हिंदी कविता में राष्ट्रीयता : 1850 से 1936 तक
प्रस्तावना
हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में राष्ट्रीय चेतना का विकास भारतीय इतिहास की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के साथ हुआ। 1850 से 1936 के बीच हिंदी कविता ने केवल मनोरंजन या भावाभिव्यक्ति का माध्यम बने रहने के स्थान पर जन-जागरण, स्वाधीनता-चेतना और राष्ट्रीय अस्मिता के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंग्रेजी शासन की दमनकारी नीतियों, आर्थिक शोषण और सांस्कृतिक प्रभाव के विरुद्ध कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से देशप्रेम, स्वाभिमान, एकता और स्वतंत्रता की भावना को स्वर दिया। भारतेन्दु हरिश्चंद्र से आरंभ हुई राष्ट्रीय चेतना द्विवेदी युग में अधिक स्पष्ट और उद्देश्यपूर्ण हुई तथा छायावादी कविता में यह सांस्कृतिक गौरव, स्वतंत्रता की आकांक्षा और मानवीय मुक्ति से जुड़ गई।
1. राष्ट्रीय चेतना का प्रारंभ
1850 के बाद हिंदी कविता में आधुनिक राष्ट्रीय चेतना का प्रारंभ भारतेन्दु हरिश्चंद्र के समय से माना जाता है। भारतेन्दु ने तत्कालीन भारत की राजनीतिक और आर्थिक स्थिति को अपनी कविता में अभिव्यक्ति दी। उनकी प्रसिद्ध पंक्ति—
“भारत दुर्दशा न देखी जाई।”
देश की तत्कालीन दयनीय स्थिति के प्रति कवि की गहरी चिंता को व्यक्त करती है। उनकी रचनाओं में देश की दुर्दशा के साथ-साथ उसके पुनरुत्थान की आकांक्षा भी दिखाई देती है।
2. स्वदेश-प्रेम की भावना
भारतेन्दु युगीन कविता में देश के प्रति प्रेम और गौरव की भावना प्रमुख रूप से दिखाई देती है। कवियों ने भारतीय जनता को अपने देश, भाषा, संस्कृति और परंपरा के प्रति जागरूक किया। राष्ट्रीयता यहाँ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित न रहकर स्वदेश-प्रेम का व्यापक रूप ग्रहण करती है।
3. आर्थिक शोषण के विरुद्ध स्वर
अंग्रेजी शासन की आर्थिक नीतियों के कारण भारत में गरीबी और आर्थिक संकट बढ़ रहा था। भारतेन्दु ने इस स्थिति को अपनी कविता और साहित्य में अभिव्यक्त किया। ‘भारत दुर्दशा’ में देश की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति के प्रति चिंता दिखाई देती है। इस प्रकार कविता राष्ट्रीय चेतना के साथ आर्थिक जागरण का माध्यम भी बनी।
4. हिंदी भाषा और राष्ट्रीयता
आधुनिक हिंदी कविता में भाषा के प्रश्न को भी राष्ट्रीय चेतना से जोड़ा गया। भारतेन्दु का प्रसिद्ध कथन—
“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।”
भाषा के माध्यम से राष्ट्रीय आत्मसम्मान की भावना को व्यक्त करता है। हिंदी को जन-जागरण और राष्ट्रीय एकता की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने में भारतेन्दु युग की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।
5. अतीत के गौरव का स्मरण
द्विवेदी युग में राष्ट्रीय चेतना को भारतीय इतिहास और संस्कृति के गौरव से जोड़ा गया। कवियों ने भारत के प्राचीन वैभव, वीरता और सांस्कृतिक परंपराओं का स्मरण कराकर भारतीयों में आत्मविश्वास उत्पन्न किया। अतीत का गौरव वर्तमान में राष्ट्रीय स्वाभिमान जगाने का माध्यम बना।
6. मैथिलीशरण गुप्त की राष्ट्रीय चेतना
मैथिलीशरण गुप्त की कविता में राष्ट्रीय भावना अत्यंत व्यापक रूप में व्यक्त हुई। उनकी प्रसिद्ध रचना ‘भारत-भारती’ राष्ट्रीय जागरण का महत्त्वपूर्ण काव्य है। इसमें भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य का चित्र प्रस्तुत किया गया है। उनकी पंक्ति—
“हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी।”
आत्मचिंतन और राष्ट्रीय जागरण की भावना को व्यक्त करती है।
7. राष्ट्र के लिए त्याग और बलिदान
द्विवेदी युगीन कविता में देश के लिए त्याग और बलिदान की भावना विशेष रूप से दिखाई देती है। कवियों ने युवाओं को देशहित में अपना जीवन समर्पित करने की प्रेरणा दी। राष्ट्रीयता व्यक्तिगत सुख से ऊपर उठकर राष्ट्र के लिए कर्तव्य और समर्पण का रूप ग्रहण करती है।
8. वीर रस और राष्ट्रीयता
राष्ट्रीय आंदोलन के समय वीर रस की कविताओं ने जनता में उत्साह और साहस का संचार किया। कवियों ने भारतीय वीरों, ऐतिहासिक चरित्रों और संघर्षों को काव्य का विषय बनाया। इससे जनता में पराधीनता के विरुद्ध संघर्ष की मानसिकता विकसित हुई।
9. माखनलाल चतुर्वेदी की राष्ट्रीय चेतना
माखनलाल चतुर्वेदी की कविता में देशप्रेम, त्याग और बलिदान की अत्यंत प्रभावशाली अभिव्यक्ति मिलती है। उनकी प्रसिद्ध कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ में फूल के माध्यम से राष्ट्र के लिए समर्पण की भावना व्यक्त हुई है—
“मुझे तोड़ लेना वनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जाएँ वीर अनेक।”
यह कविता राष्ट्रीय बलिदान की भावना का अत्यंत सुंदर उदाहरण है।
10. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की राष्ट्रीय भावना
बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की कविताओं में स्वतंत्रता की आकांक्षा, संघर्ष और क्रांतिकारी चेतना दिखाई देती है। उनकी कविता ने युवाओं में उत्साह और राष्ट्रीय स्वाभिमान जगाने का कार्य किया। उनकी रचनाओं में पराधीनता के प्रति असंतोष और स्वतंत्र जीवन की आकांक्षा स्पष्ट दिखाई देती है।
11. सुभद्रा कुमारी चौहान की राष्ट्रीय चेतना
सुभद्रा कुमारी चौहान ने राष्ट्रीय आंदोलन और वीरांगनाओं को अपनी कविता का विषय बनाया। उनकी प्रसिद्ध कविता ‘झाँसी की रानी’ में रानी लक्ष्मीबाई के साहस और वीरता का चित्रण है—
“खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।”
इस कविता ने भारतीय स्त्री-शक्ति और राष्ट्रीय स्वाभिमान दोनों को स्वर प्रदान किया।
12. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ और राष्ट्रीय चेतना
1936 के आसपास हिंदी कविता में राष्ट्रीय और संघर्षशील चेतना का स्वर अधिक प्रबल होने लगा। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की आरंभिक कविताओं में राष्ट्रीयता, संघर्ष और वीरता की भावना दिखाई देती है। उनकी कविता में पराधीनता के विरुद्ध प्रतिरोध और आत्मसम्मान का स्वर मिलता है। इस प्रकार वे आगे विकसित होने वाली राष्ट्रीय चेतना के महत्त्वपूर्ण कवि बने।
13. छायावादी कविता में राष्ट्रीय चेतना
छायावादी कविता को सामान्यतः प्रकृति, प्रेम और आत्मानुभूति की कविता माना जाता है, किंतु उसके भीतर राष्ट्रीय चेतना भी विद्यमान है। जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा की रचनाओं में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्वतंत्रता, सांस्कृतिक गौरव और मानव-मुक्ति की आकांक्षा दिखाई देती है।
जयशंकर प्रसाद की ‘हिमाद्रि तुंग श्रृंग से’ कविता में राष्ट्रीय जागरण और स्वतंत्रता का आह्वान मिलता है—
“हिमाद्रि तुंग श्रृंग से
प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला
स्वतंत्रता पुकारती।”
यह कविता भारतीय राष्ट्रीय चेतना का अत्यंत प्रभावशाली उदाहरण है।
14. सांस्कृतिक राष्ट्रीयता
1936 तक आते-आते हिंदी कविता में राष्ट्रीयता केवल अंग्रेजी शासन से मुक्ति की आकांक्षा तक सीमित नहीं रही। इसमें भारतीय संस्कृति, इतिहास, परंपरा, भाषा और मानवीय मूल्यों के संरक्षण की भावना भी शामिल हो गई। कवियों ने भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता को राष्ट्रीय जीवन की आधारभूमि के रूप में देखा।
15. राष्ट्रीय एकता और जन-जागरण
इस काल की कविता ने जाति, क्षेत्र और संकीर्ण सामाजिक विभाजनों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया। कवियों ने जनता को एक राष्ट्र के रूप में संगठित चेतना प्रदान करने का प्रयास किया। कविता सभाओं, आंदोलनों और जनजीवन तक पहुँचकर राष्ट्रीय जागरण का प्रभावी माध्यम बनी।
निष्कर्ष
1850 से 1936 तक की हिंदी कविता में राष्ट्रीयता का विकास क्रमिक रूप से हुआ। भारतेन्दु युग में देश की दुर्दशा और स्वदेश-प्रेम से प्रारंभ हुई राष्ट्रीय चेतना द्विवेदी युग में इतिहास-बोध, आत्मसम्मान, भाषा-प्रेम, त्याग और जन-जागरण का रूप ग्रहण करती है। मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ आदि कवियों ने इसे अधिक सक्रिय और संघर्षशील बनाया। छायावादी कवियों ने राष्ट्रीयता को सांस्कृतिक गौरव, स्वतंत्रता और मानवीय मुक्ति से जोड़ा। इस प्रकार 1850 से 1936 तक की हिंदी कविता भारतीय स्वतंत्रता चेतना के निर्माण और जनमानस में राष्ट्रीय स्वाभिमान जगाने की महत्त्वपूर्ण साहित्यिक शक्ति रही।
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