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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

भारतीय साहित्य में आज का बिम्ब

भारतीय साहित्य में आज का बिम्ब
प्रस्तावना
साहित्य समाज का दर्पण कहा जाता है। प्रत्येक युग का साहित्य अपने समय की परिस्थितियों, समस्याओं, संवेदनाओं और विचारधाराओं को प्रतिबिंबित करता है। आज का भारतीय साहित्य भी अपने समय के बदलते सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवेश का जीवंत चित्र प्रस्तुत करता है। वैश्वीकरण, तकनीकी विकास, बाज़ारवाद, उपभोक्तावाद, पर्यावरण संकट, स्त्री-चेतना, दलित-विमर्श और लोकतांत्रिक संघर्ष—ये सभी तत्व आज के साहित्य में नए बिम्ब के रूप में उभरकर सामने आए हैं।
“बिम्ब” का अर्थ है—चित्र, प्रतिबिंब या छवि। साहित्य में बिम्ब उस युग की मानसिकता और यथार्थ को मूर्त रूप देता है। आज के भारतीय साहित्य का बिम्ब बहुआयामी, जटिल और परिवर्तनशील है।
1. वैश्वीकरण और बाज़ारवाद का बिम्ब
इक्कीसवीं सदी का भारतीय साहित्य वैश्वीकरण के प्रभाव से अछूता नहीं है। आर्थिक उदारीकरण के बाद समाज में उपभोक्तावाद और प्रतिस्पर्धा की भावना बढ़ी है। साहित्य में अब महानगरों की चकाचौंध, कॉरपोरेट संस्कृति और व्यक्ति की अकेलेपन की स्थिति का चित्रण देखने को मिलता है।
समकालीन उपन्यासों और कहानियों में महानगरीय जीवन की व्यस्तता, संबंधों की कृत्रिमता और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण का बिम्ब उभरता है। आज का साहित्य यह प्रश्न उठाता है कि आर्थिक प्रगति के बावजूद क्या मनुष्य वास्तव में संतुष्ट और सुखी है?
2. तकनीकी युग और डिजिटल संस्कृति
आज का साहित्य इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों से प्रभावित है। अब साहित्य केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं, बल्कि ब्लॉग, वेब पत्रिकाओं और ऑनलाइन मंचों पर भी सृजित हो रहा है।
डिजिटल युग ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया है। युवा पीढ़ी नए प्रयोग कर रही है। कविताएँ, लघुकथाएँ और कहानियाँ सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा की जा रही हैं। इससे साहित्य का स्वर अधिक त्वरित, संवादात्मक और समकालीन हुआ है।
3. स्त्री-विमर्श का बिम्ब
आज के भारतीय साहित्य में स्त्री-चेतना एक सशक्त बिम्ब के रूप में उभरी है। स्त्री अब केवल त्याग और सहनशीलता की प्रतीक नहीं, बल्कि अपनी पहचान और अधिकार के लिए संघर्षरत व्यक्तित्व के रूप में चित्रित की जा रही है।
महाश्वेता देवी ने अपने साहित्य में आदिवासी और स्त्री-शोषण के विरुद्ध स्वर उठाया।
मन्नू भंडारी की कहानियों में मध्यवर्गीय स्त्री की समस्याएँ दिखाई देती हैं।
चित्रा मुद्गल ने श्रमिक और स्त्री संघर्ष को स्वर दिया।
स्त्री-विमर्श के माध्यम से साहित्य में समानता, स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का मूल्य स्थापित हो रहा है।
4. दलित और वंचित वर्ग का बिम्ब
समकालीन साहित्य में दलित चेतना का स्वर अत्यंत मुखर है। यह साहित्य सामाजिक असमानता और शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध का माध्यम बना है।
ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा जूठन दलित जीवन की पीड़ा का सजीव चित्र प्रस्तुत करती है।
शरणकुमार लिंबाले ने दलित साहित्य की वैचारिक आधारभूमि तैयार की।
आज का साहित्य सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय गरिमा का बिम्ब प्रस्तुत करता है।
5. पर्यावरण संकट और प्रकृति का बिम्ब
औद्योगीकरण और विकास की अंधी दौड़ ने पर्यावरण को संकट में डाल दिया है। समकालीन साहित्य में पर्यावरणीय चेतना का स्वर उभर रहा है। कविताओं और कहानियों में प्रकृति की पीड़ा, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के ह्रास का चित्रण मिलता है।
यह साहित्य मनुष्य और प्रकृति के संबंधों को पुनर्स्थापित करने का प्रयास करता है।
6. राजनीतिक और सामाजिक विघटन का बिम्ब
आज का साहित्य लोकतंत्र की चुनौतियों, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता और सामाजिक असंतोष को भी अभिव्यक्त करता है।
अरुंधति रॉय ने सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर तीखी टिप्पणी की है।
उदय प्रकाश की कहानियाँ व्यवस्था की विसंगतियों को उजागर करती हैं।
समकालीन साहित्य सत्ता-संरचना पर प्रश्नचिन्ह लगाता है और आम आदमी की पीड़ा को सामने लाता है।
7. युवा पीढ़ी और अस्तित्व-संकट
आज का युवा वर्ग बेरोजगारी, अस्थिरता और पहचान के संकट से जूझ रहा है। साहित्य में यह संकट गहराई से व्यक्त हुआ है।
नई पीढ़ी के कवि और कथाकार जीवन के अर्थ की खोज, रिश्तों की उलझन और मानसिक तनाव को अभिव्यक्त कर रहे हैं। यह बिम्ब आधुनिक जीवन की जटिलता को दर्शाता है।
8. सांस्कृतिक बहुलता और सह-अस्तित्व
भारत विविधताओं का देश है। समकालीन साहित्य में बहुसांस्कृतिकता और सह-अस्तित्व का स्वर भी प्रमुख है।
अमिताव घोष के उपन्यासों में इतिहास और संस्कृति का समन्वय है।
गिरीश कर्नाड ने परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व को प्रस्तुत किया।
यह साहित्य भारतीय समाज की विविधता और एकता का बिम्ब प्रस्तुत करता है।
9. भाषा और शैली में परिवर्तन
आज का साहित्य भाषा के स्तर पर भी परिवर्तनशील है। हिंदी, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं के बीच अंतःक्रिया बढ़ी है। हिंग्लिश और मिश्रित भाषा का प्रयोग बढ़ा है।
शैली में प्रयोगधर्मिता, लघुता और प्रतीकात्मकता का प्रभाव दिखाई देता है। कविता में मुक्तछंद और कथा में यथार्थवादी शैली प्रमुख है।
10. महामारी और समकालीन यथार्थ
हाल के वर्षों में महामारी ने साहित्य को नया विषय दिया। लॉकडाउन, अकेलापन, भय और असुरक्षा का बिम्ब कविताओं और कहानियों में उभरा।
साहित्य ने मानवता, सहानुभूति और सहयोग के महत्व को पुनः रेखांकित किया।
समकालीन साहित्य की विशेषताएँ
बहुआयामी विषय-वस्तु
यथार्थवादी दृष्टिकोण
प्रतिरोध और प्रश्नाकुलता
मानवीय संवेदनाओं की गहराई
लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति
निष्कर्ष
भारतीय साहित्य में आज का बिम्ब जटिल, बहुरंगी और गतिशील है। यह केवल समस्याओं का चित्रण नहीं करता, बल्कि समाधान की खोज भी करता है। समकालीन साहित्य मानवता, समानता, पर्यावरण संरक्षण और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध दिखाई देता है।
आज का भारतीय साहित्य अपने समय की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए भविष्य के लिए आशा का संदेश भी देता है। यही उसकी जीवंतता और प्रासंगिकता का प्रमाण है।
अतः कहा जा सकता है कि भारतीय साहित्य में आज का बिम्ब हमारे युग की सच्चाई, संघर्ष और संभावनाओं का सशक्त प्रतिबिंब है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास और चेतना का दस्तावेज़ बनकर रहेगा।

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