5955758281021487 Hindi sahitya : हरिशंकर परसाई के निबंध ‘पगडंडियों का जमाना’

मंगलवार, 22 सितंबर 2026

हरिशंकर परसाई के निबंध ‘पगडंडियों का जमाना’



हरिशंकर परसाई के निबंध ‘पगडंडियों का जमाना’ की विषय-वस्तु, प्रयोजन, वैचारिकता, भाषा-शैली एवं शिल्प-सौंदर्य की समीक्षा कीजिए।

प्रस्तावना

हिंदी साहित्य में व्यंग्य को स्वतंत्र और प्रभावशाली साहित्यिक विधा के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले प्रमुख रचनाकारों में हरिशंकर परसाई का नाम अग्रगण्य है। उन्होंने अपने व्यंग्य के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों, भ्रष्टाचार, बेईमानी, पाखंड, स्वार्थ और नैतिक मूल्यों के पतन को अत्यंत तीखे किंतु हास्यपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया। उनका व्यंग्य केवल हँसाता नहीं, बल्कि पाठक को अपने आसपास के सामाजिक यथार्थ पर विचार करने के लिए विवश करता है।

‘पगडंडियों का जमाना’ परसाई का महत्त्वपूर्ण व्यंग्यात्मक निबंध है। इसमें उन्होंने शिक्षा-व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार, रिश्वत, सिफारिश, परीक्षा में अनुचित साधनों के प्रयोग तथा ईमानदारी के लगातार कमजोर होते जाने पर तीखा प्रहार किया है। ‘पगडंडी’ यहाँ प्रतीक है उस छोटे, आसान और अनैतिक रास्ते का, जिसे लोग मेहनत और ईमानदारी की सीधी सड़क छोड़कर सफलता प्राप्त करने के लिए अपनाते हैं।



1. लेखक का साहित्यिक परिचय

हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त 1924 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के जमानी गाँव में हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा मध्य प्रदेश में हुई। उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की और कुछ समय अध्यापन कार्य किया। अध्यापन के दौरान बार-बार स्थानांतरण और परिस्थितियों से परेशान होकर उन्होंने 1957 में नौकरी छोड़कर स्वतंत्र लेखन को अपना जीवन-लक्ष्य बनाया।

उन्होंने जबलपुर से ‘वसुधा’ नामक साहित्यिक पत्रिका का संपादन-प्रकाशन किया। आर्थिक कठिनाइयों के कारण यह पत्रिका अधिक समय तक नहीं चल सकी। इसके बाद उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन किया।

उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘हँसते हैं रोते हैं’, ‘जैसे उनके दिन फिरे’, ‘रानी नागफनी की कहानी’, ‘तट की खोज’, ‘तब की बात और थी’, ‘भूत के पाँव पीछे’, ‘बेईमानी की परत’, ‘पगडंडियों का जमाना’, ‘सदाचार का ताबीज’, ‘शिकायत मुझे भी है’, ‘वैष्णव की फिसलन’, ‘तिरछी रेखाएँ’, ‘टूटा हुआ गणतंत्र’ और ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ आदि प्रमुख हैं।

उनकी समस्त रचनाएँ ‘परसाई रचनावली’ के छह भागों में प्रकाशित हुई हैं। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक सम्मान प्राप्त हुए। उनका निधन 10 अगस्त 1995 को हुआ।


2. ‘पगडंडियों का जमाना’ की विषय-वस्तु

इस निबंध का मूल विषय ईमानदारी और बेईमानी के बीच संघर्ष है। परसाई बताते हैं कि समाज में मेहनत, योग्यता और ईमानदारी से सफलता प्राप्त करने की सीधी सड़क धीरे-धीरे सुनसान होती जा रही है, जबकि रिश्वत, सिफारिश, धोखाधड़ी और अनुचित साधनों की पगडंडियाँ चौड़ी और सुगम होती जा रही हैं।

लेखक स्वयं ईमानदार बनने का संकल्प करता है, लेकिन शीघ्र ही उसे ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है जहाँ लोग उससे परीक्षा में अंक बढ़वाने, प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने और अनुचित सहायता करने की अपेक्षा करते हैं।

लेखक शिक्षा-जगत के माध्यम से पूरे समाज की मानसिकता को सामने लाता है। माता-पिता अपने बच्चों को पास कराने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार हैं। कोई नौकरी की चिंता में है, कोई आर्थिक संकट से परेशान है और कोई बेटी के विवाह के लिए परीक्षा में सफलता को आवश्यक समझता है। इस प्रकार लेखक भ्रष्टाचार के पीछे छिपी सामाजिक विवशताओं को भी पहचानता है।


3. निबंध का केंद्रीय प्रतिपाद्य

निबंध का केंद्रीय विचार यह है कि समाज में सफलता का सीधा और नैतिक मार्ग कठिन होता जा रहा है तथा लोग छोटे, आसान और अनैतिक रास्तों को सफलता का साधन मानने लगे हैं।

‘पगडंडी’ इसी मानसिकता का प्रतीक है।

- ईमानदारी = सीधी, लंबी सड़क
- रिश्वत और सिफारिश = पगडंडी
- सफलता = महल
- बेईमानी = बदबू
- सुगंधित रूमाल = बेईमानी की बदबू से बचने का दिखावा

इस प्रतीकात्मक योजना के माध्यम से परसाई ने पूरे सामाजिक चरित्र को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।


4. निबंध का प्रयोजन

परसाई का उद्देश्य केवल शिक्षा-व्यवस्था की कमियों को दिखाना नहीं है। उनका व्यापक उद्देश्य सामाजिक और नैतिक चेतना उत्पन्न करना है।

वे दिखाना चाहते हैं कि—

1. भ्रष्टाचार केवल कार्यालयों में नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता में प्रवेश कर चुका है।
2. सिफारिश और रिश्वत को लोग सामान्य सामाजिक व्यवहार मानने लगे हैं।
3. माता-पिता भी बच्चों की सफलता के लिए अनुचित रास्ते अपनाने लगे हैं।
4. ईमानदार व्यक्ति को समाज में कई बार मूर्ख या असफल समझा जाता है।
5. मेहनत और योग्यता के स्थान पर संबंध तथा धन प्रभावशाली बनते जा रहे हैं।
6. समाज की नैतिक संवेदना धीरे-धीरे कमजोर हो रही है।

इस प्रकार निबंध का प्रयोजन व्यंग्य के माध्यम से सामाजिक आत्मालोचन करना है।



5. वैचारिकता

इस निबंध में परसाई की विचारशीलता अत्यंत प्रखर है। वे किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहराने के बजाय उस सामाजिक व्यवस्था और मानसिकता पर प्रश्न उठाते हैं जिसने भ्रष्टाचार को सामान्य बना दिया है।

लेखक यह प्रश्न उठाता है कि यदि ईमानदारी से काम करने वाले व्यक्ति को ही कठिनाइयों का सामना करना पड़े और बेईमानी करने वाले व्यक्ति को सुविधा तथा सम्मान मिले, तो समाज की नैतिक व्यवस्था किस दिशा में जाएगी?

निबंध की वैचारिकता का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि परसाई व्यक्ति और व्यवस्था दोनों को एक साथ देखते हैं।


6. बुद्धि-तत्व

परसाई के व्यंग्य में बुद्धि-तत्व अत्यंत प्रभावशाली है। वे सामान्य घटनाओं से असामान्य निष्कर्ष निकालते हैं और पाठक को सोचने के लिए विवश करते हैं।

विशेष रूप से ‘आत्मा फोल्डिंग कुर्सी के समान होनी चाहिए’ जैसी कल्पना के माध्यम से वे मनुष्य की सुविधानुसार बदलती नैतिकता पर व्यंग्य करते हैं।

इसी प्रकार वे कहते हैं कि आज के समय में मनुष्य अपनी आत्मा को कभी कुत्ते या सूअर में रख देता है और कभी पशु अपनी आत्मा मनुष्य में रख देते हैं। यह कथन हास्य उत्पन्न करने के साथ-साथ मनुष्य के नैतिक पतन की ओर संकेत करता है।

इस प्रकार निबंध में तर्क, व्यंग्य, विरोधाभास और निष्कर्ष निकालने की क्षमता बुद्धि-तत्व को सशक्त बनाती है।


7. अनुभूति-तत्व

परसाई का व्यंग्य केवल बौद्धिक नहीं है; उसमें गहरी मानवीय अनुभूति भी है।

परीक्षा में पास होने के लिए रिश्वत और सिफारिश करवाने वाले माता-पिता के पीछे लेखक उनकी विवशता को भी देखता है। कोई अपने बेटे की नौकरी के लिए चिंतित है, कोई परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारना चाहता है और कोई बेटी की शादी की चिंता से परेशान है।

इसलिए लेखक इन लोगों पर केवल हँसता नहीं, बल्कि उनके दुख को समझता है। वह स्वीकार करता है कि ये लोग भी सामाजिक परिस्थितियों से घिरे हुए हैं।

यहीं परसाई का व्यंग्य करुणा और संवेदना से जुड़ जाता है।



8. कल्पना-तत्व

परसाई की कल्पना अत्यंत मौलिक और व्यंग्यात्मक है। वे अमूर्त सामाजिक समस्याओं को मूर्त प्रतीकों में बदल देते हैं।

निबंध में—

ईमानदारी की सड़क, बेईमानी की पगडंडियाँ, सफलता का महल, बदबू, सुगंधित रूमाल और बंद दरवाजा

जैसे बिंब अत्यंत प्रभावशाली हैं।

विशेष रूप से सफलता के महल का मुख्य दरवाजा बंद होना और लोगों का नापदान जैसे रास्ते से अंदर प्रवेश करना समाज में प्रचलित अनैतिक रास्तों का अत्यंत सार्थक प्रतीक है।


9. अहं/व्यक्तित्व-तत्व

निबंध में परसाई का व्यक्तित्व सीधे उपस्थित दिखाई देता है। वे स्वयं को भी व्यंग्य का पात्र बनाते हैं। ईमानदार बनने का उनका प्रयास और फिर सामाजिक परिस्थितियों से उनका संघर्ष लेखक के आत्मानुभव को सामने लाता है।

वे अपने ऊपर भी व्यंग्य करने से पीछे नहीं हटते। यही आत्मव्यंग्य उनकी रचना को अधिक विश्वसनीय बनाता है।

उनके व्यक्तित्व में—

- निर्भीकता,
- सामाजिक सजगता,
- नैतिक चेतना,
- आत्मालोचन,
- व्यंग्य-दृष्टि और
- मानवीय संवेदना

का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।


10. भाषा

परसाई की भाषा उनकी सबसे बड़ी शक्तियों में से एक है। ‘पगडंडियों का जमाना’ की भाषा सरल, सहज, बोलचाल की और व्यावहारिक खड़ी बोली है।

उनकी भाषा में आवश्यकता के अनुसार—

- तत्सम शब्द,
- तद्भव शब्द,
- देशज शब्द,
- अंग्रेजी शब्द,
- उर्दू-फारसी शब्द

का स्वाभाविक प्रयोग मिलता है।

भाषा कहीं भी कृत्रिम या बोझिल नहीं लगती। बोलचाल की भाषा के कारण पाठक को ऐसा अनुभव होता है जैसे लेखक उसके सामने बैठकर बातचीत कर रहा हो।

11. शैली

इस निबंध की प्रमुख शैली व्यंग्यात्मक शैली है। इसके साथ हास्य, संवादात्मकता, कथात्मकता और आत्मव्यंग्य का सुंदर समन्वय है।

व्यंग्यात्मक शैली

लेखक भ्रष्टाचार और सामाजिक विसंगतियों पर तीखा प्रहार करता है।

हास्यात्मक शैली

गंभीर विषय को भी लेखक ऐसे ढंग से प्रस्तुत करता है कि पाठक हँसते-हँसते सामाजिक सच्चाई को पहचान लेता है।

संवादात्मक शैली

लेखक और उसके पास आने वाले लोगों की बातचीत से निबंध में जीवंतता आती है।

आत्मव्यंग्य

लेखक स्वयं को भी व्यंग्य के घेरे में रखता है। इससे रचना में ईमानदारी और विश्वसनीयता आती है।


12. मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग

परसाई की भाषा में मुहावरों और लोक-प्रचलित अभिव्यक्तियों का सटीक प्रयोग मिलता है। वे सामान्य बोलचाल की भाषा को साहित्यिक प्रभाव प्रदान करते हैं।

उनके मुहावरेदार प्रयोगों से—

- कथन में तीखापन आता है,
- हास्य उत्पन्न होता है,
- व्यंग्य प्रभावशाली बनता है,
- भाषा में सहजता आती है।

परसाई मुहावरों को केवल सजावट के लिए नहीं, बल्कि व्यंग्य के प्रभाव को बढ़ाने के लिए प्रयोग करते हैं।


13. शिल्प-सौंदर्य

‘पगडंडियों का जमाना’ का शिल्प अत्यंत प्रभावशाली है। परसाई ने छोटे-छोटे प्रसंगों, संवादों, आत्मकथात्मक स्थितियों और प्रतीकों को जोड़कर निबंध का निर्माण किया है।

इसकी प्रमुख शिल्पगत विशेषताएँ हैं—

1. प्रतीकात्मकता — सड़क और पगडंडी का प्रतीक।
2. व्यंग्यात्मकता — भ्रष्ट व्यवस्था पर तीखा प्रहार।
3. विरोधाभास — ईमानदार व्यक्ति असफल और बेईमान व्यक्ति सफल दिखाई देता है।
4. अतिशयोक्ति — हास्य और व्यंग्य की तीव्रता बढ़ाने के लिए।
5. संवाद योजना — पात्रों की बातचीत से कथ्य में जीवंतता।
6. आत्मकथात्मकता — लेखक स्वयं घटनाओं का हिस्सा बनता है।
7. प्रतीकात्मक बिंब — सफलता का महल, बंद दरवाजा और बदबूदार रास्ते।
8. चुटीले वाक्य-विन्यास — गंभीर बात को रोचक बनाते हैं।


14. शीर्षक की सार्थकता

‘पगडंडियों का जमाना’ शीर्षक अत्यंत सार्थक और व्यंग्यपूर्ण है।

पगडंडी सामान्यतः मुख्य सड़क से हटकर बना छोटा और आसान रास्ता होती है। परसाई ने इसे रिश्वत, सिफारिश, भ्रष्टाचार और अनुचित साधनों का प्रतीक बनाया है।

समाज में लोग मेहनत और ईमानदारी की लंबी सड़क छोड़कर सफलता की छोटी पगडंडियों को अपनाने लगे हैं। इसलिए शीर्षक पूरे निबंध की मूल भावना को अपने भीतर समेटे हुए है।


15. निबंध की समकालीन प्रासंगिकता

निबंध की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सामाजिक प्रासंगिकता है। परीक्षा, नौकरी, सिफारिश, संबंधों का दुरुपयोग और अनुचित लाभ की मानसिकता जैसे प्रश्न आज भी सामाजिक विमर्श का हिस्सा हैं।

इसलिए परसाई का व्यंग्य केवल अपने समय का दस्तावेज नहीं रह जाता, बल्कि वह समाज की नैतिक चेतना का आईना बन जाता है।



निष्कर्ष

‘पगडंडियों का जमाना’ हरिशंकर परसाई की व्यंग्य-दृष्टि, सामाजिक चेतना और मानवीय संवेदना का प्रभावशाली उदाहरण है। उन्होंने शिक्षा-व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार के माध्यम से पूरे समाज की नैतिक स्थिति को उजागर किया है। मेहनत और ईमानदारी की सीधी सड़क तथा रिश्वत और सिफारिश की पगडंडियों का प्रतीक निबंध को विशेष कलात्मक ऊँचाई प्रदान करता है।

परसाई की विशेषता यह है कि वे हँसाते हुए चोट करते हैं और चोट करते हुए सोचने के लिए विवश करते हैं। बुद्धि की तीक्ष्णता, अनुभूति की गहराई, कल्पना की मौलिकता, व्यक्तित्व की निर्भीकता, बोलचाल की सहज भाषा तथा व्यंग्यात्मक शिल्प के कारण ‘पगडंडियों का जमाना’ हिंदी के श्रेष्ठ व्यंग्यात्मक निबंधों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।

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