भूमंडलीकरण और हिंदी कविता पर विचार कीजिए।
भूमिका
भूमंडलीकरण (Globalization) आज के युग की सबसे चर्चित प्रक्रिया है, जिसने विश्व को ‘ग्लोबल विलेज’ में बदल दिया है। यह केवल आर्थिक या राजनीतिक घटना नहीं है, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषाई और साहित्यिक क्षेत्रों को भी गहराई से प्रभावित करती है। साहित्य समाज का दर्पण होता है, इसलिए हिंदी कविता भी इस प्रभाव से अछूती नहीं रह सकी। भूमंडलीकरण ने हिंदी कविता की दृष्टि, स्वर, भाषा और संवेदना—सभी को नए आयाम दिए हैं। हिंदी कवियों ने भूमंडलीकरण से उपजी जटिलताओं, अवसरों और चुनौतियों को अपने काव्य में व्यक्त किया है। नीचे इस विषय पर विस्तृत विवेचन प्रस्तुत है—
1. भूमंडलीकरण की परिभाषा और स्वरूप
भूमंडलीकरण का अर्थ है—विश्व की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं का परस्पर जुड़ाव और एक-दूसरे पर निर्भरता। आधुनिक तकनीकी क्रांति, इंटरनेट, उपग्रह चैनलों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इस प्रक्रिया को तीव्र बना दिया। भारत में उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों के साथ 1990 के दशक से भूमंडलीकरण का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जाने लगा।
हिंदी कविता ने इस नई परिस्थिति में समाज की बदलती संवेदनाओं और मानवीय संघर्षों को चित्रित किया।
2. भूमंडलीकरण और हिंदी कविता का अंतर्संबंध
हिंदी कविता ने हमेशा युगीन परिस्थितियों को आत्मसात किया है। जैसे भारतेंदु युग में राष्ट्रवाद, छायावाद में व्यक्तिवाद और स्वच्छंदता, प्रगतिवाद में सामाजिक यथार्थ और संघर्ष—वैसे ही समकालीन हिंदी कविता में भूमंडलीकरण एक प्रमुख विषय के रूप में उभरा है।
भूमंडलीकरण ने—
नई उपभोक्तावादी संस्कृति को जन्म दिया,
असमानताओं को गहरा किया,
स्थानीयता और परंपराओं को चुनौती दी,
तकनीकी और बाजार की ताकतों को केंद्र में ला खड़ा किया।
हिंदी कविता इन प्रभावों को रचनात्मक ढंग से सामने लाती है।
3. भूमंडलीकरण से उपजी संवेदनाएँ और हिंदी कविता
हिंदी कवियों ने भूमंडलीकरण की दोहरी प्रकृति को पकड़ा है
एक ओर अवसर, तकनीकी विकास, वैश्विक संवाद,
दूसरी ओर शोषण, बेरोजगारी, विस्थापन, सांस्कृतिक संकट।
नागार्जुन, धूमिल, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, अलोक धन्वा, अनामिका और ओमप्रकाश वाल्मीकि जैसे कवियों की रचनाओं में भूमंडलीकरण से उपजी विडंबनाएँ स्पष्ट देखी जा सकती हैं।
मंगलेश डबराल लिखते हैं कि—बाजार और पूँजी ने मानवीय संवेदनाओं को निगलना शुरू कर दिया है। धूमिल पहले ही कह गए थे कि “लोकतंत्र का सबसे बड़ा सच है—नौकरी।” भूमंडलीकरण ने इस सत्य को और कठोर रूप में सामने ला दिया।
4. भूमंडलीकरण और उपभोक्तावादी संस्कृति
भूमंडलीकरण ने मनुष्य को ‘ग्राहक’ और ‘उपभोक्ता’ के रूप में बदल दिया है। हिंदी कविता इस संस्कृति की आलोचना करती है।
कवियों ने दिखाया है कि विज्ञापन और ब्रांड ने जीवन की सरलता और आत्मीयता को ढक दिया है।
गाँव, किसान, मजदूर और श्रमिक वर्ग भूमंडलीकरण में हाशिए पर चला गया है।
‘मॉल कल्चर’ और ‘फास्ट फूड संस्कृति’ पर कवियों ने तीखा व्यंग्य किया है।
5. भूमंडलीकरण और विस्थापन की समस्या
भूमंडलीकरण ने रोजगार की खोज में लोगों को गाँव से शहर, छोटे कस्बों से महानगर और यहाँ तक कि देश से विदेश तक प्रवास के लिए विवश किया।
हिंदी कविताओं में—
प्रवासी पीड़ा,
घर-परिवार से दूरी,
भाषाई और सांस्कृतिक संकट
स्पष्ट झलकते हैं।
राजेश जोशी और मंगलेश डबराल की कविताएँ इस विस्थापन की वेदना को सजीव करती हैं।
6. महिला दृष्टि और भूमंडलीकरण
समकालीन हिंदी महिला कवयित्रियों ने भी भूमंडलीकरण को अपनी दृष्टि से देखा है।
अनामिका ने कविताओं में स्त्री की स्वायत्तता, अस्तित्व और भूमंडलीकरण के दबावों के बीच उसके संघर्ष को प्रस्तुत किया।
उन्होंने दिखाया कि बाजार स्त्री-शरीर को उपभोक्तावादी वस्तु में बदल रहा है।
स्त्री की अस्मिता, स्वतंत्रता और गरिमा इस परिप्रेक्ष्य में नया विमर्श बनकर उभरी है।
7. भूमंडलीकरण और भाषा का संकट
भूमंडलीकरण ने हिंदी भाषा और साहित्य को भी प्रभावित किया है।
अंग्रेज़ी और तकनीकी भाषाओं के दबाव में हिंदी की स्थिति चुनौतीपूर्ण हुई।
हिंदी कविता ने इस संकट को स्वर दिया।
कवि बार-बार कहते हैं कि भाषा सिर्फ संचार का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति और अस्मिता का आधार है।
8. भूमंडलीकरण और किसान-मजदूर
हिंदी कविता ने भूमंडलीकरण से प्रभावित किसानों और मजदूरों की त्रासदी को उभारा।
नई आर्थिक नीतियों ने किसानों को आत्महत्या तक के लिए मजबूर किया।
मजदूर वर्ग ठेकेदारी और असुरक्षित रोजगार में फँस गया।
कवियों ने इस पीड़ा को करुण और विद्रोही दोनों स्वरों में व्यक्त किया।
9. भूमंडलीकरण और प्रतिरोध का स्वर
भूमंडलीकरण पर हिंदी कविता केवल शोकगीत नहीं है, बल्कि प्रतिरोध की आवाज़ भी है।
कवियों ने अन्याय, शोषण और असमानता के खिलाफ स्वर उठाया।
उन्होंने मानवीय संवेदनाओं को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया।
कविताएँ बताती हैं कि मनुष्य को उपभोक्ता नहीं, बल्कि संवेदनशील प्राणी के रूप में बचाना होगा।
10. भूमंडलीकरण और हिंदी कविता का वैश्विक परिप्रेक्ष्य
भूमंडलीकरण ने हिंदी कविता को वैश्विक मंच भी दिया है।
इंटरनेट, ई-पत्रिकाएँ और सोशल मीडिया के कारण हिंदी कविता अब सीमित क्षेत्र तक बँधी नहीं रही।
प्रवासी हिंदी कवि भी इस संवाद में जुड़े।
इस प्रकार हिंदी कविता का क्षितिज विस्तृत हुआ।
11. भूमंडलीकरण से उपजी नई काव्य प्रवृत्तियाँ
हिंदी कविता में भूमंडलीकरण के कारण नई प्रवृत्तियाँ विकसित हुईं—
1. वैश्विक संवेदना और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे – जैसे युद्ध, पर्यावरण संकट।
2. तकनीकी और डिजिटल संस्कृति की आलोचना।
3. उपभोक्तावाद और बाजार के खिलाफ प्रतिरोध।
4. नारी अस्मिता और विस्थापन का विमर्श।
5. मानवता और संवेदनशीलता का पुनर्पाठ।
12. निष्कर्ष
भूमंडलीकरण और हिंदी कविता का संबंध जटिल और बहुआयामी है। एक ओर यह अवसर और विकास की संभावनाएँ लाता है, तो दूसरी ओर शोषण, असमानता और सांस्कृतिक संकट को भी जन्म देता है। हिंदी कविता ने इन दोनों पहलुओं को पकड़कर मानवीय चेतना को संवेदनशील और सजग बनाने का काम किया है।
आज की हिंदी कविता भूमंडलीकरण के दौर में केवल ‘साक्षी’ ही नहीं, बल्कि ‘प्रतिरोध की आवाज़’ भी है। यह हमें चेताती है कि मनुष्य को बाजार और उपभोक्ता वस्तु में न बदला जाए, बल्कि उसकी संवेदनाओं, संस्कृति और अस्मिता को बचाए रखा जाए। इस प्रकार हिंदी कविता भूमंडलीकरण के युग में मानवीय मूल्यों की संरक्षक और नई दिशाओं की प्रेरक बनकर सामने आती है।
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