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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

रंगमंच का उद्भव और विकास : हिंदी रंगमंच

रंगमंच का उद्भव और विकास : हिंदी रंगमंच 

प्रस्तावना

रंगमंच मानव सभ्यता की अत्यंत प्राचीन और सशक्त कलाओं में से एक है। यह केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक अभिव्यक्ति का प्रभावशाली उपकरण है। भारत में रंगमंच की परंपरा अत्यंत प्राचीन है, जिसकी जड़ें वैदिक युग तक जाती हैं। हिंदी रंगमंच का विकास इसी दीर्घ परंपरा का परिणाम है, जिसने समय-समय पर बदलते समाज और परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को रूपांतरित किया।
1. रंगमंच का उद्भव : प्राचीन भारतीय परंपरा
भारतीय रंगमंच की आधारशिला संस्कृत नाट्य परंपरा में निहित है। भरतमुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र को भारतीय रंगमंच का प्रथम और सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। इसमें नाटक की उत्पत्ति, अभिनय, रंगमंच की संरचना, रस-सिद्धांत और संगीत आदि का विस्तृत वर्णन है।
भरतमुनि के अनुसार नाट्यकला देवताओं की प्रेरणा से उत्पन्न हुई और इसका उद्देश्य लोकमंगल था। “नाट्य वेद” को पाँचवाँ वेद कहा गया, क्योंकि यह समाज के सभी वर्गों के लिए सुलभ था।
2. संस्कृत रंगमंच
संस्कृत काल में रंगमंच अत्यंत विकसित था। राजदरबारों और मंदिरों में नाटकों का मंचन होता था।
कालिदास के नाटक जैसे अभिज्ञानशाकुंतलम् रंगमंचीय सौंदर्य के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
भास और शूद्रक के नाटकों में सामाजिक और ऐतिहासिक तत्व मिलते हैं।
इस काल का रंगमंच संगीत, नृत्य और अभिनय का समन्वित रूप था।
3. मध्यकालीन रंगमंच और लोकनाट्य
मध्यकाल में संस्कृत रंगमंच का ह्रास हुआ, किंतु लोकनाट्य परंपराएँ जीवित रहीं।
रामलीला और रासलीला जैसी लोक परंपराएँ लोकप्रिय रहीं।
नौटंकी, तमाशा, यक्षगान आदि क्षेत्रीय रूपों ने रंगमंच को जनसाधारण से जोड़े रखा।
भक्ति आंदोलन के प्रभाव से धार्मिक कथाओं का मंचन अधिक हुआ।
4. आधुनिक रंगमंच का आरंभ
उन्नीसवीं शताब्दी में अंग्रेजी शासन के प्रभाव से आधुनिक रंगमंच का विकास हुआ। पाश्चात्य रंगमंच की तकनीक और संरचना ने भारतीय रंगमंच को नया स्वरूप दिया।
पारसी रंगमंच
पारसी थिएटर कंपनियों ने हिंदी-उर्दू मिश्रित भाषा में नाटकों का मंचन किया। इन नाटकों में गीत-संगीत और भव्य साज-सज्जा होती थी। इससे हिंदी रंगमंच को लोकप्रियता मिली।
5. हिंदी रंगमंच का उद्भव
हिंदी रंगमंच का वास्तविक विकास उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ।
भारतेंदु युग
भारतेंदु हरिश्चंद्र को हिंदी रंगमंच का जनक माना जाता है। उनके नाटक अंधेर नगरी और भारत दुर्दशा सामाजिक और राजनीतिक चेतना से ओत-प्रोत थे।
भारतेंदु ने रंगमंच को राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक सुधार का माध्यम बनाया।
6. द्विवेदी और प्रसाद युग
जयशंकर प्रसाद
जयशंकर प्रसाद ने हिंदी नाटक को साहित्यिक गरिमा प्रदान की। उनके नाटक स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त और ध्रुवस्वामिनी ऐतिहासिक चेतना और राष्ट्रीय गौरव से युक्त हैं।
प्रसाद ने नाटक को केवल मंचीय प्रदर्शन नहीं, बल्कि साहित्यिक विधा के रूप में प्रतिष्ठित किया।
7. स्वतंत्रता-पूर्व और स्वतंत्रता-उत्तर रंगमंच
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान रंगमंच राष्ट्रीय भावना का वाहक बना।
प्रगतिशील आंदोलन
1940 के दशक में इप्टा (IPTA) की स्थापना ने जनवादी रंगमंच को नई दिशा दी।
मोहन राकेश और नया रंगमंच
मोहन राकेश के नाटक आषाढ़ का एक दिन और आधे-अधूरे ने हिंदी रंगमंच को आधुनिक संवेदना दी। उन्होंने व्यक्ति के अस्तित्व-संकट और पारिवारिक विघटन को चित्रित किया।
अन्य प्रमुख नाटककार
धर्मवीर भारती का अंधायुग युद्ध और नैतिक संकट का प्रतीक है।
विजय तेंदुलकर और गिरीश कर्नाड ने भारतीय रंगमंच को अखिल भारतीय स्वर दिया।
8. समकालीन हिंदी रंगमंच
आज का हिंदी रंगमंच सामाजिक यथार्थ, राजनीतिक प्रश्नों और प्रयोगधर्मिता से युक्त है।
स्त्री-विमर्श, दलित चेतना और पर्यावरण जैसे विषय मंच पर आ रहे हैं।
लघु रंगमंच और नुक्कड़ नाटक लोकप्रिय हुए हैं।
हबीब तनवीर
हबीब तनवीर ने लोक कलाकारों के साथ मिलकर आधुनिक रंगमंच को नया रूप दिया।
9. हिंदी रंगमंच की विशेषताएँ
सामाजिक सरोकार
राष्ट्रीय चेतना
लोक और शास्त्र का समन्वय
प्रयोगधर्मिता
यथार्थवाद
10. वर्तमान चुनौतियाँ
सिनेमा और डिजिटल माध्यमों का प्रभाव
आर्थिक संसाधनों की कमी
दर्शकों की घटती संख्या
फिर भी रंगमंच अपनी जीवंतता और प्रत्यक्षता के कारण विशिष्ट बना हुआ है।
निष्कर्ष
रंगमंच का उद्भव प्राचीन भारतीय परंपरा में हुआ और समय के साथ यह निरंतर विकसित होता रहा। हिंदी रंगमंच ने भारतेंदु से लेकर मोहन राकेश और समकालीन नाटककारों तक लंबी यात्रा तय की है।
आज भी हिंदी रंगमंच सामाजिक चेतना, राष्ट्रीयता और मानवीय मूल्यों का सशक्त माध्यम है। यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का आईना है, जो हमें अपने समय की सच्चाइयों से परिचित कराता है।
अतः कहा जा सकता है कि हिंदी रंगमंच का विकास भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की निरंतरता और परिवर्तनशीलता का प्रमाण 

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