5955758281021487 Hindi sahitya : मैथिलीशरण गुप्त के ‘भारत-भारती’ के वर्तमान खंड

सोमवार, 21 सितंबर 2026

मैथिलीशरण गुप्त के ‘भारत-भारती’ के वर्तमान खंड



मैथिलीशरण गुप्त के ‘भारत-भारती’ के वर्तमान खंड में तत्कालीन भारतीय समाज की दुर्दशा का चित्रण किस प्रकार हुआ है? विस्तारपूर्वक विवेचना कीजिए।
प्रस्तावना

हिंदी साहित्य के द्विवेदी युग में मैथिलीशरण गुप्त का काव्य राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक जागरण और सांस्कृतिक पुनरुत्थान की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘भारत-भारती’ भारतीय समाज के अतीत, वर्तमान और भविष्य—तीनों का व्यापक चित्र प्रस्तुत करती है। यह कृति तीन खंडों—अतीत खंड, वर्तमान खंड और भविष्यत् खंड—में विभाजित है। 

‘भारत-भारती’ का प्रकाशन सामान्यतः 1912 ई. माना जाता है; उपलब्ध अध्ययन-सामग्री में इसके लेखन और संशोधन की प्रक्रिया के संबंध में 1912–14 का विवरण भी मिलता है। 

अतीत खंड में कवि ने भारत के गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक वैभव का स्मरण कराया है, जबकि वर्तमान खंड में उसी गौरवशाली भारत के पतन, सामाजिक विसंगतियों, आर्थिक विपन्नता, अज्ञान, धार्मिक पाखंड, सांस्कृतिक पतन और राष्ट्रीय निष्क्रियता का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है। भविष्यत् खंड में इसी स्थिति से उबरने के लिए जागरण और कर्म का संदेश मिलता है। 

मैथिलीशरण गुप्त : संक्षिप्त परिचय

मैथिलीशरण गुप्त आधुनिक हिंदी कविता के प्रमुख कवि और द्विवेदी युग की राष्ट्रीय चेतना के सशक्त प्रतिनिधि हैं। उनकी कविता में राष्ट्रप्रेम, भारतीय संस्कृति, सामाजिक सुधार, नैतिकता, कर्तव्य-बोध और जन-जागरण प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं। उनकी भाषा खड़ी बोली हिंदी है और उनकी रचनाओं ने हिंदी कविता को व्यापक सामाजिक एवं राष्ट्रीय सरोकारों से जोड़ा।

उनकी प्रमुख कृतियों में ‘भारत-भारती’, ‘साकेत’, ‘यशोधरा’, ‘पंचवटी’, ‘जयद्रथ-वध’, ‘द्वापर’ आदि उल्लेखनीय हैं। ‘भारत-भारती’ उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध राष्ट्रीय कृतियों में है और राष्ट्रीय जागरण में इसका विशेष योगदान माना जाता है। 

भारत-भारती’ के तीन खंड

1. अतीत खंड

इसमें भारत के प्राचीन गौरव, ज्ञान-विज्ञान, सभ्यता-संस्कृति, साहित्य, कला, वीरता, आदर्श पुरुषों तथा स्त्रियों आदि का वर्णन किया गया है। 

2. वर्तमान खंड

इसमें कवि ने तत्कालीन भारत की दीन-हीन और पतनशील अवस्था का चित्रण किया है। सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, शैक्षिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक जीवन की अनेक विकृतियों को सामने रखा गया है।

3. भविष्यत् खंड

इसमें कवि भारतीयों को जागने, शिक्षा ग्रहण करने, श्रम करने, एकता स्थापित करने और राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए प्रेरित करता है। 

इस प्रकार तीनों खंडों में क्रमशः “हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी” जैसी चिंतन-यात्रा दिखाई देती है। 


वर्तमान खंड की विषय-वस्तु : 30 प्रमुख बिंदु

1. वर्तमान खंड का प्रवेश : उत्कर्ष से अपकर्ष की ओर

वर्तमान खंड का आरंभ ही भारत के पतन की करुण अनुभूति से होता है—

> “जिस लेखनी ने है लिखा उत्कर्ष भारतवर्ष का,
लिखने चली वह हाल अब उसके अमित अपकर्ष का।”



यहाँ कवि की लेखनी स्वयं भारत के बदलते हुए स्वरूप की साक्षी बनती है। जो भारत कभी गौरव और समृद्धि का प्रतीक था, उसकी वर्तमान दुर्दशा कवि को व्यथित करती है। 

2. प्राचीन गौरव के चिह्नों का विनाश

कवि प्राचीन भारत के वैभव की तुलना वर्तमान के उजड़े हुए स्वरूप से करता है। मंदिरों के खंडहर, उजड़े भवन और वीरान स्मारक भारतीय सांस्कृतिक पतन के प्रतीक बन जाते हैं। अतीत का वैभव अब केवल अवशेषों में दिखाई देता है।

3. खंडहरों के माध्यम से राष्ट्रीय पतन

खंडहर केवल टूटे हुए भवन नहीं हैं, बल्कि वे राष्ट्र की विस्मृत स्मृति और पतित वर्तमान के प्रतीक हैं। कवि इनके माध्यम से यह प्रश्न उठाता है कि जिस देश ने कभी इतना वैभव अर्जित किया था, वह इस स्थिति तक कैसे पहुँचा?

4. दरिद्रता और आर्थिक विपन्नता

वर्तमान खंड में गरीबी का चित्र अत्यंत मार्मिक है। जनता के सामने जीवन-निर्वाह का संकट है। आर्थिक अभाव केवल व्यक्ति को प्रभावित नहीं करता, बल्कि सामाजिक और नैतिक जीवन को भी प्रभावित करता है।

5. निराशा और चिंता का वातावरण

चारों ओर चिंता, बेचैनी और निराशा दिखाई देती है। व्यक्ति भविष्य को लेकर आशंकित है और सामाजिक जीवन में उत्साह तथा आत्मविश्वास का अभाव दिखाई देता है।

6. अकाल और दुर्भिक्ष

कवि ने तत्कालीन भारत में दुर्भिक्ष और अकाल की समस्या को अत्यंत मार्मिक रूप में प्रस्तुत किया है। भोजन के अभाव में जनता की स्थिति दयनीय हो जाती है और जीवन की मूल आवश्यकताओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

7. भिक्षावृत्ति की विवशता

गरीबी इतनी बढ़ जाती है कि व्यक्ति को भिक्षा पर निर्भर होना पड़ता है। कवि के लिए यह स्थिति केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान के ह्रास का भी संकेत है।

8. भुखमरी’ की समस्या

भूख मनुष्य को अपने आदर्शों और नैतिक मूल्यों से समझौता करने के लिए विवश कर देती है। पेट की समस्या इतनी गंभीर हो जाती है कि व्यक्ति अपनी इच्छाओं और मूल्यों के विरुद्ध कार्य करने लगता है।

9. कृषि और कृषक की दयनीय दशा

कवि ने कृषि और कृषक दोनों की दुर्दशा का चित्रण किया है। भारतीय अर्थव्यवस्था के आधार किसान स्वयं अभावग्रस्त है। उसकी मेहनत के अनुपात में उसे जीवन की सुविधाएँ नहीं मिलतीं।

10. कृषक की अशिक्षा

किसान आर्थिक कठिनाइयों के साथ-साथ शिक्षा से भी वंचित है। अशिक्षा उसके शोषण और पिछड़ेपन को और अधिक बढ़ाती है।

11. गोवंश की दुर्दशा

वर्तमान खंड में गो-वध और गोवंश की स्थिति को भी सामाजिक पतन से जोड़कर देखा गया है। कवि के लिए गाय केवल पशु नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक जीवन से जुड़ी हुई श्रद्धा और परंपरा का प्रतीक है।

12. महामारी और रोग

समाज में महामारी और बीमारियों का प्रसार भी तत्कालीन दुर्दशा का एक कारण है। चिकित्सा-सुविधाओं और सामाजिक जागरूकता की कमी के कारण जनता अनेक प्रकार के रोगों से पीड़ित होती है।

13. व्यापार में पराधीनता

व्यापार के क्षेत्र में विदेशी वस्तुओं के बढ़ते प्रभाव को कवि राष्ट्रीय आर्थिक दुर्बलता के रूप में देखता है। विदेशी वस्तुओं के प्रति आकर्षण स्वदेशी उत्पादन को कमजोर करता है।

14. विदेशी वस्तुओं का अनुकरण

कवि के अनुसार भारतीयों ने विदेशी वस्तुओं के साथ-साथ विदेशी रहन-सहन, वेशभूषा और भाषा का भी अनुकरण आरंभ कर दिया है—

 “गुण मात्रा छोड़कर विदेशियों के हम उन्हीं के ढंग में सन गए।”



इसमें अंधानुकरण की प्रवृत्ति पर तीखा व्यंग्य है।

15. विदेशी सभ्यता की अंधी नकल

कवि आधुनिकता का विरोध नहीं करता, बल्कि अंधानुकरण की प्रवृत्ति पर प्रश्न उठाता है। अपनी मौलिकता छोड़कर दूसरे समाज की नकल करना सांस्कृतिक आत्मविश्वास की कमी को दर्शाता है।

16. रईस वर्ग की भोग-विलासिता

समाज का संपन्न वर्ग भी राष्ट्र और समाज के प्रति अपने दायित्वों को भूलकर भोग-विलास में डूबा हुआ दिखाई देता है। कवि उनके जीवन में सामाजिक उत्तरदायित्व के अभाव को रेखांकित करता है।

17. कर्तव्य-विमुखता

रईस वर्ग के लिए जीवन का उद्देश्य केवल सुख प्राप्त करना रह गया है। देश और समाज की समस्याओं से उसका संबंध कमजोर हो गया है।

18. नौकरी के प्रति विकृत दृष्टिकोण

कवि समाज में ऐसी मानसिकता देखता है जिसमें शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान और चरित्र निर्माण न होकर केवल नौकरी प्राप्त करना बन गया है। शिक्षा को जीवन-मूल्य के बजाय रोजगार का साधन समझने की प्रवृत्ति पर व्यंग्य किया गया है।

19. शिक्षा-व्यवस्था का पतन

वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था विद्यार्थियों में ज्ञान, चरित्र और राष्ट्रीय चेतना पैदा करने के बजाय कई बार उन्हें झूठ, मक्कारी और स्वार्थ की ओर ले जाती दिखाई देती है।

इस प्रकार कवि शिक्षा को केवल अक्षर-ज्ञान न मानकर चरित्र-निर्माण से जोड़ता है।

20. अविद्या का विस्तार

अशिक्षा के कारण व्यक्ति सामाजिक समस्याओं को समझ नहीं पाता। कवि के लिए अविद्या राष्ट्रीय पतन का प्रमुख कारण है।

भविष्यत् खंड में भी वह स्पष्ट करता है कि शिक्षा के बिना कल्याण की आशा व्यर्थ है। 

21. साहित्य का पतन

कवि साहित्य की स्थिति से भी चिंतित है। साहित्य में आदर्श, नैतिकता और सामाजिक उपयोगिता के स्थान पर स्वार्थ तथा निम्न रुचियों का प्रभाव बढ़ता दिखाई देता है।

22. कविता और उपन्यास में अश्लीलता

वर्तमान साहित्य में कामुकता और अश्लीलता की बढ़ती प्रवृत्ति पर कवि व्यंग्य करता है। साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन न होकर समाज के संस्कार और चेतना को विकसित करना होना चाहिए—यह दृष्टि यहाँ स्पष्ट होती है।

23. साहित्य में स्वार्थ और दुर्गंध

कवि को साहित्य के भीतर भी स्वार्थ और नैतिक पतन दिखाई देता है। इसलिए वह साहित्यकार के सामाजिक उत्तरदायित्व की ओर संकेत करता है।

24. संगीत में अश्लीलता

संगीत भी सामाजिक पतन से अछूता नहीं रहा। संगीत में भक्ति और शुद्ध भावनाओं के स्थान पर अश्लीलता और निम्न रुचियों का प्रवेश कवि को चिंतित करता है।

25. भक्ति में विकृति

कवि के अनुसार भक्ति भी अपने मूल स्वरूप से हटकर बाहरी प्रदर्शन और स्वार्थ से प्रभावित हो रही है। यहाँ धार्मिक भावनाओं के बाजारीकरण और विकृतिकरण पर व्यंग्य दिखाई देता है।

26. धर्म के क्षेत्र में पाखंड

धर्म के नाम पर अनेक प्रकार के आडंबर और पाखंड विकसित हो गए हैं। तीर्थ, मंदिर, पांडे, महंत, साधु-संत आदि धार्मिक संस्थाओं में व्याप्त विकृतियों की ओर कवि संकेत करता है।

27. जातिगत और सामाजिक विभाजन

वर्तमान समाज में जातिगत विभाजन और ऊँच-नीच की भावना भी सामाजिक कमजोरी का कारण है। शूद्रों की स्थिति का वर्णन करते हुए कवि सामाजिक असमानता की गंभीर समस्या को सामने लाता है। हिन्दवी में वर्तमान खंड के ‘शूद्र’ शीर्षक के अंतर्गत भी इस दयनीय स्थिति का स्पष्ट चित्र मिलता है। 

28. सभाओं और संस्थाओं में मतभेद

कवि सामाजिक संस्थाओं और सभाओं में बढ़ते मतभेद तथा गुटबाजी पर भी व्यंग्य करता है। हिन्दवी पर उपलब्ध पाठ में सभाओं के संबंध में कवि ने मतभिन्नता के शत्रुता में बदल जाने और चंदे तथा व्यक्तिगत लाभ की प्रवृत्ति की आलोचना की है। 

अर्थात् संगठन समाज को जोड़ने के बजाय यदि स्वार्थ और विवाद के केंद्र बन जाएँ, तो उनका उद्देश्य निष्फल हो जाता है।

29. राष्ट्रीय चरित्र का पतन

वर्तमान खंड की सबसे व्यापक चिंता राष्ट्रीय चरित्र का पतन है। स्वार्थ, आलस्य, पराधीन मानसिकता, अंधानुकरण, भोग-विलास, अशिक्षा और आपसी विभाजन मिलकर राष्ट्रीय शक्ति को कमजोर कर रहे हैं।

30. पराधीनता और राष्ट्रीय चेतना का अभाव

इन सभी समस्याओं के पीछे कवि को एक बड़ी समस्या दिखाई देती है—राष्ट्रीय चेतना का अभाव। व्यक्ति अपने व्यक्तिगत सुख-दुःख में सीमित हो गया है और राष्ट्र के प्रति उसके कर्तव्य-बोध में कमी आई है।

इसीलिए वर्तमान खंड केवल भारत की दुर्दशा का चित्र नहीं है, बल्कि आत्मालोचन के माध्यम से राष्ट्रीय जागरण का प्रयास है।

वर्तमान खंड की विशेषता

‘भारत-भारती’ के वर्तमान खंड की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि गुप्त जी केवल बाहरी शासन को भारत की दुर्दशा का कारण मानकर नहीं रुकते। वे भारतीय समाज की आंतरिक कमजोरियों को भी सामने रखते हैं। इसलिए उनका राष्ट्रवाद आत्मालोचन से जुड़ा हुआ है।

वे पूछते हैं कि यदि समाज स्वयं अशिक्षा, अंधविश्वास, स्वार्थ, जातिभेद, भोग-विलास, अंधानुकरण और कर्तव्यहीनता में फँसा रहेगा तो केवल राजनीतिक परिवर्तन से राष्ट्र का वास्तविक उत्थान कैसे संभव होगा?

इस दृष्टि से वर्तमान खंड सामाजिक आत्मपरीक्षण का काव्य बन जाता है।

वर्तमान खंड में व्यंग्य का स्वर

गुप्त जी ने गंभीर सामाजिक समस्याओं को केवल उपदेशात्मक ढंग से नहीं रखा, बल्कि अनेक स्थानों पर व्यंग्य और विडंबना का सहारा लिया है। वे रईसों, धर्म के ठेकेदारों, शिक्षा-व्यवस्था, साहित्यकारों, संगीतकारों, सामाजिक संस्थाओं और अंधानुकरण करने वाले वर्ग पर तीखी दृष्टि डालते हैं।

इसलिए वर्तमान खंड में करुणा के साथ-साथ व्यंग्य, आक्रोश, आत्मालोचन और सुधार की आकांक्षा एक साथ दिखाई देती है।

वर्तमान खंड का मूल उद्देश्य

वर्तमान खंड का उद्देश्य केवल तत्कालीन भारत की बुराइयों की सूची प्रस्तुत करना नहीं है। इसका गहरा उद्देश्य भारतीयों को उनकी वास्तविक स्थिति का बोध कराना है।

कवि पहले अतीत के गौरव का स्मरण कराता है, फिर वर्तमान की दुर्दशा सामने रखता है और अंततः भविष्य के निर्माण की प्रेरणा देता है। इस प्रकार पूरी रचना की संरचना ही जागरण की प्रक्रिया बन जाती है।

निष्कर्ष

अंततः कहा जा सकता है कि ‘भारत-भारती’ का वर्तमान खंड मैथिलीशरण गुप्त की राष्ट्रीय और सामाजिक चेतना का अत्यंत प्रभावशाली दस्तावेज है। इसमें कवि ने भारत की आर्थिक दरिद्रता, अकाल, कृषक की दुर्दशा, अशिक्षा, रईसों की विलासिता, विदेशी वस्तुओं के प्रति आकर्षण, अंधानुकरण, साहित्य और संगीत में आई विकृतियों, धार्मिक पाखंड, जातिगत भेदभाव, सामाजिक मतभेद और राष्ट्रीय चरित्र के पतन को व्यापक रूप में चित्रित किया है।

वर्तमान खंड की विशेषता यह है कि कवि दोषारोपण के साथ आत्मालोचन भी करता है। वह भारतीय समाज को उसकी कमजोरियों का दर्पण दिखाता है ताकि उसमें आत्मबोध और परिवर्तन की इच्छा उत्पन्न हो। इसीलिए ‘वर्तमान खंड’ केवल पतन का आख्यान नहीं, बल्कि जागरण की भूमिका भी है। अतीत का गौरव, वर्तमान की पीड़ा और भविष्य की आकांक्षा—इन तीनों को जोड़कर गुप्त जी ने भारतीय राष्ट्रीय चेतना को एक व्यापक काव्यात्मक स्वर प्रदान किया है। 

परीक्षा में याद रखने योग्य सूत्र:
**अतीत = गौरव → वर्तमान = आत्मालोचन और पतन → भविष्य = जागरण, कर्म और पुनर्निर्माण।**

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