मुंशी प्रेमचंद (1880–1936) हिंदी कथा-साहित्य के शिखर पुरुष माने जाते हैं। उनका वास्तविक नाम धनपत राय था। उन्होंने अपने साहित्य में ग्रामीण जीवन, सामाजिक विषमता, नैतिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं का यथार्थ चित्रण किया। वे आदर्शोन्मुख यथार्थवाद के समर्थक थे। उनकी कहानियों में चरित्र की परीक्षा, मानवता और कर्तव्यनिष्ठा का विशेष महत्व मिलता है। ‘परीक्षा’ कहानी भी इसी दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
‘परीक्षा’ कहानी का विश्लेषण
(1) कथानक
देवगढ़ रियासत के दीवान सरदार सुजान सिंह वृद्ध हो चुके थे। उन्होंने चालीस वर्ष की सेवा के बाद पदत्याग की प्रार्थना की। महाराज ने उनकी इच्छा स्वीकार की और नए दीवान के चयन हेतु समाचार-पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित कराया। उसमें कहा गया कि एक माह तक उम्मीदवारों के रहन-सहन, व्यवहार और चरित्र का परीक्षण किया जाएगा; केवल डिग्री नहीं, बल्कि कर्म और आचरण को महत्व दिया जाएगा।
देश भर से अनेक शिक्षित युवक देवगढ़ पहुँचे। एक माह तक सभी ने अपने-अपने सद्गुणों का प्रदर्शन किया। कोई अत्यंत विनम्र बना, कोई धर्मनिष्ठ, कोई विद्वान् बनने का अभिनय करने लगा।
इसी बीच एक दिन खेल के मैदान के पास एक किसान की बैलगाड़ी नाले में फँस गई। सभी उम्मीदवार उसे देखते रहे, पर किसी ने सहायता नहीं की। केवल एक युवक—पंडित जानकीनाथ—जो स्वयं घायल था, आगे बढ़ा और किसान की गाड़ी निकालने में सहायता की। बाद में पता चला कि वह किसान वास्तव में सुजान सिंह ही थे, जो उम्मीदवारों की परीक्षा ले रहे थे।
महीने के अंत में दरबार में घोषणा हुई कि वही युवक दीवान पद के योग्य है, जिसके हृदय में दया और साहस है—और इस प्रकार पंडित जानकीनाथ को दीवान नियुक्त किया गया।
(2) पात्र-योजना
कहानी में मुख्यतः दो प्रमुख पात्र हैं—
(क) सरदार सुजान सिंह
वृद्ध, अनुभवी और दूरदर्शी प्रशासक।
चरित्र-परीक्षण के समर्थक।
वे जानते थे कि केवल विद्या पर्याप्त नहीं, बल्कि दया, साहस और कर्तव्यनिष्ठा आवश्यक है।
किसान का वेश धारण कर उन्होंने वास्तविक परीक्षा ली।
→ वे बुद्धिमत्ता और न्यायप्रियता के प्रतीक हैं।
(ख) पंडित जानकीनाथ
शिक्षित, विनम्र और कर्मठ युवक।
घायल होने पर भी किसान की सहायता करते हैं।
उनमें दया, साहस, आत्मबल और निस्वार्थता है।
→ वे आदर्श चरित्र और सच्चे कर्मयोगी के प्रतीक हैं।
अन्य उम्मीदवार दिखावे और स्वार्थ के प्रतीक हैं।
(3) संवाद-योजना
कहानी के संवाद संक्षिप्त, स्वाभाविक और प्रभावशाली हैं।
किसान और जानकीनाथ के बीच संवाद से मानवीय संवेदना प्रकट होती है।
अंतिम दरबार में सुजान सिंह का वक्तव्य कहानी के उद्देश्य को स्पष्ट करता है।
संवाद कथा को गति देते हैं और चरित्र-चित्रण को सजीव बनाते हैं।
(4) परिवेश
कहानी का परिवेश रियासती शासन-व्यवस्था का है।
दरबार, विज्ञापन, उम्मीदवारों की भीड़—ये सब तत्कालीन सामाजिक वातावरण को दर्शाते हैं।
खेल का मैदान और नाला—ये दृश्य कहानी की परीक्षा-स्थिति को यथार्थ रूप देते हैं।
परिवेश सामाजिक और नैतिक संदर्भों को सशक्त बनाता है।
(5) भाषा-शैली
भाषा सरल, सरस और प्रभावपूर्ण है।
व्यंग्य और यथार्थ का सुंदर समन्वय है।
वर्णनात्मक और संवादात्मक शैली का संतुलित प्रयोग हुआ है।
प्रेमचंद की भाषा में सहजता और नैतिक गंभीरता दोनों मिलती हैं।
(6) उद्देश्य
कहानी का मुख्य उद्देश्य यह सिद्ध करना है कि—
पद के लिए विद्या से अधिक चरित्र आवश्यक है।
सच्ची परीक्षा व्यवहार और संकट की घड़ी में होती है।
दया, साहस और कर्तव्यनिष्ठा ही सच्चे नेतृत्व के गुण हैं।
मूल संवेदना
कहानी की मूल संवेदना मानवता, दया और नैतिक साहस है।
यह कहानी बताती है कि सच्चा मनुष्य वही है जो बिना स्वार्थ के दूसरों की सहायता करे।
तात्त्विक आधार पर विवेचन
नैतिक तत्त्व – चरित्र ही मनुष्य की वास्तविक पहचान है।
मानवतावादी तत्त्व – गरीब किसान की सहायता मानवता का प्रतीक है।
मनोवैज्ञानिक तत्त्व – उम्मीदवारों का बाहरी दिखावा और आंतरिक स्वार्थ।
सामाजिक तत्त्व – समाज में पद के चयन में चरित्र का महत्व।
आदर्शोन्मुख यथार्थवाद – यथार्थ घटना के माध्यम से आदर्श की स्थापना।
उपसंहार
‘परीक्षा’ कहानी में मुंशी प्रेमचंद ने यह सिद्ध किया है कि सच्चा नेतृत्व विद्या या बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि दया, साहस और निस्वार्थ कर्म से प्राप्त होता है।
यह कहानी चरित्र-परीक्षण की एक मार्मिक कथा है, जो आज भी समान रूप से प्रासंगिक
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