यक्ति के भीतर छिपी क्षमताओं, गुणों और व्यवहार को इस प्रकार विकसित करना कि वह अपने जीवन में सफल, संतुलित और सामाजिक रूप से उपयोगी बन सके।
इसमें आत्मविश्वास, अनुशासन, सकारात्मक सोच, नैतिकता और सामाजिक व्यवहार का विकास शामिल होता है।
व्यक्तित्व विकास के तत्त्व
व्यक्तित्व विकास अनेक तत्त्वों पर निर्भर करता है, जिन्हें निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है—
1. शारीरिक तत्त्व
शरीर की बनावट, स्वास्थ्य, लंबाई-चौड़ाई
शारीरिक आकर्षण और ऊर्जा
अच्छा स्वास्थ्य आत्मविश्वास बढ़ाता है
स्वस्थ शरीर से ही सशक्त व्यक्तित्व का निर्माण होता है।
2. मानसिक तत्त्व
बुद्धि, स्मरण शक्ति, कल्पनाशक्ति
सोचने-समझने की क्षमता
समस्या समाधान की योग्यता
मानसिक रूप से सशक्त व्यक्ति जीवन की चुनौतियों का सामना बेहतर ढंग से करता है।
3. भावनात्मक तत्त्व
भावनाओं पर नियंत्रण
सहनशीलता और धैर्य
सकारात्मक भावनाएँ
भावनात्मक संतुलन व्यक्तित्व को आकर्षक बनाता है।
4. सामाजिक तत्त्व
परिवार, समाज और मित्रों का प्रभाव
सामाजिक व्यवहार और संवाद क्षमता
सहयोग, सहानुभूति और नेतृत्व
समाज के बिना व्यक्तित्व अधूरा है।
5. नैतिक एवं चारित्रिक तत्त्व
सत्य, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा
नैतिक मूल्य और संस्कार
आत्मअनुशासन
चरित्रवान व्यक्ति का व्यक्तित्व दीर्घकालिक प्रभाव डालता है।
6. सांस्कृतिक तत्त्व
परंपराएँ, रीति-रिवाज
भाषा, साहित्य और कला
धार्मिक और सांस्कृतिक वातावरण
संस्कृति व्यक्तित्व को दिशा देती है।
व्यक्तित्व के प्रकार
मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्तित्व को विभिन्न आधारों पर वर्गीकृत किया है—
1. शारीरिक आधार पर
(क) स्थूल व्यक्तित्व
मोटा शरीर, आराम पसंद
भावनात्मक रूप से स्थिर
(ख) कृश व्यक्तित्व
दुबला-पतला शरीर
संवेदनशील और कल्पनाशील
(क) अंतर्मुखी व्यक्तित्व (Introvert)
कम बोलने वाला
आत्मकेन्द्रित
एकांत पसंद
(ख) बहिर्मुखी व्यक्तित्व (Extrovert)
मिलनसार
समाज में सक्रिय
नेतृत्व क्षमता
3. स्वभाव के आधार पर
(क) भावुक व्यक्तित्व
अधिक संवेदनशील
जल्दी प्रभावित
(ख) तर्कशील व्यक्तित्व
सोच-समझकर निर्णय
व्यवहारिक दृष्टिकोण
4. गुणों के आधार पर
(क) सकारात्मक व्यक्तित्व
आशावादी
आत्मविश्वासी
कर्मठ
(ख) नकारात्मक व्यक्तित्व
निराशावादी
हीन भावना
असंतोषी
व्यक्तित्व विकास का महत्व
आत्मविश्वास में वृद्धि
सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त होती है
करियर और जीवन में सफलता
नेतृत्व क्षमता का विकास
संतुलित और सुखी जीवन
निष्कर्ष
अंततः कहा जा सकता है कि व्यक्तित्व मानव जीवन की आत्मा है। यह व्यक्ति की पहचान, सोच और व्यवहार का समग्र रूप है। व्यक्तित्व न तो पूरी तरह जन्मजात होता है और न ही पूरी तरह अर्जित, बल्कि यह दोनों का समन्वय है। उचित शिक्षा, संस्कार, वातावरण और आत्मप्रयास के माध्यम से व्यक्तित्व का निरंतर विकास संभव है।
आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में केवल ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि संतुलित, नैतिक और प्रभावशाली व्यक्तित्व ही व्यक्ति को समाज में सम्मान और सफलता दिला सकता है। इसलिए प्रत्येक विद्यार्थी को अपने व्यक्तित्व के विकास पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
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