5955758281021487 Hindi sahitya : अरस्तु का अनुकृति व विवेचन सिद्धांत

गुरुवार, 29 जनवरी 2026

अरस्तु का अनुकृति व विवेचन सिद्धांत

अरस्तु के काव्य-संबंधी विचारों की विवेचना कीजिए। विशेष रूप से अनुकृति (Mimesis) और विरेचन (Catharsis) की अवधारणा को पाश्चात्य काव्यशास्त्र के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।

भूमिका (प्रस्तावना)

पाश्चात्य काव्यशास्त्र में अरस्तु (384–322 ई.पू.) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे प्लेटो के शिष्य थे, किंतु काव्य के विषय में उनके विचार अपने गुरु प्लेटो से भिन्न और अधिक यथार्थवादी, वैज्ञानिक तथा व्यावहारिक हैं। अरस्तु की प्रसिद्ध कृति ‘Poetics’ (काव्यशास्त्र) को पाश्चात्य साहित्य-आलोचना की आधारशिला माना जाता है।
अरस्तु ने काव्य को न तो केवल कल्पना माना और न ही उसे समाज के लिए हानिकारक बताया, बल्कि उन्होंने काव्य को मानव स्वभाव से जुड़ी एक स्वाभाविक और उपयोगी कला स्वीकार किया। उनके काव्य-विचार मुख्य रूप से दो सिद्धांतों के इर्द-गिर्द केंद्रित हैं—
अनुकृति (Mimesis)
विरेचन / कैथार्सिस (Catharsis)

अरस्तु के काव्य-संबंधी सामान्य विचार

अरस्तु के अनुसार—
काव्य एक अनुकरणात्मक कला है
काव्य का संबंध जीवन और यथार्थ से है
काव्य मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है
काव्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भावात्मक शुद्धि और बौद्धिक आनंद है
अरस्तु ने विशेष रूप से त्रासदी (Tragedy) को श्रेष्ठ काव्य रूप माना और उसी के माध्यम से अपने सिद्धांतों को स्पष्ट किया।

1. अनुकृति (Mimesis) का सिद्धांत
(क) अनुकृति का अर्थ
Mimesis’ का शाब्दिक अर्थ है—
अनुकरण, नकल या प्रतिरूपण
परंतु अरस्तु के यहाँ अनुकृति का अर्थ केवल यथार्थ की नकल नहीं है, बल्कि
 जीवन की सृजनात्मक और कलात्मक प्रस्तुति है।
अरस्तु के अनुसार मनुष्य स्वभाव से ही अनुकरणप्रिय है और उसे अनुकरण से आनंद प्राप्त होता है। काव्य इसी मानवीय प्रवृत्ति का कलात्मक रूप है।

(ख) प्लेटो और अरस्तु की अनुकृति-धारणा में अंतर
प्लेटो।                                      अरस्तु
काव्य को सत्य की नकल मानते हैं।  काव्य को जीवन की                                                        सच्चाई की अभिव्यक्ति।          
  काव्य को भ्रमजनक कहते है।      काव्य को उपयोगी और                                                     शिक्षाप्रद मानते हैं
कवि को समाज के लिए हानिकारक।   कवि को समाज का                                                          मार्गदर्शक

 इस प्रकार अरस्तु ने अनुकृति को नकारात्मक नहीं, सकारात्मक सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया।

(ग) अरस्तु के अनुसार अनुकृति के प्रकार

अरस्तु ने अनुकृति को तीन आधारों पर विभाजित किया—

1.माध्यम के अनुसार अनुकृति

       भाषा
        छंद 
         संगीत 

2 विषय के अनुसार अनुकृति
     मनुष्य को उससे अच्छा
      उससे बुरा
         या जैसा वह है, वैसा दिखाना
3.शैली के अनुसार अनुकृति
   कथात्मक (महाकाव्य)
   नाटकीय (त्रासदी)

(घ) अनुकृति का महत्व

काव्य जीवन से जुड़ता है
कल्पना और यथार्थ में संतुलन बनता है
पाठक को पहचान और अनुभूति मिलती है
काव्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि ज्ञान और अनुभूति का साधन बनता है

2. विरेचन (Catharsis) का सिद्धांत
(क) विरेचन का अर्थ
‘Catharsis’ यूनानी शब्द है, जिसका अर्थ है—
शुद्धिकरण, भावों का परिष्कार या मानसिक परिमार्जन
अरस्तु के अनुसार त्रासदी का उद्देश्य है—
करुणा (करुणा) और भय (भय) जैसे भावों का विरेचन करना।

(ख) विरेचन की प्रक्रिया

जब दर्शक त्रासदी में—
नायक के दुःख को देखता है → करुणा
उसके पतन को देखकर → भय
तो उसके मन में दबे हुए भाव बाहर आते हैं और वह मानसिक रूप से हल्का और संतुलित हो जाता है।
 यही प्रक्रिया विरेचन कहलाती है।

(ग) विरेचन के विभिन्न अर्थ (व्याख्याएँ)

विद्वानों ने विरेचन की अलग-अलग व्याख्याएँ की हैं—
चिकित्सकीय अर्थ
मानसिक विकारों की शुद्धि
नैतिक अर्थ
भावों का संयम और संतुलन
सौंदर्यात्मक अर्थ
दुखद दृश्य से भी आनंद की प्राप्ति
 मानसिक शुद्धि वाला अर्थ स्वीकार किया जाता है।
(घ) विरेचन का महत्व

त्रासदी को उपयोगी सिद्ध करता है
भावनाओं को स्वस्थ दिशा देता है
मनुष्य को आत्मबोध कराता है
कला और जीवन के बीच सेतु बनता है

त्रासदी की परिभाषा (अरस्तु के अनुसार)
अरस्तु ने त्रासदी की प्रसिद्ध परिभाषा दी—
“त्रासदी एक गंभीर और पूर्ण कर्म की अनुकृति है, जो करुणा और भय के माध्यम से भावों का विरेचन करती है।”
यह परिभाषा अरस्तु के काव्य-सिद्धांत का सार है।

अरस्तु के काव्य-सिद्धांत का महत्व

पाश्चात्य काव्यशास्त्र की नींव
वैज्ञानिक और तर्कसंगत दृष्टि
साहित्य को समाजोपयोगी सिद्ध किया
आधुनिक आलोचना पर गहरा प्रभाव

सीमाएँ (संक्षेप में)
हास्य काव्य पर कम विचार
संगीत और गीतिकाव्य की उपेक्षा
केवल त्रासदी पर अधिक केंद्रित
फिर भी, इन सीमाओं के बावजूद अरस्तु का महत्व अक्षुण्ण है।

निष्कर्ष
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि अरस्तु पाश्चात्य काव्यशास्त्र के सर्वाधिक प्रभावशाली विचारक हैं। अनुकृति और विरेचन के सिद्धांतों के माध्यम से उन्होंने काव्य को जीवन से जोड़ा और उसे मानव-मनोविज्ञान से संबंधित सिद्ध किया। उनके विचार आज भी साहित्य-आलोचना और काव्य-अध्ययन के लिए मार्गदर्शक हैं।

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