प्लेटो की काव्य-संबंधी मान्यताएँ
प्लेटो (Plato) यूनानी दर्शन के महान दार्शनिक थे। वे सुकरात के शिष्य और अरस्तू के गुरु माने जाते हैं। यद्यपि प्लेटो स्वयं एक महान विचारक थे, फिर भी वे काव्य और कवियों के प्रति कठोर आलोचक के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनकी काव्य-सम्बन्धी मान्यताएँ मुख्यतः उनकी प्रसिद्ध रचना ‘रिपब्लिक’ (Republic) में मिलती हैं। प्लेटो का मानना था कि काव्य समाज, नैतिकता और सत्य के लिए कई बार हानिकारक सिद्ध होता है। इसलिए उन्होंने काव्य को दर्शन की कसौटी पर कसकर परखा।
1. प्लेटो का दर्शन और काव्य दृष्टि
प्लेटो मूलतः आदर्शवादी दार्शनिक थे। उनके दर्शन का केंद्र सत्य, नैतिकता और आदर्श राज्य की कल्पना है। वे मानते थे कि किसी भी कला या साहित्य का उद्देश्य मानव को सत्य और सद्गुण की ओर ले जाना होना चाहिए।
यदि काव्य इस उद्देश्य को पूरा नहीं करता, तो वह समाज के लिए अनुपयोगी या हानिकारक हो सकता है।
2. अनुकरण का सिद्धांत (Theory of Imitation – Mimēsis)
(क) अनुकरण की अवधारणा
प्लेटो के अनुसार काव्य अनुकरण (अनुकृति) है। लेकिन यह अनुकरण सत्य का नहीं, बल्कि सत्य की नकल की नकल है।
(ख) त्रिस्तरीय अनुकरण
प्लेटो ने संसार को तीन स्तरों में विभाजित किया—
आदर्श या विचार जगत (World of Ideas)
यह पूर्ण सत्य का जगत है
ईश्वर द्वारा निर्मित
वास्तविक भौतिक संसार
यह आदर्श जगत की नकल है
काव्य या कला
यह भौतिक संसार की नकल है
इस प्रकार काव्य सत्य से तीन कदम दूर होता है।
(ग) निष्कर्ष
प्लेटो के अनुसार कवि सत्य को नहीं, बल्कि माया और भ्रम को प्रस्तुत करता है। इसलिए काव्य ज्ञान नहीं, बल्कि अज्ञान को बढ़ाता है।
3. कवि का ज्ञान-विहीन होना
प्लेटो का मानना था कि—
कवि को जिस विषय पर वह लिखता है, उसका वास्तविक ज्ञान नहीं होता
कवि केवल भावनाओं और कल्पना के सहारे रचना करता है
उदाहरण के लिए—
जो कवि युद्ध का वर्णन करता है, वह स्वयं योद्धा नहीं होता
जो कवि शासन का वर्णन करता है, वह शासक नहीं होता
इसलिए प्लेटो कवि को अर्धज्ञानी मानते हैं।
4. भावनाओं पर काव्य का प्रभाव
प्लेटो के अनुसार काव्य—
तर्क और विवेक के बजाय भावनाओं को उकसाता है
करुणा, भय, शोक जैसी भावनाओं को बढ़ाता है
प्लेटो का तर्क
आदर्श मनुष्य वह है जो बुद्धि से संचालित हो
काव्य मनुष्य को भावनाओं का दास बना देता है
इससे व्यक्ति का नैतिक पतन होता है।
5. नैतिक दृष्टि से काव्य की आलोचना
प्लेटो ने काव्य की सबसे कड़ी आलोचना नैतिक आधार पर की।
(क) देवताओं का अनैतिक चित्रण
यूनानी काव्य में—
देवता झूठ बोलते हैं
छल, क्रोध, ईर्ष्या करते हैं
प्लेटो के अनुसार—
यदि देवता ही अनैतिक दिखाए जाएँगे
तो समाज में नैतिकता कैसे बचेगी?
(ख) नायकों का दुर्बल चित्रण
नायकों को रोते-धोते, भयभीत दिखाया जाता है
इससे युवाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है
6. आदर्श राज्य से कवियों का निष्कासन
प्लेटो की प्रसिद्ध घोषणा है—
“आदर्श राज्य में कवियों के लिए कोई स्थान नहीं है।”
इसके कारण—
कवि सत्य से दूर होता है
कवि भावनाओं को भड़काता है
कवि नैतिकता को कमजोर करता है
कवि युवाओं को भ्रमित करता है
इसलिए प्लेटो ने कवियों को राज्य से बाहर निकालने की बात कही।
7. सशर्त काव्य की स्वीकृति
यह कहना गलत होगा कि प्लेटो काव्य के पूर्ण विरोधी थे।
प्लेटो काव्य को स्वीकार करते हैं यदि—
वह सत्य पर आधारित हो
वह नैतिक शिक्षा दे
वह देवताओं और नायकों का आदर्श चित्रण करे
अर्थात्—
नैतिक, शिक्षाप्रद और संयमित काव्य स्वीकार्य है
भ्रामक और भावुकतावादी काव्य अस्वीकार्य है
8. प्लेटो की काव्य दृष्टि का मूल्यांकन
(क) प्लेटो के विचारों की विशेषताएँ
काव्य को नैतिक कसौटी पर परखा
साहित्य को समाज से जोड़ा
कला को निरंकुश स्वतंत्रता नहीं दी
(ख) प्लेटो की सीमाएँ
काव्य के सौंदर्य पक्ष की उपेक्षा
कल्पना और भावनाओं के महत्व को कम आँका
काव्य को दर्शन के अधीन कर दिया
9. अरस्तू और प्लेटो का अंतर (संक्षेप में)
जहाँ प्लेटो ने—
अनुकरण को भ्रम माना
वहीं अरस्तू ने—
अनुकरण को स्वाभाविक और उपयोगी बताया
इसी से काव्यशास्त्र में नया मोड़ आया।
उपसंहार
प्लेटो की काव्य-संबंधी मान्यताएँ आलोचनात्मक, नैतिक और दार्शनिक हैं। वे काव्य को समाज और राज्य के हित में देखना चाहते थे। यद्यपि उनकी दृष्टि कठोर प्रतीत होती है, फिर भी उन्होंने साहित्य को नैतिक जिम्मेदारी का बोध कराया। प्लेटो के विचारों से यह स्पष्ट होता है कि काव्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाला माध्यम है।
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