भूमिका
हिंदी नवजागरण का सबसे बड़ा और प्रभावशाली नाम भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850–1885) है। उन्हें ‘आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक’ और ‘हिंदी नवजागरण का जनक’ कहा जाता है। उन्होंने मात्र 35 वर्ष के जीवन में हिंदी को राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक सुधार का सशक्त माध्यम बना दिया। उनके साहित्य और पत्रकारिता ने हिंदी समाज को नई दिशा दी और नवजागरण की चेतना को स्थायी रूप दिया।
भारतेंदु हरिश्चंद्र की भूमिका (मुख्य बिंदु)
1. भाषा और साहित्य का परिष्कार
भारतेंदु ने खड़ी बोली हिंदी को साहित्यिक रूप देकर उसे आधुनिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया।
संस्कृत और उर्दू शब्दों का संतुलन रखते हुए सरल, सहज और जनप्रिय हिंदी को प्रतिष्ठित किया।
2. पत्रकारिता का योगदान
कवि वचन सुधा, हरिश्चंद्र चंद्रिका और भारत मित्र जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से जनचेतना का प्रसार।
पत्रकारिता को सामाजिक सुधार और राष्ट्रवादी विचारधारा से जोड़ा।
3. सामाजिक सुधारक के रूप में
जातिगत भेदभाव, अशिक्षा और स्त्रियों की दयनीय स्थिति पर प्रहार।
भारत दुर्दशा नाटक में तत्कालीन भारत की दुर्दशा का मार्मिक चित्रण।
उन्होंने लिखा –
“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय के शूल॥”
4. राष्ट्रवाद का उद्घोष
भारतेंदु ने स्वदेश प्रेम और राष्ट्रीयता को अपनी रचनाओं में केंद्रीय स्थान दिया।
विदेशी वस्त्र और संस्कृति की अंधी नकल के विरुद्ध स्वर उठाया।
उनके साहित्य ने स्वतंत्रता आंदोलन की भावनाओं को बल प्रदान किया।
5. साहित्यिक विधाओं का विकास
नाटक, कविता, निबंध, यात्रा-वृत्तांत, अनुवाद, आलोचना – सभी विधाओं में लेखन।
अंधेर नगरी नाटक आज भी समाज में राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार का तीखा व्यंग्य है।
6. हिंदी समाज का नेतृत्व
भारतेंदु ने हिंदी साहित्य को केवल काव्य-रस का साधन न मानकर समाज का दर्पण बनाया।
वे साहित्यकार के साथ-साथ मार्गदर्शक, विचारक और संगठनकर्ता भी थे।
भारतेंदु की विशेषताओं का मूल्यांकन
1. हिंदी साहित्य को आधुनिकता प्रदान करने वाले प्रथम साहित्यकार।
2. साहित्य और समाज के बीच सेतु का निर्माण।
3. साहित्य के माध्यम से राष्ट्रीयता और लोकतांत्रिक चेतना का प्रसार।
4. साहित्यिक पत्रकारिता की सशक्त नींव रखी।
5. जीवन अल्पकालिक होते हुए भी असाधारण योगदान।
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निष्कर्ष
भारतेंदु हरिश्चंद्र हिंदी नवजागरण के वास्तविक सूत्रधार थे। उन्होंने साहित्य, पत्रकारिता और सामाजिक नेतृत्व के माध्यम से हिंदी समाज को नई दिशा दी। उनकी रचनाओं ने न केवल हिंदी साहित्य को आधुनिक स्वरूप प्रदान किया, बल्कि समाज में सुधार और राष्ट्रीय चेतना का भी संचार किया। इसीलिए उन्हें सही अर्थों में “हिंदी नवजागरण का जनक” कहा जाता है।
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