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गुरुवार, 28 अगस्त 2025

दक्षिण भारतीय प्रचारिणी सभा,चेन्नई

दक्षिण भारत हिंदी प्रचारिणी सभा : भूमिका, कार्य, महत्त्व एवं आधुनिक संदर्भ 

भूमिका


भारतीय संस्कृति और साहित्य की आत्मा हिंदी भाषा में निहित है। हिंदी न केवल उत्तर भारत की आत्मा है, बल्कि दक्षिण भारत में भी इसके प्रचार-प्रसार के लिए विभिन्न आंदोलनों और संस्थाओं ने कार्य किया। इन्हीं में से एक है "दक्षिण भारत हिंदी प्रचारिणी सभा"। यह संस्था हिंदी को दक्षिण भारत के जनमानस तक पहुँचाने के लिए 1918 में स्थापित की गई थी। इसका उद्देश्य यह था कि हिंदी को एक अखिल भारतीय भाषा के रूप में स्थापित किया जाए और दक्षिण भारत के लोग भी हिंदी ज्ञान से लाभान्वित हो सकें। महात्मा गांधी ने इसके लिए विशेष प्रेरणा दी थी और उनके सहयोग से ही यह संस्था विकसित हुई।

स्थापना एवं उद्देश्य

दक्षिण भारत हिंदी प्रचारिणी सभा की स्थापना 1918 ई. में मद्रास (वर्तमान चेन्नई) में की गई।

इसके मूल उद्देश्य थे –

1. दक्षिण भारत में हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार करना।
2. हिंदी शिक्षा की परीक्षा प्रणाली बनाना।
3. हिंदी साहित्य का प्रकाशन और वितरण करना।
4. हिंदी शिक्षकों को प्रशिक्षण देना।
5. हिंदी के माध्यम से सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीय चेतना को सुदृढ़ करना।

कार्य एवं उपलब्धियाँ

1. शैक्षिक प्रसार –
सभा ने प्राथमिक से लेकर उच्च स्तर तक हिंदी शिक्षा की पाठ्यपुस्तकें तैयार कीं। दक्षिण भारत के विभिन्न विद्यालयों और महाविद्यालयों में हिंदी को पढ़ाए जाने योग्य विषय बनाया।

2. परीक्षा प्रणाली –
इस संस्था ने "प्रवेशिका", "प्रथम", "मध्यमा", "राष्ट्रभाषा" जैसी परीक्षाएँ आरंभ कीं, जिनसे लाखों विद्यार्थियों ने हिंदी सीखी। आज भी इसकी परीक्षा व्यवस्था प्रतिष्ठित मानी जाती है।

3. प्रकाशन कार्य –
सभा ने हजारों हिंदी पुस्तकों, पत्रिकाओं और शब्दकोशों का प्रकाशन किया। इससे दक्षिण भारत के लोगों के लिए हिंदी सीखना और भी सहज हुआ।

4. शिक्षक प्रशिक्षण –
हिंदी शिक्षकों को तैयार करने और उन्हें प्रशिक्षण देने का दायित्व भी इसी संस्था ने निभाया।

5. सांस्कृतिक एकता –
हिंदी के माध्यम से उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सांस्कृतिक दूरी को पाटने में इस संस्था की  भूमिका महत्वपूर्ण है।

प्रमुख व्यक्तित्व और योगदान

महात्मा गांधी – उन्होंने दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार का स्वप्न देखा और इस संस्था की स्थापना में मार्गदर्शन दिया।

सी. राजगोपालाचारी – हिंदी प्रचार कार्य में सक्रिय सहयोग दिया।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद और जामिया मिलिया इस्लामिया के अनेक शिक्षकों ने भी सहयोग किया।

आधुनिक समय में डॉ. रघुवीर, डॉ. श्यामसुंदर दास, डॉ. नगेन्द्र, तथा दक्षिण भारत के अनेक हिंदीप्रेमी विद्वान इस संस्था से जुड़े।

हिंदी परीक्षा प्रणाली (सभा की विशेषता)

दक्षिण भारत हिंदी प्रचारिणी सभा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी परीक्षा प्रणाली रही है। इसने हिंदी सीखने के लिए क्रमबद्ध परीक्षाएँ प्रारंभ कीं, जिससे लाखों विद्यार्थी लाभान्वित हुए।

प्रमुख परीक्षाएँ इस प्रकार हैं –

1. प्रथमा – प्रारंभिक स्तर की परीक्षा। इसमें हिंदी वर्णमाला, सरल शब्द, वाक्य और सामान्य पाठ पढ़ना-लिखना सिखाया जाता है।

2. मध्यमा – हिंदी भाषा का थोड़ा उच्च स्तर। इसमें गद्य, पद्य, व्याकरण और निबंध लेखन शामिल रहता है।

3. रत्न – उच्चतर माध्यमिक स्तर की परीक्षा। इसमें साहित्य, आलोचना और भाषा-शैली की गहराई पढ़ाई जाती है।

4. विशारद – स्नातक स्तर की परीक्षा। इसमें साहित्य का इतिहास, प्रमुख कवि-नाटककार और आलोचना का अध्ययन कराया जाता है।

5. विद्या वाचस्पति – शोध स्तर की परीक्षा। इसे हिंदी में पी-एच.डी. के समकक्ष माना जाता है।

 दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के चार रीजनल सेंटर इस प्रकार हैं –

1. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई (मुख्य केंद्र)
स्थापना: 1918 में महात्मा गांधी के प्रयास से।

उद्देश्य: दक्षिण भारत में हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार।

गतिविधियाँ: हिंदी शिक्षा, परीक्षा आयोजन, शिक्षक प्रशिक्षण, शोध एवं प्रकाशन।

2 दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मदुरै (रीजनल सेंटर)

उद्देश्य: तमिलनाडु क्षेत्र में हिंदी शिक्षण का विस्तार।

गतिविधियाँ: हिंदी की परीक्षाएँ, स्थानीय स्तर पर कक्षाएँ और सांस्कृतिक कार्यक्रम।

3. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, विजयवाड़ा (रीजनल सेंटर)

उद्देश्य: आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में हिंदी का प्रसार।

गतिविधियाँ: हिंदी वाद-विवाद, निबंध प्रतियोगिता, हिंदी प्रशिक्षण और परीक्षाएँ।

4. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद (रीजनल सेंटर)

उद्देश्य: उर्दू और हिंदी के सहअस्तित्व वाले क्षेत्र में हिंदी को बढ़ावा देना।

गतिविधियाँ: हिंदी शिक्षक प्रशिक्षण, हिंदी पठन-पाठन, साहित्यिक सम्मेलन।

5. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, त्रिवेंद्रम/कोच्चि (रीजनल सेंटर – केरल)

उद्देश्य: केरल में हिंदी शिक्षा और हिंदी साहित्य का विकास।

गतिविधियाँ: हिंदी पाठ्यक्रम, परीक्षाएँ और हिंदी दिवस समारोह।

आधुनिक संदर्भ : डिजिटल शिक्षा और ऑनलाइन परीक्षा

समय के साथ संस्था ने अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार किया और डिजिटल शिक्षा की दिशा में भी कदम बढ़ाए।

अब ऑनलाइन माध्यम से हिंदी शिक्षा उपलब्ध कराई जा रही है।
ऑनलाइन परीक्षा प्रणाली शुरू की गई है, जिससे दक्षिण भारत के किसी भी राज्य का विद्यार्थी घर बैठे हिंदी परीक्षा दे सकता है।

ई-पुस्तकें और डिजिटल सामग्री के प्रकाशन से हिंदी सीखना आसान हुआ।

आधुनिक प्रशासनिक तंत्र में हिंदी प्रचारिणी सभा ने कंप्यूटर आधारित शिक्षण और सूचना तकनीक को अपनाकर हिंदी प्रचार को नई दिशा दी है।

आधुनिक साहित्यकारों का योगदान

दक्षिण भारत हिंदी प्रचारिणी सभा से जुड़े अनेक साहित्यकारों ने हिंदी के प्रचार में योगदान दिया।

रामवृक्ष बेनीपुरी, महादेवी वर्मा, डॉ. हरिवंश राय बच्चन, और रामधारी सिंह दिनकर जैसे साहित्यकारों की रचनाएँ इस संस्था के प्रकाशनों के माध्यम से दक्षिण भारत तक पहुँचीं।

आधुनिक समय में डॉ. नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, मैत्रेयी पुष्पा, ज्ञानवती दरबार, और महेश दर्पण जैसे साहित्यकारों के विचार और रचनाएँ भी इस संस्था के मंच से प्रचारित हुईं।

दक्षिण भारत के स्थानीय हिंदी रचनाकारों (जैसे डॉ. गोपीचंद नारंग और प्रो. वासुदेवन नायर) ने हिंदी में उल्लेखनीय योगदान देकर इसे समृद्ध बनाया।

महत्त्व

1. राष्ट्रीय एकता का माध्यम – इस संस्था ने हिंदी को उत्तर और दक्षिण के बीच सेतु बनाया।

2. शिक्षा का प्रसार – लाखों विद्यार्थियों ने हिंदी ज्ञान प्राप्त कर सरकारी और सामाजिक कार्यों में भाग लिया।

3. डिजिटल युग में नवाचार – ऑनलाइन शिक्षा और परीक्षा प्रणाली ने इसकी प्रासंगिकता और बढ़ा दी।

4. सांस्कृतिक आदान-प्रदान – हिंदी साहित्य के माध्यम से दक्षिण भारत में भारतीय संस्कृति का प्रचार हुआ।

5. हिंदी को राजभाषा बनाने में योगदान – इस संस्था के प्रयासों ने हिंदी को अखिल भारतीय स्तर पर स्वीकार्यता दिलाई।

निष्कर्ष

दक्षिण भारत हिंदी प्रचारिणी सभा ने पिछले सौ वर्षों में हिंदी को केवल भाषा के रूप में ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक के रूप में स्थापित किया है। आज जब शिक्षा डिजिटल और ऑनलाइन हो रही है, तब भी इस संस्था ने समयानुकूल परिवर्तन कर अपनी उपयोगिता सिद्ध की है। हिंदी साहित्य के क्लासिक रचनाकारों से लेकर आधुनिक साहित्यकारों तक, सबके विचार इस संस्था के मंच से दक्षिण भारत के समाज तक पहुँचे हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि यह सभा न केवल हिंदी के प्रचार की संस्था है, बल्कि भारतीय संस्कृति और एकता का जीता-जागता उदाहरण भी हैं।

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