भारतेंदु युगीन हिंदी आलोचना : प्रस्तावना, उद्भव और विकास
1. प्रस्तावना
हिंदी साहित्य के इतिहास में उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध एक महत्वपूर्ण संक्रमण काल है। यह काल भारतीय समाज में राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन का युग था। अंग्रेजी शासन के प्रभाव, आधुनिक शिक्षा, मुद्रणालयों की स्थापना और पत्रकारिता के विकास ने साहित्य की दिशा को बदल दिया। इसी पृष्ठभूमि में आधुनिक हिंदी साहित्य और आलोचना का जन्म हुआ।
इस काल को सामान्यतः भारतेंदु युग कहा जाता है। यह युग हिंदी नवजागरण का प्रारंभिक चरण है, जिसमें साहित्य केवल काव्य-रस या अलंकार तक सीमित न रहकर समाज और राष्ट्र से जुड़ने लगा। आलोचना भी इसी परिवर्तित चेतना का परिणाम थी।
भारतेंदु युगीन हिंदी आलोचना आधुनिक हिंदी आलोचना की आधारशिला है। यह वह समय था जब आलोचना स्वतंत्र विधा के रूप में पूरी तरह विकसित तो नहीं हुई थी, परंतु उसके बीज स्पष्ट रूप से अंकुरित हो चुके थे।
2. आधुनिक हिंदी आलोचना का उद्भव
आधुनिक हिंदी आलोचना का उद्भव भारतीय समाज में आए व्यापक परिवर्तनों से जुड़ा हुआ है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं—
(क) पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव
अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से भारतीयों को पश्चिमी साहित्य, दर्शन और आलोचना-पद्धति का ज्ञान हुआ। इससे साहित्य के मूल्यांकन की नई दृष्टि विकसित हुई।
(ख) मुद्रण और पत्रकारिता
मुद्रणालयों की स्थापना और पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन ने विचार-विमर्श की नई परंपरा को जन्म दिया। संपादकीय लेख, पुस्तक-समीक्षाएँ और निबंध आलोचना के रूप में सामने आए।
(ग) सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना
समाज सुधार आंदोलनों और राष्ट्रीय जागरण ने साहित्य को लोकहित और राष्ट्रहित से जोड़ा। साहित्य का मूल्यांकन अब केवल सौंदर्य के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक उपयोगिता के आधार पर भी होने लगा।
(घ) भाषा का मानकीकरण
खड़ी बोली हिंदी को प्रतिष्ठा दिलाने के प्रयासों ने भाषा संबंधी बहस को जन्म दिया। भाषा की शुद्धता, सरलता और प्रभावशीलता पर चर्चा आलोचना का विषय बनी।
इन्हीं परिस्थितियों में आधुनिक हिंदी आलोचना का प्रारंभ हुआ, जिसका प्रारंभिक स्वरूप भारतेंदु युग में दिखाई देता है।
3. भारतेंदु युगीन हिंदी आलोचना का प्रारंभ
भारतेंदु युग में आलोचना स्वतंत्र और संगठित रूप में नहीं थी। यह मुख्यतः—
पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका,
प्रस्तावनाओं,
संपादकीय टिप्पणियों,
और निबंधों के रूप में प्रकट हुई।
इस युग के केंद्र में थे—
भारतेंदु हरिश्चंद्र
भारतेंदु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक कहा जाता है। उन्होंने साहित्य को सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ा। उनकी आलोचना उपयोगितावादी और समाजोन्मुख थी।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की उन्नति है।
4. भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनकी पत्रिकाएँ
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी पत्रकारिता और आलोचना को नई दिशा देने के लिए कई पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया—
1. कविवचनसुधा
यह पत्रिका 1868 में प्रारंभ हुई। इसमें साहित्यिक लेख, कविताएँ और आलोचनात्मक टिप्पणियाँ प्रकाशित होती थीं। यह आधुनिक हिंदी आलोचना का प्रारंभिक मंच बनी।
2. हरिश्चंद्र मैगज़ीन
इस पत्रिका में सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर लेख प्रकाशित हुए। यहाँ साहित्य की सामाजिक भूमिका पर विचार किया गया।
3. बालाबोधिनी
यह पत्रिका विशेष रूप से महिलाओं की शिक्षा और जागरण के लिए थी। इससे स्पष्ट होता है कि साहित्य और आलोचना को समाज सुधार से जोड़ा गया।
इन पत्रिकाओं के माध्यम से भारतेंदु ने साहित्य के मूल्यांकन की नई दृष्टि प्रस्तुत की—
भाषा की शुद्धता
राष्ट्रप्रेम
सामाजिक सुधार
नैतिकता
5. प्रमुख आलोचक और उनका योगदान
(क) भारतेंदु हरिश्चंद्र
उन्होंने साहित्य को राष्ट्रीय और सामाजिक चेतना से जोड़ा। उनकी आलोचना भावात्मक होते हुए भी उद्देश्यपरक थी।
(ख) बालकृष्ण भट्ट
वे ‘हिंदी प्रदीप’ के संपादक थे। उन्होंने भाषा-शुद्धि और साहित्य की उपयोगिता पर बल दिया। उनकी आलोचना में तार्किकता और गंभीरता का प्रारंभिक रूप मिलता है।
(ग) श्रीनिवासन दास
वे ‘परीक्षा गुरु’ के लेखक थे। उनके लेखों में सामाजिक यथार्थ और नैतिक दृष्टि का समावेश मिलता है।
(घ) अंबिका दास व्यास
उन्होंने साहित्यिक विषयों पर विचार प्रस्तुत किए और परंपरा तथा आधुनिकता के समन्वय का प्रयास किया।
इन सभी लेखकों ने आलोचना को एक दिशा प्रदान की, भले ही वह पूरी तरह वैज्ञानिक या व्यवस्थित न हो।
6. भारतेंदु युगीन आलोचना की विशेषताएँ
उपयोगितावाद – साहित्य को समाज सुधार का साधन माना गया।
राष्ट्रीयता – राष्ट्रप्रेम और स्वदेशाभिमान प्रमुख तत्व थे।
नैतिक दृष्टिकोण – चरित्र निर्माण और नैतिक मूल्यों पर बल।
भाषा सुधार – खड़ी बोली हिंदी को प्रतिष्ठा दिलाने का प्रयास।
पत्रकारिता से संबंध – आलोचना का विकास पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से।
भावात्मकता – आलोचना में तर्क की अपेक्षा भाव की प्रधानता।
परंपरा-आधुनिकता का समन्वय – संस्कृत काव्यशास्त्र और पाश्चात्य विचारों का मेल।
7. भारतेंदु युगीन आलोचना की सीमाएँ
व्यवस्थित सिद्धांतों का अभाव
वैज्ञानिक पद्धति का अभाव
अधिक नैतिक आग्रह
व्यक्तिगत पूर्वाग्रह
फिर भी इन सीमाओं के बावजूद यह युग आधुनिक आलोचना की आधारभूमि सिद्ध हुआ।
8. भारतेंदु युग का आलोचना के क्षेत्र में अवदान
आधुनिक चेतना का संचार
साहित्य को समाज और राष्ट्र से जोड़ना
पत्रकारिता के माध्यम से आलोचना का विकास
भाषा का मानकीकरण
नई आलोचनात्मक दृष्टि का प्रारंभ
आगे आने वाले द्विवेदी युग के लिए आधार तैयार करना
भारतेंदु युग ने आलोचना को दिशा दी, भले ही वह पूर्ण विकसित रूप में न थी। इसी आधार पर आगे चलकर द्विवेदी युग में आलोचना अधिक संगठित और वैज्ञानिक बनी।
9. निष्कर्ष
भारतेंदु युगीन हिंदी आलोचना आधुनिक हिंदी आलोचना का प्रारंभिक चरण है। इस युग में आलोचना ने साहित्य को समाज, राष्ट्र और भाषा के विकास से जोड़ा।
भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके समकालीन लेखकों ने आलोचना की जो परंपरा शुरू की, वही आगे चलकर हिंदी आलोचना की सुदृढ़ नींव बनी।
अतः कहा जा सकता है कि भारतेंदु युगीन हिंदी आलोचना हिंदी साहित्य के इतिहास में नवजागरण का प्रतीक है, जिसने आधुनिक आलोचना की आधारशिला रखी और साहित्य को जीवन से जोड़ने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें