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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

भारतीय साहित्य में मूल्य की अभिव्यक्ति

भारतीय साहित्य में मूल्य 

प्रस्तावना
भारतीय साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि मानव जीवन के मूल्यों का संवाहक रहा है। भारतीय परंपरा में साहित्य को “साहित्य” इसलिए कहा गया क्योंकि वह सहित—अर्थात्‌ मनुष्य और समाज के साथ जुड़ा हुआ—है। यहाँ साहित्य जीवन से पृथक नहीं, बल्कि जीवन का दर्पण, मार्गदर्शक और संवेदना का संवाहक है। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक भारतीय साहित्य ने धार्मिक, नैतिक, सामाजिक, मानवीय, आध्यात्मिक और राष्ट्रीय मूल्यों को पोषित किया है।
भारतीय चिंतन में ‘सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम्’ को जीवन का आदर्श माना गया। यही त्रयी साहित्य का भी मूलाधार है। इसलिए भारतीय साहित्य में मूल्य केवल विचार के स्तर पर नहीं, बल्कि जीवन-व्यवहार और सामाजिक संरचना में भी प्रतिबिंबित होते हैं।
1. मूल्य की संकल्पना
‘मूल्य’ शब्द का अर्थ है—वह तत्व जो जीवन को दिशा, गरिमा और उद्देश्य प्रदान करे। भारतीय दर्शन में मूल्य को पुरुषार्थ चतुष्टय—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के रूप में भी समझा गया है। साहित्य इन मूल्यों को कथाओं, कविताओं, नाटकों और आख्यानों के माध्यम से जीवन्त रूप देता है।
2. वैदिक एवं उपनिषदिक साहित्य में मूल्य
भारतीय साहित्य की आधारशिला वेदों और उपनिषदों में मिलती है।
सत्य और ऋत का मूल्य – ऋग्वेद में ‘ऋत’ अर्थात्‌ cosmic order की अवधारणा प्रस्तुत है। सत्य को सर्वोच्च मूल्य माना गया—“सत्यं वद, धर्मं चर।”
अहिंसा और करुणा – उपनिषदों में आत्मा की एकता का सिद्धांत मानवतावादी दृष्टि प्रदान करता है।
सर्वे भवन्तु सुखिनः – समष्टि कल्याण की भावना भारतीय साहित्य का मूल स्वर है।
ईशोपनिषद में त्याग और संतुलन का संदेश है—“तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा।” यह संयम और संतोष का मूल्य स्थापित करता है।
3. रामायण और महाभारत में मूल्य
भारतीय महाकाव्य साहित्य में जीवन-मूल्यों का विराट चित्रण मिलता है।
(क) रामायण में मूल्य
रामायण में मर्यादा, कर्तव्य, आदर्श परिवार और त्याग का उत्कृष्ट चित्रण है।
राम मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में सत्य और धर्म के प्रतीक हैं।
सीता त्याग, पवित्रता और धैर्य का आदर्श हैं।
भ्रातृ प्रेम, पितृभक्ति और राष्ट्रधर्म का समन्वय इस ग्रंथ का मूल मूल्य है।
(ख) महाभारत में मूल्य
महाभारत जीवन के जटिल नैतिक द्वंद्वों का ग्रंथ है।
कर्मयोग और धर्मसंघर्ष का संदेश भगवद्गीता में मिलता है।
न्याय, कर्तव्य और सत्य के लिए संघर्ष का आदर्श प्रस्तुत किया गया है।
4. शास्त्रीय संस्कृत साहित्य में मूल्य
संस्कृत काव्य में सौंदर्य और नीति का अद्भुत समन्वय है।
कालिदास के काव्यों में प्रकृति-प्रेम, करुणा और सौंदर्यबोध है। अभिज्ञानशाकुंतलम् में प्रेम और क्षमा का मूल्य मिलता है।
भर्तृहरि के नीतिशतक में नीति, वैराग्य और सदाचार की शिक्षा है।
5. भक्तिकालीन साहित्य में मूल्य
भक्ति आंदोलन ने भारतीय साहित्य में समानता, प्रेम और आध्यात्मिक लोकतंत्र का मूल्य स्थापित किया।
कबीर ने जाति-पाँति और पाखंड का विरोध किया। उनके साहित्य में मानवतावाद और समता का मूल्य है।
तुलसीदास ने रामचरितमानस में भक्ति और नीति का समन्वय किया।
सूरदास ने वात्सल्य और प्रेम का चित्रण किया।
मीराबाई के पदों में आत्मसमर्पण और ईश्वर-प्रेम का मूल्य है।
भक्ति साहित्य ने सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया।
6. रीतिकालीन साहित्य में मूल्य
रीतिकाल में श्रृंगार और अलंकार का प्रभाव अधिक रहा, किंतु इसमें भी नैतिकता और सौंदर्यबोध का समावेश है।
बिहारी के दोहों में जीवन की सूक्ष्म अनुभूतियाँ और नीति के संकेत मिलते हैं।
7. आधुनिक भारतीय साहित्य में मूल्य
आधुनिक काल में साहित्य सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय भावना का वाहक बना।
(क) राष्ट्रीयता और स्वतंत्रता का मूल्य
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के आनंदमठ में राष्ट्रप्रेम का स्वर है।
मैथिलीशरण गुप्त ने राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत किया।
(ख) सामाजिक सुधार और यथार्थवाद
मुंशी प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों में सामाजिक विषमता, गरीबी और शोषण का चित्रण किया। उनके साहित्य में मानवता और न्याय का मूल्य सर्वोपरि है।
महादेवी वर्मा ने करुणा और नारी चेतना को स्वर दिया।
(ग) प्रगतिशील साहित्य
सुमित्रानंदन पंत और रामधारी सिंह दिनकर ने मानवतावाद और राष्ट्रीय स्वाभिमान को अभिव्यक्त किया।
8. दलित और स्त्री साहित्य में मूल्य
आधुनिक भारतीय साहित्य में दलित और स्त्री विमर्श ने समानता, आत्मसम्मान और अधिकार के मूल्य को स्थापित किया।
ओमप्रकाश वाल्मीकि की रचनाओं में सामाजिक न्याय की मांग है।
कृष्णा सोबती ने नारी अस्मिता को मुखर किया।
यह साहित्य सामाजिक संरचना में परिवर्तन और न्यायपूर्ण व्यवस्था का संदेश देता है।
9. भारतीय साहित्य के प्रमुख जीवन-मूल्य
भारतीय साहित्य में निम्नलिखित मूल्यों का निरंतर प्रतिपादन हुआ है—
सत्य – जीवन की आधारशिला।
अहिंसा – करुणा और सहिष्णुता का आदर्श।
धर्म – कर्तव्य और नैतिकता का समन्वय।
मानवतावाद – समता और बंधुत्व की भावना।
राष्ट्रीयता – मातृभूमि के प्रति समर्पण।
नारी सम्मान – स्त्री को गरिमा और अधिकार।
सामाजिक न्याय – शोषण का विरोध।
प्रकृति-प्रेम – पर्यावरण संरक्षण की चेतना।
आध्यात्मिकता – आत्मबोध और मोक्ष की भावना।
10. समकालीन परिप्रेक्ष्य में मूल्य
आज के वैश्वीकरण और भौतिकतावाद के युग में भारतीय साहित्य के मूल्य और भी प्रासंगिक हो गए हैं। आधुनिक साहित्यकार उपभोक्तावाद, पर्यावरण संकट और सामाजिक विघटन के बीच मानवता को बचाने का प्रयास कर रहे हैं।
भारतीय साहित्य का मूल स्वर आज भी यही है कि मनुष्य मनुष्य से जुड़ा रहे और जीवन में नैतिकता बनी रहे।
उपसंहार
भारतीय साहित्य मूल्य-समृद्ध परंपरा का ध्वजवाहक है। वैदिक युग से लेकर आधुनिक काल तक साहित्य ने जीवन को दिशा देने का कार्य किया है। इसमें धर्म, सत्य, करुणा, समता, प्रेम, न्याय और राष्ट्रीय चेतना जैसे मूल्यों का निरंतर प्रवाह रहा है।
भारतीय साहित्य की विशेषता यह है कि वह केवल उपदेश नहीं देता, बल्कि कथा और काव्य के माध्यम से मूल्यों को जीवन्त बना देता है। यही कारण है कि भारतीय साहित्य विश्व साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है।
अतः कहा जा सकता है कि भारतीय साहित्य केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि मानव जीवन की मूल्य-संपदा का अमूल्य भंडार है, जो आज भी हमें नैतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करता है।

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